भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 930
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ९०१

और तीन दिन अयाचित अन्न ग्रहण करे, फिर अन्तमें तीन दिनतक उपवास करे। एक दिन गोमूत्र, गोबर, दही, दूध, घी और कुशोदक—इन सबको मिलाकर पी ले और दूसरे दिन पूरे एक दिन-रातका उपवास करे तो यह 'कृच्छ्रसान्तपन' माना गया है। सान्तपनके छः द्रव्योंका पृथक्-पृथक् छः दिनोंमें उपयोग करके एक दिन उपवास करे अर्थात् एक दिन गोमूत्र पीकर, दूसरे दिन गोबर खाकर, तीसरे दिन दूध पीकर, चौथे दिन दही खाकर, पाँचवें दिन घृत पीकर, छठे दिन कुशका जल पीकर और सातवें दिन एक रातका उपवास करके एक सप्ताहमें किया हुआ यह कृच्छ्रव्रत 'महासान्तपन' कहा गया है। 'तप्तकृच्छ्र' व्रतका आचरण करनेवाला ब्राह्मण प्रतिदिन एक बार स्नान करके एकाग्रचित्त हो गरम जल, दूध, घी और वायु—इन चारोंको तीन-तीन दिनतक पान करे अर्थात् तीन दिन गरम जल पीये, तीन दिन गरम दूध पीये, तीन दिन गरम घी खाय और तीन दिन केवल वायु पीकर रहे। एक भर दूध, दो भर घी और एक भर जल ग्रहण करना—इसीको 'तप्तकृच्छ्र' कहा गया है। जो गोमूत्रके साथ यवान्न भोजन करता है, उसके शरीरकी शुद्धि करनेवाला यह व्रत 'एकाह्निक कृच्छ्र' कहा गया है। दोनों हाथोंको उत्तान करके दिनमें वायुका पान करे तथा रातमें तबतक पानीमें खड़ा रहे जबतक कि प्रातःकाल न हो जाय। यह प्राजापत्य व्रतके समान माना गया है। कृष्णपक्षमें एक-एक ग्रास भोजन घटावे और शुक्लपक्षमें एक-एक ग्रास बढ़ावे और प्रतिदिन तीनों समय स्नान करे, यह 'चान्द्रायण व्रत' कहा गया है। अथवा पहले शुक्लपक्षमें प्रतिदिन एक-एक ग्रास बढ़ावे और कृष्णपक्षमें नित्य एक-एक ग्रास घटावे। अमावास्याको बिलकुल भोजन न करे, यह चान्द्रायणकी विधि है। ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो चार ग्रास अन्न सबेरे और चार ग्रास अन्न सूर्यास्त होनेके बाद ग्रहण करे। प्रतिदिन इसी प्रकार आठ ग्रास अन्न लेते हुए एक मासतक जो व्रत किया जाता है, उसे 'शिशु-चान्द्रायण' कहते हैं। प्रतिदिन मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए मध्याह्नकालमें केवल हविष्यके आठ ग्रास अन्न भोजन करे और एक मासतक इसी नियमसे रहे, तो इसे 'यति चान्द्रायण' कहते हैं। मनुष्य एकाग्रचित्त हो जिस किसी तरह भी एक मासमें हविष्यके दो सौ चालीस ग्रास ग्रहण करे, तो वह चन्द्रलोकको प्राप्त होता है। शरीरकी शुद्धि जलसे होती है, मनकी शुद्धि सत्यसे होती है, जीवात्माकी शुद्धि विद्या और तपसे होती है। और बुद्धि ज्ञानसे शुद्ध होती है। वह ज्ञान मनुष्योंको काशीसेवनसे प्राप्त होता है। काशीसेवनसे भगवान् विश्वनाथकी करुणाका उदय होता है, और उससे महान् अभ्युदयकी प्राप्ति होती है, जो कर्मबन्धनका उन्मूलन करनेमें समर्थ है। अतः काशीमें प्रयत्नपूर्वक स्नान, दान, तप, जप, व्रत, पुराण-श्रवण तथा धर्मशास्त्रोक्त मार्गका सेवन करना चाहिये। प्रतिदिन और प्रतिक्षण विश्वनाथजीके चरणोंका चिन्तन, तीनों समय शिवलिंगका पूजन, शिवलिंगकी स्थापना साधुपुरुषोंके साथ वार्तालाप, सम्भाषण, 'शिव'-'शिव' इस मन्त्रका जप, अतिथिसत्कार, तीर्थनिवासियोंसे मैत्री, आस्तिक्य बुद्धि, विनय, मान-अपमानमें समान बुद्धि, किसी वस्तुकी इच्छाका न होना, उद्दण्डताका अभाव, राग-द्वेषशून्यता, अहिंसा, अप्रतिग्रह और दयापूर्ण बुद्धि, दम्भ और ईर्ष्याका अभाव, बिना माँगे प्राप्त हुए धनका अंगीकार करना, लोभ और आलस्यका अभाव, कठोरताका त्याग तथा कभी दैन्यभावका आश्रय न लेना इत्यादि उत्तम प्रवृत्तियोंको काशीक्षेत्रमें रहनेवाले लोग अपनावें और उनका पालन करें। इस प्रकार वेदव्यास अपने शिष्योंको प्रतिदिन धर्मका उपदेश करते थे।

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