संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अतः मनुष्योंको इस दक्षेश्वर लिंगकी पूजा अवश्य करनी चाहिये और तुम इस लिंगार्चनके पुण्यसे सर्वमान्य होओगे। दो परार्ध व्यतीत होनेपर तुम मोक्षको प्राप्त हो जाओगे। ऐसा कहकर महादेवजी उसी लिंगमें अन्तर्धान हो गये। प्रजापति दक्ष भी पूर्णमनोरथ होकर अपने घरको लौट गये।
अगस्त्य! इस प्रकार दक्षेश्वरकी उत्पत्ति बतायी गयी।
अगस्त्यजी बोले— पार्वतीनन्दन! अब पार्वतीश्वर लिंगकी उत्पत्तिका वर्णन कीजिये।
स्कन्दजीने कहा— मुने! एक दिन हिमाचलकी पतिव्रता पत्नी मेनाने अपनी पुत्री पार्वतीसे पूछा— 'बेटी! तुम्हारा और भगवान् महेश्वरका कौन-सा स्थान है, कौन घर है और कौन बन्धु है? तुम कुछ जानती हो तो बताओ।'
माताका यह प्रश्न सुनकर पार्वतीजीको बड़ी लज्जा हुई और उन्होंने अवसर पाकर भगवान् शिवको नमस्कार करके कहा— प्राणवल्लभ! अब मुझे निश्चितरूपसे ससुराल चलना चाहिये। यहाँ रहना उचित नहीं है, अतः मुझे अपने घर ले चलें। पार्वतीकी यह बात सुनकर यथार्थ रहस्यको जाननेवाले महादेवजीने हिमालयको छोड़ दिया और अपने परमधाम आनन्दवनमें चले आये। परमानन्दके हेतुभूत आनन्दवनमें आकर आनन्दस्वरूपा पार्वतीदेवी अपने पिताके घरको भूल गयीं।
तदनन्तर एक दिन गौरीदेवीने महेश्वरसे पूछा— भगवन्! इस क्षेत्रमें अविच्छिन्न आनन्दका समुद्र क्यों उमड़ रहा है, यह बतानेकी कृपा करें। | गौरीका यह वचन सुनकर पिनाकधारी शिवने कहा— 'यह पाँच कोसका क्षेत्र मुक्तिधाम है। यहाँ तिलके बराबर भी कोई कहीं ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ कोई शिवलिंग न हो। यहाँ बहुत-से परमानन्द-स्वरूप लिंग हैं। चौदहों भुवनोंमें जो पुण्यात्मा निवास करते हैं, उन सबने अपने-अपने नामसे यहाँ लिंग-स्थापना की है और इससे कृतार्थताका अनुभव किया है। पार्वती! यही कारण है कि यह क्षेत्र असीम आनन्दका प्रधान हेतु बन गया है।'
महादेवी बोलीं— नाथ! तब मुझे भी यहाँ शिवलिंग स्थापित करनेकी आज्ञा दीजिये। पतिकी आज्ञा लेकर पतिव्रता नारी जो-जो कल्याणमय कार्य करती है, उसके श्रेयकी हानि कभी प्रलयकालमें भी नहीं होती। इस प्रकार देवेश्वरको प्रसन्न करके उनकी आज्ञा ले गौरीजीने महादेवेश्वरके समीप एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसके दर्शनसे मनुष्योंके ब्रह्महत्या आदि पातक नष्ट हो जाते हैं और उन्हें फिर कभी देहबन्धन नहीं प्राप्त होता। मुने! महादेवजीने उस लिंगको जो वरदान दिया है, उसको श्रवण करो। 'जो कोई काशीमें पार्वतीश्वर नामक लिंगका भलीभाँति पूजन करेगा, वह देहावसान होनेपर मुझमें ही प्रवेश करेगा। चैत्र शुक्ला तृतीयाको पार्वतीश्वरकी पूजा करनेसे मनुष्य इस लोकमें सौभाग्य और परलोकमें सद्गति प्राप्त करता है। जो श्रेष्ठ पुरुष पार्वतीश्वरका माहात्म्य सुनेगा, वह परम बुद्धिमान् होकर इहलोक और परलोककी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करेगा।'
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नर्मदेश्वर तथा सतीश्वर लिंगका माहात्म्य
स्कन्दजी कहते हैं— मुने! अब मैं आपसे नर्मदेश्वरका माहात्म्य कहता हूँ, जिसके स्मरण-मात्रसे बड़े-बड़े पातकोंका नाश हो जाता है। इस वाराहकल्पके प्रारम्भमें बड़े-बड़े महर्षियोंने मार्कण्डेयजीसे पूछा— 'मृकण्डनन्दन! सब नदियोंमें श्रेष्ठ नदी कौन-सी है?' | मार्कण्डेयजी बोले— मुनियो! आप सब लोग सुनें। भारतवर्षमें सैकड़ों नदियाँ हैं। वे सभी पापोंका नाश करनेवाली और पुण्य देनेवाली हैं। उन सबमें श्रेष्ठ वे नदियाँ हैं, जो समुद्रमें मिली हैं। उनमें भी गंगा, यमुना, नर्मदा और सरस्वती— ये चार नदियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं। गंगा ऋग्वेदमूर्ति,