भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 928
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ८९९ यमुना यजुर्वेदमूर्ति, नर्मदा सामवेदमूर्ति और सरस्वती अथर्ववेदस्वरूपा हैं। इनमें भी गंगा ही सब नदियोंकी उत्पत्तिकी कारणभूता हैं, वे ही समुद्रको भी भरती हैं। इस भूमण्डलमें गंगाजीकी समता करनेवाली दूसरी कोई श्रेष्ठ नदी नहीं है। परंतु पूर्वकालमें नर्मदा नदीने बहुत वर्षोंतक तपस्या करके ब्रह्माजीको प्रसन्न किया। जब ब्रह्माजी वर देनेको उद्यत हुए, तब नर्मदाने इस प्रकार प्रार्थना की- 'भगवन्! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजीके समान कर दीजिये।' तब ब्रह्माजीने मुसकराते हुए कहा- 'यदि दूसरा कोई देवता भगवान् त्रिलोचनकी समता प्राप्त कर ले, दूसरा कोई पुरुष पुरुषोत्तम श्रीविष्णुके समान हो जाय, दूसरी कोई नारी भगवती पार्वतीकी समानता कर ले तथा दूसरी कोई नगरी काशीपुरीकी बराबरी कर सके तो दूसरी नदी भी गंगाके समान हो सकती है।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर नर्मदा उनके वरदानका त्याग करके काशीपुरीमें चली गयी। वहाँ भगवान् त्रिलोचनके समीप पिलपिलातीर्थमें उसने विधिपूर्वक शिवलिंग स्थापित किया। तब उस पुण्यात्मा नदीके ऊपर भगवान् शंकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले- 'सौभाग्यशालिनि! तुम अपनी रुचिके अनुसार वर माँगो।' यह सुनकर सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा बोली- 'देवेश्वर! तुच्छ वर माँगनेसे क्या लाभ? आपके युगलचरणोंमें मेरी निर्द्वन्द्व भक्ति बनी रहे।' नर्मदाकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हो बोले- 'नर्मदे! तुम्हारे तटपर जितने भी प्रस्तरखण्ड हैं, वे सब मेरे वरसे शिवलिंगस्वरूप हो जायँगे। गंगामें स्नान करनेपर शीघ्र ही पापका नाश होता है, यमुना सात दिनके स्नानसे और सरस्वती तीन दिनके स्नानसे सब पापोंका नाश करती है, परंतु तुम दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण पापोंका निवारण करनेवाली होओगी। तुमने जो यहाँ नर्मदेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की है, वह लिंग परम पुण्यमय तथा शाश्वत मोक्ष देनेवाला होगा।' ऐसा कहकर देवदेवेश्वर भगवान् शिव उसी लिंगमें लीन हो गये। अद्भुत पवित्रता पाकर नर्मदा भी बहुत सन्तुष्ट हुई। वह दर्शनमात्रसे पापहारिणी बनकर अपने देशको चली गयी। इस प्रकार मार्कण्डेय मुनिका वचन सुनकर वे सब मुनीश्वर प्रसन्नचित्त हो गये और उन्होंने अपने-अपने हितका कार्य किया। नर्मदेश्वरके इस माहात्म्यको सुनकर भक्तियुक्त मनुष्य पापरूपी केंचुलका त्याग करके उत्तम ज्ञान प्राप्त करेगा। स्कन्दजी कहते हैं- महादेवीजी जब रुद्र-भावको प्राप्त हुए, तब महादेवी जगदम्बा दक्षकन्या सतीके रूपमें प्रकट हुईं। उन्होंने भी काशीमें तीव्र तपस्या की। उनकी तपस्याका उद्देश्य था, अपने अनुरूप श्रेष्ठ वरको प्राप्त करना। तपस्या करते-करते उन्होंने देखा, सामने भगवान् शंकर लिंगरूपमें प्रकट हुए हैं और स्पष्ट बोल रहे हैं- 'महादेवि! अब तपस्याकी आवश्यकता नहीं, यह सतीश्वर लिंग तुम्हारे नामसे विख्यात होगा। दक्षकुमारी! यहाँ आकर जैसे तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ है, उसी प्रकार इस लिंगकी आराधना करके दूसरोंका मनोरथ भी सफल होगा। कुमारी कन्या इस शिवलिंगकी पूजासे उत्तम पति प्राप्त करेगी और कुवाँरा पुरुष इसकी आराधनासे सुन्दर स्त्री प्राप्त करेगा। सतीश्वरकी भलीभाँति पूजा करके जो जिस फलको चाहेगा, उसे वह मनोवांछित फल शीघ्र ही प्राप्त होगा। आजसे आठवें दिन तुम्हारे पिता दक्ष प्रजापति तुम्हारा विवाह मेरे साथ करेंगे। तुम्हारा मनोरथ सफल हुआ।' ऐसा कहकर देवदेवेश्वर शिव वहीं (उस लिंगमें) अन्तर्धान हो गये। दाक्षायणी भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको लौट गयीं। फिर आठवें दिन उनके पिताने भगवान् शंकरके साथ उनका विवाह कर दिया। स्कन्दजी कहते हैं- इस प्रकार काशीमें सतीश्वर लिंग प्रकट हुआ। रत्नेश्वरके पूर्वभागमें सतीश्वरका दर्शन करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त होता और क्रमशः ज्ञान प्राप्त कर लेता है। o In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth