संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 916, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८८७
(हल्दी और दारुहल्दी) तथा यक्षकर्दम—इनके द्वारा क्रमशः वैशाख आदि मासोंके व्रतमें देवीको अनुलेपन लगाना चाहिये। यदि पूर्वोक्त सब वस्तुओंकी प्राप्ति न हो तो प्रत्येक मासमें यक्षकर्दम ही उत्तम है। दो भाग कस्तूरी, दो भाग कुंकुम, तीन भाग चन्दन और एक भाग कपूर—इन सबको मिलाकर जो अनुलेपन तैयार किया जाता है उसका नाम यक्षकर्दम है। यह समस्त देवताओंको प्रिय है। गुलाब, बेला, कमल, केतकी, कनेर, उत्पल, राजचम्पा, तगर, चमेली, कुमारी और कर्णिकार—इन पुष्पोंद्वारा वैशाख आदि मासोंमें पूजन करना उचित है। फूल न मिले तो उनके पत्तोंसे ही पूजा करे। फूल और पत्ते दोनों न मिलें तो किन्हीं भी सुगन्धित पुष्पोंसे पूजा की जा सकती है। करम्भ (दधिमिश्रित सत्तू), दही-भात, आमके रससे युक्त मण्डक (मैदेकी एक प्रकारकी रोटी), फेणिक (पानीमें पकाया हुआ चावलका चूर्ण), बटक (बड़ा), शक्कर मिलाया हुआ पायस (खीर), इनका क्रमशः वैशाखसे आश्विनतक भोग लगावे। कार्तिकमें मूँग और घीके साथ भात निवेदन करे। अगहनमें इण्डेरिका (ईंड़हर), पौषमें लड्डू, माघमें लम्पसिका (लपसी) और फाल्गुनमें चीनी भरकर घीमें पकायी हुई पूरियाँ श्रीगणेशजी तथा विश्वभुजा देवीको निवेदन करे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासकी शुक्ला तृतीयाको विश्वभुजा देवीकी आराधना करके व्रतकी पूर्तिके लिये वेदीपर अग्निकी स्थापना करे। तत्पश्चात् अग्निदेवतासम्बन्धी मन्त्रद्वारा तिल और घी आदि द्रव्यसे एक सौ आठ बार होम करे। इस व्रतके लिये सदा रातमें ही पूजा बतायी गयी है। रातमें ही भोजनका नियम है, रातमें ही यह होम होता है तथा रातमें ही देवीसे क्षमा-प्रार्थना की जाती है। प्रार्थनाके लिये मन्त्र इस प्रकार हैं—
गृहाण पूजां मे भक्त्या मातर्विघ्नजिता सह।
नमोऽस्तु ते विश्वभुजे पूरयाशु मनोरथम्॥
नमो विघ्नकृते तुभ्यं नम आशाविनायक।
त्वं विश्वभुजया सार्धं मम देहि मनोरथम्॥
'मातः! आप विघ्नविजयी गणेशजीके साथ मेरी भक्तिपूर्वक की हुई यह पूजा स्वीकार करें। विश्वभुजे! आपको नमस्कार है। आप मेरे मनोरथको शीघ्र पूर्ण करें। आशाविनायक! आप विघ्नोंके स्रष्टा हैं (अथवा विघ्नोंको उच्छेद करनेवाले हैं), आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप विश्वभुजा देवीके साथ कृपा करके मेरा मनोरथ पूर्ण करें।'
इन दोनों मन्त्रोंका उच्चारण करके गौरी-गणेशकी पूजा करनी चाहिये। व्रतके लिये क्षमा-प्रार्थना करते समय पलंग, गद्दा, तकिया, दीवट, दीप और दर्पण देना चाहिये। आचार्यसे प्रार्थना करे—'भगवन्! मैंने मनोरथतृतीयाका व्रत किया है, इसमें जो न्यूनता या अधिकताका दोष आ गया हो वह दूर होकर आपके वचनसे मेरा यह व्रत पूर्ण हो जाय।' इस प्रकार आचार्यसे आज्ञा और आशीर्वाद लेकर गाँवकी सीमातक उन्हें पहुँचा आवे। यथाशक्ति दूसरोंको भी दान दे। फिर अपने परिवारके साथ रात्रिमें प्रसन्नतापूर्वक भोजन करे। प्रातःकाल चतुर्थीको चार कुमारों और बारह कुमारियोंको भोजन कराकर गन्ध, पुष्प, माला आदिसे उनकी पूजा करे। इस प्रकार यह निर्मल व्रत पूर्णताको प्राप्त होता है। मनोरथतृतीयाका यह व्रत करनेसे जिसका जो मनोरथ हो वह पूर्ण होता है।
इस उत्तम व्रतको सुनकर पुलोमकुमारी शचीने उसका पालन किया। इससे उनकी मनोवांछित कामना सिद्ध हुई। जो बुद्धिमान् पुरुष मन लगाकर इस पुण्यमयी कथाको सुनता है, वह शुभ बुद्धिको प्राप्त होता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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