संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 932, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ९०३
प्रसिद्ध है। वहीं कपालेश्वरके समीप कपालमोचन तीर्थ है। उससे उत्तर दिशामें ऋणमोचन तीर्थ है। वहीं अंगारक-कुण्ड है। उससे उत्तरमें ज्ञानदाता विश्वकर्मेश्वर लिंग है। उसके दक्षिणमें महामुण्डेश्वर हैं। वहीं शुभोदक नामक कूप भी है। वहाँ खट्वांग धारण करनेसे खट्वांगेश्वर लिंगका प्रादुर्भाव हुआ है। उससे दक्षिणमें भुवनेश्वर लिंग और भुवनेश्वर कुण्ड हैं। उनके दक्षिण भागमें विमलेश्वर लिंग और विमलोदक कुण्ड हैं। उनके पश्चिममें भृगुका मन्दिर है और उससे दक्षिणमें शुभेश्वर तीर्थ है।
अगस्त्य ! इस प्रकार संक्षेपसे कुछ शिवलिंगोंका वर्णन किया गया है। कुछ लिंग ऐसे हैं, जो भक्तिपूर्वक दो-तीन बार स्थापित किये गये हैं। अतः उनको पुनरुक्त न मानकर श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। ये जो शिवलिंग, कुण्ड, कूप और वापी आदि बताये गये हैं, इन सबपर मनीषी पुरुषोंको श्रद्धा करनी चाहिये। इन सबके दर्शन और स्नानसे अधिकाधिक फल होता है। यहाँके शिवलिंग, कूप, सरोवर, बावड़ी तथा मूर्तियोंकी गणना करनेमें कौन समर्थ हो सकता है? क्योंकि आनन्दवनमें स्थित तृण भी बहुत श्रेष्ठ हैं। काशीपुरी दर्शन करनेपर तथा देहावसानतक सेवित होनेपर स्वर्ग और अपवर्गको देनेवाली है।
महादेवजी कहते हैं—देवी ! तुम तो तपोबलसे मेरी प्रियतमा हुई हो, परंतु काशीपुरी स्वभावसे ही मेरे लिये सुख और विश्रामकी भूमि है। जो काशीका नाम लेते हैं और जो उसे सुनकर प्रसन्न होते हैं, वे मेरे लिये शाख, विशाख, स्कन्द, नन्दी और गणेशके समान प्रिय हैं। वे ही मेरे भक्त, वे ही मेरे सेवक और वे ही मुमुक्षु हैं, जो आनन्दवनमें निवास करते हैं। जो काशीमें निवास करते हैं, उन्होंने ही भारी तपस्या की है, बड़े-बड़े व्रत किये हैं और महादान किये हैं। वे ही सब तीर्थोंमें स्नानके पुण्यसे युक्त हैं और उन्होंने ही हिंसारहित यज्ञोंकी दीक्षा ली है। जिन्हें काशीका निवास प्राप्त है, उन्हींके द्वारा सब धर्मोंका अनुष्ठान हुआ है। जो विद्वान् पुरुष इस सर्वलिंगमय अध्यायका जप करता है, उसे यम और यमदूतोंकी बाधा नहीं होती। जो पवित्र और तद्गत चित्त होकर इस अध्यायका पाठ करता है, उस पुण्यात्माको ब्रह्मयज्ञका फल प्राप्त होता है। जो मेरे द्रोही, नास्तिक और वेदोंकी निन्दामें तत्पर हैं, ऐसे लोगोंको इसका उपदेश नहीं देना चाहिये।
इस प्रकार महादेवजी पार्वतीदेवीके आगे यह सब कथा सुना रहे थे, इतनेमें ही नन्दीने आकर प्रणामपूर्वक सूचित किया—भगवन् ! विशाल-मन्दिर-निर्माणका कार्य अब पूरा हो गया। रथ सुसज्जित होकर तैयार है और ब्रह्मा आदि देवता भी एकत्र हो गये हैं। भगवान् विष्णु गरुड़पर आरूढ़ होकर अपने पार्षदोंसहित द्वारपर खड़े हैं और महामुनीश्वरोंको आगे करके अवसरकी प्रतीक्षा करते हैं। चौदहों भुवनोंमें जो-जो उत्तम व्रतवाले पुरुष हैं, वे आज मन्दिरप्रवेशके महोत्सवका समाचार सुनकर यहाँ एकत्र हो गये हैं।
स्कन्दजी कहते हैं—नन्दीका यह वचन सुनकर महादेवजी पार्वतीजीके साथ दिव्य रथपर बैठकर त्रिविष्टप क्षेत्रसे निकले।
~~ ० ~~
भगवान् शिवके मुखसे विश्वेश्वर लिंगकी महिमाका वर्णन
स्कन्दजी कहते हैं—मुने ! मोक्षलक्ष्मीविलास नामक प्रासाद बन जानेपर महादेवजीने विरजपीठसे चलकर अन्तर्गृहमें प्रवेश किया। कार्तिक शुक्ला प्रतिपदाको अनुराधानक्षत्रसे युक्त बुधवारके दिन जब चन्द्रमा सप्तम राशिपर थे और शेष ग्रह भी उच्च स्थानोंमें स्थित थे, उस समय भगवान् शंकरने नूतन प्रासादमें प्रवेश किया। प्रवेशकालमें नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे, सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न थीं, ब्राह्मणोंके वेदमन्त्रोच्चारणकी ध्वनिसे अन्य प्रकारके शब्द दब गये थे। भूलोकसे लेकर भुवर्लोकके बीचका मार्ग उसकी प्रतिध्वनिसे गूँज रहा था। भगवान् शिवके उस प्रवेशकालिक महोत्सवमें