संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जगदम्बा पार्वती ने कहा— महादेव! महेश्वर! इस धर्मपीठका यह माहात्म्य जानकर मैं आजसे धर्मेश्वरके समीपमें ही निवास करूँगी। जो स्त्री अथवा पुरुष इस धर्मेश्वर लिंगमें भक्ति रखनेवाले होंगे, उन सबकी मनोवांछित कामनाओंको मैं सदा सिद्ध करूँगी।
महादेवजी बोले— देवि यह तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। यहाँ तुम विश्वभुजाके नामसे विख्यात होओगी। जो यहाँ तुम्हारी पूजा करेंगे वे समस्त भोगोंसे सम्पन्न एवं सर्वमान्य होंगे। मनोरथतृतीयाको (चैत्र शुक्ला तृतीयाको) जो तुम्हारी भक्तिपूर्वक आराधना करेगा, मेरे अनुग्रहसे उसके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होगी। पूर्वकालमें पुलोमकन्या इन्द्राणीने किसी मनोरथकी प्राप्तिके लिये बड़ी भारी तपस्या की, किंतु उन्हें तपस्याका फल नहीं मिला। तब उन्होंने बड़ी भक्ति और प्रसन्नताके साथ कोकिलाके समान मधुरस्वरसे रहस्ययुक्त गीत गाकर मेरी आराधना की। मृदु, मधुर, ताल-स्वरयुक्त तान, मात्रा और कलासे विशिष्ट उस गानके द्वारा मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैंने उसके पास जाकर कहा—'पुलोमनन्दिनि! मैं तुम्हारे इस सुमधुर गीत और मेरे श्रीविग्रहके पूजनसे प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।'
शची बोली— देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो जो सब देवताओंमें माननीय, सुन्दर और यज्ञकर्ताओंमें श्रेष्ठ हों, वे ही मेरे पति हों। आप मुझे मेरी इच्छाके अनुसार रूप, सुख और आयु प्रदान करें। आपके अर्चाविग्रहकी पूजामें मेरी उत्तम भक्ति सदा बनी रहे और मेरा पातिव्रत्य कभी नष्ट न हो।
पुलोमपुत्री शचीके मनोरथको सुनकर महादेवजीने कहा— तुम व्रतका अनुष्ठान करनेसे पूर्वोक्त मनोरथोंको प्राप्त करोगी। मनोरथतृतीया नामका जो व्रत है, उसके पालनसे मनोरथकी सिद्धि होगी। बीस भुजाओंसे सुशोभित विश्वभुजा नामक गौरीदेवी उस व्रतकी अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। देवीके आगे वरदायक आशा-विनायकका भी पूजन करना चाहिये। चैत्र शुक्ला द्वितीयाको दन्त-धावन आदि करके सायंकालिक नियमोंका पालन करनेके पश्चात् अधिक तृप्तिपूर्वक भोजन न करके थोड़ा-सा आहार करे। तदनन्तर इस प्रकार नियम ग्रहण करे—'माता विश्वभुजा देवी! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये कल प्रातःकाल मैं क्रोधको जीतकर, इन्द्रियोंको संयममें रखकर, अस्पृश्य वस्तुओंके स्पर्शसे दूर रहकर, व्रतमें ही मन लगाये हुए पवित्रतापूर्वक 'मनोरथतृतीया' नामक व्रतका अनुष्ठान करूँगा, इसमें मेरे मनोरथकी सिद्धिके लिये तुम सदा मेरे समीप रहो।'
बुद्धिमान् पुरुष प्रातःकाल उठकर आवश्यक कर्म करके शौच एवं आचमनसे निवृत्त हो अशोक वृक्षका उत्तम दन्तधावन ग्रहण करे। फिर नित्यकी स्नान आदि क्रिया पूरी करके दिनभर उपवास करे। तत्पश्चात् सायंकालमें स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारणकर गौरीजीकी पूजा प्रारम्भ करे। सबसे पहले गणेशजीकी पूजा करके उन्हें घृतपक्व (पूरी, पूआ, घेवर आदि)-का भोग लगावे। तदनन्तर अशोकके सुन्दर फूलोंसे विश्वभुजा देवीकी पूजा करे। पहले कुंकुमसे अनुलेपन करके अशोकवर्ति, नैवेद्य, धूप, अगर आदिसे देवीकी पूजा करनेके पश्चात् एक बार देवीका प्रसाद भोजन करे। इस प्रकार चैत्रकी तृतीया बीत जानेपर वैशाखसे फाल्गुनातक प्रत्येक मासकी शुक्ला तृतीयाको इस उत्तम व्रतका पालन करे। जम्बू, अपामार्ग, खदिर, जाती, आम्र, कदम्ब, प्लक्ष, उदुम्बर, खर्जूर, बीजपूर और दाड़िम (अनार)—इन ग्यारह प्रकारके काष्ठोंका क्रमशः वैशाखसे लेकर फाल्गुनातक व्रतके दिन दातन करे। सिन्दूर, अगर, कस्तूरी, चन्दन, रक्तचन्दन, गोरोचन, देवदारु, पद्माक्ष और दो प्रकारकी हल्दी