संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 926, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* काशीखण्ड-उत्तरार्ध * । ८९७
सैकड़ों कल्पोंमें भी जन्म नहीं होता। जितेन्द्रिय संन्यासियोंको आठ महीने घूमनेका विधान है और वर्षाके चौमासेमें एक स्थानपर रहनेके लिये शास्त्रकी आज्ञा है। उन्हें किसी एक स्थानपर लगातार एक वर्षतक नहीं रहना चाहिये। परंतु अविमुक्त क्षेत्रमें जिनका प्रवेश हो गया है, ऐसे संन्यासियोंके लिये भ्रमण करनेका आदेश लागू नहीं होता और उन्हें यहाँ मोक्ष भी निःसन्देह प्राप्त हो जाता है। इसलिये कभी काशीपुरीका परित्याग नहीं करना चाहिये। इन चौदह लिंगोंकी माहात्म्य-कथा सुनकर श्रेष्ठ पुरुष चौदहों भुवनोंमें उत्तम सम्मान प्राप्त करेगा।
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दक्षेश्वर तथा पार्वतीश्वर लिंगका माहात्म्य
स्कन्दजी कहते हैं—मुने! भगवान् शंकरके गणोंने जब दक्षयज्ञका विध्वंस कर दिया, उस समय ब्रह्माजीने दक्षको यह उपदेश दिया कि 'प्रजापते! भगवान् शंकरकी निन्दासे जो दुस्त्यज पापपंक उत्पन्न हो गया है, उसको धो डालनेकी इच्छा हो तो तुम काशीपुरीमें जाओ। बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाली पुण्यमयी काशीपुरीमें जाकर तुम वहाँ शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करो। इससे भगवान् शंकर सन्तुष्ट होते हैं और उनके सन्तुष्ट होनेपर यह सम्पूर्ण चराचर जगत् सन्तुष्ट हो जाता है। मनीषी महर्षियोंने ब्रह्महत्या आदि पापोंका प्रायश्चित्त तो कहा है, परंतु शिवनिन्दाजनित पापका प्रायश्चित्त नहीं बताया है। उसका प्रायश्चित्त तो केवल काशी ही है। जिन पुण्यात्माओंने काशीमें शिवलिंगकी प्रतिष्ठा की है, उनके द्वारा सब धर्मोंका अनुष्ठान हो गया। इस संसारमें वे ही पुरुषार्थी हैं।'
ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर दक्ष प्रजापति शीघ्र ही काशीपुरीमें आये और वहाँ बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। उन्होंने विधिपूर्वक शिवलिंगकी स्थापना करके उसकी आराधना प्रारम्भ कर दी। उस लिंगसे भिन्न दूसरी किसी वस्तुको इस भूतलपर वे नहीं जानते थे। प्रजापति दक्ष दिन-रात भगवान् महेश्वरकी स्तुति, पूजा, नमस्कार, ध्यान और दर्शन करते थे। एकचित्त होकर उस ईश्वरलिंगकी आराधना करते हुए दक्षके बारह हजार वर्ष व्यतीत हो गये। दक्षकन्या सती अपना शरीर त्यागकर जब हिमाचलकी पतिव्रता पत्नी मेनाके गर्भसे प्रकट हुईं और उमारूपसे अत्यन्त तपस्या करके जब उन्होंने पिनाकपाणि भगवान् शिवको पतिरूपमें प्राप्त कर लिया, तबतक तपस्यामें निश्चलभावसे बैठे हुए दक्ष शिवलिंगकी आराधना करते रहे। तदनन्तर गिरिराजकिशोरी उमा जब अपने पतिके साथ काशी आयीं और दक्षको निश्चलचित्तसे शिवलिंगकी आराधनामें तत्पर देखा, तब देवीने महादेवजीसे निवेदन किया—'प्रभो! ये तपस्या करते-करते अत्यन्त दुर्बल हो गये हैं। कृपासिन्धो! अब तो इन प्रजापतिको वरदान देकर प्रसन्न कीजिये।'
देवी अपर्णाके ऐसा कहनेपर महेश्वरने दक्षसे कहा—महाभाग! वर माँगो।
भगवान् शंकरका ऐसा वचन सुनकर प्रजापतिने उन्हें अनेक बार प्रणाम किया और नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् उन्हें प्रसन्न देखकर इस प्रकार कहा—'देव! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी निर्द्वन्द्व भक्ति बनी रहे और मैंने जो आपके महालिंगकी यहाँ स्थापना की है, इसमें आप सदा निवास करें। कृपानिधे! मैंने जो आपका अपराध किया है, उसे क्षमा कर दें।'
यह सुनकर महादेवजी बहुत प्रसन्न हुए और बोले—तुमने जैसा कहा है, वह सब उसी प्रकार होगा। प्रजापते! तुमने जो दक्षेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की है, इसके सेवनसे मैं पुरुषोंके सहस्रों अपराध क्षमा कर दूँगा, इसमें सन्देह नहीं है।