भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 925
८९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

होता। मनुष्य जब साधु पुरुषोंद्वारा सेवित वेदोक्त मार्गका त्याग नहीं करता, तभी उसपर भगवान् विश्वनाथ अपनी उत्तम दयाका विस्तार करते हैं।'

इस प्रकार अपने ऊपर भगवान् विश्वेश्वरकी कृपाका समर्थन करके विश्वकर्माने पवित्र भावसे एक शिवलिंगको स्थापित किया और स्वस्थचित्त होकर भगवान् विश्वनाथकी आराधना की। वे वनसे ऋतुके अनुकूल बहुत-से पुष्प लाकर स्नान करके नित्य भगवान् शिवकी पूजा करते तथा कन्द, मूल और फलसे जीविका चलाते थे। इस प्रकार शिवलिंगकी आराधनामें मन लगाये हुए विश्वकर्माके जब तीन वर्ष व्यतीत हो गये, तब करुणानिधान भगवान् शिव उनके ऊपर प्रसन्न हो उसी लिंगसे प्रकट होकर बोले—'त्वाष्ट्र! मैं तुम्हारी दृढ़ भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ, तुम कोई वर माँगो। बालक! गुरु-गुरुपत्नी तथा गुरुपुत्रोंने तुमसे जो कुछ माँगा है, वह सब पूर्ण करनेकी शक्ति तुम्हें प्राप्त होगी। धातु, लकड़ी, पत्थर, मणि, रत्न, फूल, वस्त्र, कर्पूर आदि सुगन्धित पदार्थ, जल, कन्दमूल, फल, द्रव्य और वल्कल—इन सब वस्तुओंका काम बनानेकी विद्या तुम्हें प्राप्त होगी। जिस-जिस पुरुषकी, जैसे-जैसे घर या मन्दिर बनवानेकी रुचि होगी, उस-उसके सन्तोषके लिये तुम सब कुछ उसी प्रकार करनेकी कलामें प्रवीण होओगे। सब प्रकारके शृंगार और आभूषणोंकी रचना, सब प्रकारकी रसोईके संस्कार, सभी तरहके शिल्पकर्म, नृत्य, गीत और वाद्यसम्बन्धी सब वस्तुओंको बनानेकी विधि तुम्हें ज्ञात होगी। शिल्पनिर्माणकी कलामें तुम दूसरे ब्रह्मा समझे जाओगे। अनेक प्रकारके यन्त्र (मशीन), भाँति-भाँतिके अस्त्रोंका निर्माण, जलाशय (कूप, तड़ाग, बावली आदि) तथा उत्तम दुर्गकी रचनाका भी तुम्हें ज्ञान होगा। तुम मेरे वरदानसे सम्पूर्ण कलाओंके ज्ञाता हो जाओगे। सारी इन्द्रजाल-विद्या भी तुम्हारे अधीन होगी। सब कर्मोंमें कुशलता, सब बुद्धियोंकी श्रेष्ठता और सबकी मनोवृत्तियोंका ज्ञान तुम्हें स्वतः प्राप्त होगा। सम्पूर्ण विश्वमें अखिल कर्मोंका ज्ञाता होनेके कारण तुम्हारा यह विश्वकर्मा नाम यथार्थ होगा।'

विश्वकर्मा बोले—भगवन्! मैंने अज्ञ होते हुए भी यह जो शिवलिंग स्थापित किया है, इसकी आराधना करके मेरी ही भाँति दूसरे लोग भी सद्बुद्धिके पात्र हों।

महादेवजीने कहा—'एवमस्तु'। तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंगकी आराधना करनेवाले सब लोग सद्बुद्धिके पात्र हों और सभी युक्तिकी दीक्षाके अधिकारी बनें। तात! ब्रह्माजीके वरदानसे जब दिवोदास यहाँके राजा होंगे, तब तुम मेरे आदेशसे मेरा मन्दिर निर्माण करोगे। विश्वकर्मन्! अब तुम जाओ और गुरुजीकी आज्ञाके पालनका यत्न करो, क्योंकि जो गुरुके भक्त हैं, वे निःसन्देह मेरे ही भक्त हैं। भक्तोंका अभीष्ट पूर्ण करनेवाला मैं तुम्हारे द्वारा स्थापित उस अर्चाविग्रहमें निरन्तर निवास करूँगा। अंगारेश्वरसे उत्तर भागमें जो तुम्हारे स्थापित किये हुए इस लिंगकी आराधना करेंगे, उन्हें पग-पगपर अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होगी।'

ऐसा कहकर महादेवजी अन्तर्धान हो गये और विश्वकर्मा अपने गुरुके पास आये। गुरुकी अभिलाषा पूर्ण करके वे अपने घर चले गये। घरपर भी अपने सत्कर्मसे उन्होंने माता-पिताको सन्तुष्ट किया और सदा उनकी आज्ञाका पालन किया। तत्पश्चात् वे काशी चले आये और अपने द्वारा स्थापित शिवलिंगकी आराधनामें संलग्न हो गये।

श्रीमहादेवजी कहते हैं—पार्वती! तुमने काशीपुरीमें मुक्ति देनेकी शक्ति रखनेवाले जिन शिवलिंगोंका परिचय पूछा था, उन सबका वर्णन मैंने किया। ॐकारेश्वर, त्रिविष्टपेश्वर, महादेवेश्वर, कृत्तिवासेश्वर, रत्नेश्वर, चन्द्रेश्वर, केदारेश्वर, धर्मेश्वर, वीरेश्वर, कामेश्वर, विश्वकर्मेश्वर तथा मणिकर्णिश्वर, अविमुक्तेश्वर और सम्पूर्ण विश्वको सुख देनेवाले विश्वनाथ नामसे प्रसिद्ध विश्वेश्वर—ये सभी मुक्तिदायक लिंग हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें आकर जिसने भगवान् विश्वेश्वरका पूजन कर लिया, उसका