संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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काशीके तीर्थोंका संक्षिप्त वर्णन
पार्वतीजी बोलीं—प्रभो! काशीमें जहाँ-जहाँ जो-जो तीर्थ हैं, उन-उनको बतानेकी कृपा करें।
महादेवजी बोले—देवि! काशीमें महादेवेश्वर प्रथम तीर्थ कहे जाते हैं। उसके उत्तरमें सारस्वत महाकूप है, जो सरस्वतीकी प्राप्ति करानेवाला है। क्षेत्रके पूर्वोत्तर भागमें जीवोंके अज्ञानका नाश करनेवाला यह तीर्थ है। उसके पश्चिम भागमें मूर्तिमती काशीपुरी है, जो मनुष्योंके द्वारा पूजनीय है। महादेवके स्थानसे पूर्वभागमें गोप्रेक्षेश्वर नामक उत्तम लिंग है। वहाँ पूर्वकालमें स्वयं भगवान् शंकरने गोलोकसे गौओंको भेजा था। गोप्रेक्षेश्वरसे दक्षिण भागमें दधीचीश्वर और दधीचीश्वरसे पूर्वमें अत्रीश्वर हैं। अत्रीश्वर लिंगका यत्नपूर्वक दर्शन करनेवाला मनुष्य विष्णुलोकको जाता है। गोप्रेक्षेश्वरसे पूर्वभागमें विज्ज्वर नामक लिंग भी है। विज्ज्वरके पूर्वभागमें वेदेश्वर लिंग है, वेदेश्वरसे उत्तरमें क्षेत्रज्ञ आदिकेशव हैं। उससे पूर्वमें संगमेश्वर, संगमेश्वरसे पूर्वमें ब्रह्माजीद्वारा स्थापित चतुर्मुख लिंग है। उसीका दूसरा नाम प्रयाग लिंग भी है, जो पूजित होनेपर ब्रह्मलोक देनेवाला है। वहीं शान्तिकरी गौरीका स्थान है, जो आराधित होनेपर शान्तिकारक होती हैं। वरणाके पूर्वतटपर कुन्तीश्वर लिंग है। उससे उत्तरमें कपिल कुण्ड है। गोप्रेक्षेश्वरसे उत्तर भागमें आनुसूयेश्वर लिंग है। उससे पूर्वमें सिद्धिविनायक हैं और उसके पश्चिममें हिरण्यकशिपुद्वारा स्थापित शिवलिंग है। उससे पश्चिम मुण्डासुरेश्वर लिंग है। गोप्रेक्षेश्वरसे नैर्ऋत्य कोणमें वृषभेश्वर लिंग है। महादेवेश्वरके पश्चिममें स्कन्देश्वर लिंग है। उसके पास ही शाखेश्वर और विशाखेश्वर लिंग हैं। वहीं नैगमेयेश्वर लिंग और नन्दी आदि गणोंद्वारा स्थापित सहस्रों लिंग हैं। नन्दीश्वरसे पश्चिम शिलादेश्वर हैं और वहीं हिरण्याक्षेश्वर भी हैं। उससे दक्षिण अट्टहास लिंग है। उसके उत्तरमें प्रसन्नवदनेश्वर हैं। उनसे उत्तर भागमें प्रसन्नोद कुण्ड है। अट्टहासेश्वरसे पश्चिम भागमें मित्रेश्वर और वरुणेश्वर हैं। अट्टहासेश्वरसे नैर्ऋत्य कोणमें वृद्धवासिष्ठ लिंग है। वसिष्ठेश्वरके समीप कृष्णेश्वर हैं। उनसे दक्षिणमें याज्ञवल्क्येश्वर हैं। उनसे पश्चिम प्रह्लादेश्वर हैं। जहाँ भक्तोंपर दया करनेके लिये साक्षात् भगवान् शिव लीन हुए हैं, वह स्वलीनेश्वर नामक लिंग प्रह्लादेश्वरसे पूर्वभागमें है। स्वलीनेश्वरके समीपमें शरीर त्याग करनेवालोंकी मुक्ति होती है। स्वलीनेश्वरसे पूर्व वैरोचनेश्वर लिंग है। उससे उत्तरमें वलीश्वर और वहीं बाणेश्वर लिंग है। चन्द्रेश्वरसे पूर्व विघ्नेश्वर नामक लिंग है। उसके दक्षिण भागमें वीरेश्वर हैं। वहीं सब दुःखोंसे मुक्त करनेवाली विकटादेवी विद्यमान हैं। वहाँ जपे हुए महामन्त्र शीघ्र सिद्ध होते हैं। उस पीठके वायव्य कोणमें सगरेश्वर हैं। उनसे ईशान कोणमें वालीश्वर हैं और वालीश्वरसे उत्तर सुग्रीवेश्वरजी विद्यमान हैं। वहीं जाम्बवदीश्वर हैं। गंगाके पश्चिम तटपर आश्विनेयेश्वर नामक दो लिंग हैं। उनसे उत्तरमें गोदुग्धसे भरा हुआ भद्रकुण्ड है। सहस्रों कपिलाओंका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही भद्रकुण्डमें स्नान करनेसे प्राप्त होता है। भद्रकुण्डके पश्चिम किनारे भद्रेश्वरके दर्शनजनित पुण्यसे मनुष्य गोलोकको प्राप्त होता है। भद्रेश्वरसे नैर्ऋत्य कोणमें उपशान्त्येश्वर शिव हैं, उनसे उत्तरमें चक्रेश्वर हैं। चक्रेश्वरके उत्तरमें चक्रकुण्ड है, उसके नैर्ऋत्य कोणमें शूलेश्वर हैं। शूलेश्वरसे पूर्वमें नारदजीने बड़ी भारी तपस्या की, शिवलिंग स्थापित किया और एक श्रेष्ठ कुण्डका भी निर्माण कराया है। नारदेश्वरके पूर्वभागमें अवभ्रातकेश्वर हैं। उसके आगे ताम्रकुण्ड है। उसके वायव्य कोणमें विघ्नहर्ता गणेश हैं, वहीं विघ्नहर कुण्ड भी है। उससे उत्तर उत्तम अनारकेश्वर लिंग है। उसके उत्तरमें वरणा नदीके मनोहर तटपर वरणेश्वर हैं। वरणेश्वरसे पश्चिममें शैलेश्वर हैं। शैलेश्वरसे दक्षिण कोटीश्वर लिंग है। कोटीश्वरसे अग्निकोणमें स्तम्भ है, जो कि कुलस्तम्भ नामसे