भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 929

९०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

अमृतेश्वर लिंगकी महिमा तथा व्यासोक्त व्रत एवं धर्मोंका निरूपण

स्कन्दजी कहते हैं—मुने! पूर्वकालकी बात है। यहाँ काशीपुरीमें सनारु नामवाले एक मुनि थे, जो गृहस्थ-आश्रमके धर्मका पालन करनेवाले, ब्रह्मयज्ञपरायण, अतिथिपूजक, शिवलिंग-पूजनमें तत्पर रहनेवाले और तीर्थमें दान नहीं लेनेवाले थे। उन सनारु मुनिके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम उपजंघनि था। वह किसी दिन वनमें गया और वहाँ उसको एक साँपने डस लिया। तदनन्तर उसके समवयस्क मित्र उसे उठाकर आश्रममें ले आये। सनारुने लंबी साँस खींचकर उपजंघनिको स्वर्गद्वारके समीप महाश्मशानभूमिमें पहुँचाया। वहाँ श्रीफलके समान आकारवाला एक अत्यन्त गुप्त शिवलिंग था। वहीं उस शवको रखकर वे विचार करने लगे कि सर्पसे डसे हुए मनुष्यका दाह-संस्कार कैसे किया जाता है। इतनेमें ही उपजंघनि सोकर उठे हुएके समान जी उठा। उसे जीवित देख सनारु मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ। इसी समय एक चींटी कहीं मरे हुए एक चींटेको खींचकर वहाँ ले आयी। उस स्थानपर आते ही वह चींटा भी जी उठा और रेंगता हुआ अन्यत्र चला गया। यह देखकर मुनिने सोचा ‘यहाँ कोई ऐसा तत्त्व अवश्य है, जिसमें मरे हुएको जीवित कर देनेकी शक्ति विद्यमान है।' ऐसा अनुमान करके मुनि अपने कोमल हाथसे धीरे-धीरे वहाँकी जमीन खोदने लगे। इतनेमें ही उन्हें श्रीफलके बराबर एक शिवलिंग दिखायी दिया। तब सनारुने वहाँ उसका पूजन किया और उस प्राचीन लिंगका नाम अमृतेश्वर रखा, जो अत्यन्त सार्थक था। वे बोले—'आनन्दवनमें यह अमृतेश्वर लिंग है। इसके स्पर्शसे निश्चय ही अमृतत्वकी प्राप्ति हो सकती है।' जिनका मरा हुआ पुत्र जी उठा था, वे सनारु मुनि अमृतेश्वरकी पूजा करके अपने घरको गये। तभीसे अमृतेश्वर लिंग काशीमें प्रसिद्ध हुआ, जो मनुष्योंको सिद्धि देनेवाला है। कलियुगमें वह पुनः गुप्त हो जायगा। अमृतेश्वरके संस्पर्शसे मरे हुए व्यक्ति तत्काल जी उठते हैं और जीवित मानव उसके स्पर्शसे जीवन्मुक्त हो जाते हैं। अमृतेश्वरके समान शिवलिंग इस भूतलमें कहीं भी नहीं है। भगवान् शिवने इसे यत्नपूर्वक गुप्त कर रखा है।

अगस्त्यजी बोले—स्कन्दजी! श्रीवेदव्यास इन्द्रिय-शुद्धिके लिये जिन कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रतोंका निरूपण करेंगे, उनके स्वरूपका आप मुझसे वर्णन कीजिये।

स्कन्दजी बोले—महाबुद्धे! दिनमें एक बार भोजन करना, दूसरे दिन केवल रातमें एक बार भोजन करना, तीसरे दिन बिना माँगे जो कुछ मिल जाय उसीका एक बार आहार करना और चौथे दिन अखण्ड उपवास करना—इस प्रकार किया जानेवाला व्रत ‘पादकृच्छ्र’ कहलाता है। बरगद, गूलर, कमल, बिल्वपत्र और कुश—इनके पत्तोंसे क्रमशः एक-एक दिन जल पीकर रहना ‘पर्णकृच्छ्र’ कहा गया है। तिलकी खली, घी, मट्ठा, जल और सत्तू—इनको क्रमशः एक-एक दिन एक-एक बार खाकर रहना और अन्तमें एक दिन उपवास करना यह ‘सौम्यकृच्छ्र’ कहा गया है। तीन दिन प्रातःकाल हविष्य भोजन करना, तीन दिन सायंकाल भी हविष्य ग्रहण करना, फिर तीन दिन बिना माँगे प्राप्त होनेवाले हविष्यका आहार करना और अन्तमें तीन दिन अखण्ड उपवास करना—यह ‘कृच्छ्र’ व्रत है। ‘अतिकृच्छ्र’ व्रतका पालन करनेवाला द्विज प्रतिदिन एक-एक ग्रास करके तीन दिन प्रातःकाल, फिर तीन दिनतक सायंकाल भोजन करे और तीन दिन अयाचित आहार ग्रहण करके अन्तमें तीन दिनतक उपवास करे। केवल दूधसे इक्कीस दिनतक निर्वाह करना ‘कृच्छ्रातिकृच्छ्र’ व्रत है। बारह दिन अखण्ड उपवास करनेसे ‘पराकव्रत’ होता है। ‘प्राजापत्य’ व्रतका अनुष्ठान करनेवाला द्विज तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल