संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सम्पूर्ण जगत् आनन्दमग्न हो रहा था। गन्धर्व गाते थे, अप्सराएँ नृत्य करती थीं, चारण स्तुति करते थे और देवता हर्ष मना रहे थे। सुगन्धित वायु चल रही थी और बादल फूलोंकी वर्षा करते थे। सब लोग मांगलिक वेष-भूषासे विभूषित थे, सभी मांगलिक वचन बोलते थे, स्थावर और जंगम सभी प्रकारके जीव आनन्दमें मग्न थे।
तदनन्तर ब्रह्माजीने महर्षियोंके साथ आकर पार्वतीके साथ शुभ सिंहासनपर बैठे हुए तथा कुमारवृन्दसे घिरे हुए देवाधिदेव महादेवजीका अभिषेक किया। देवताओं और बड़े-बड़े नागराजोंने असंख्य रत्नों, नाना प्रकारके दुकूलों तथा विचित्र-विचित्र सुगन्धित पुष्पहारोंसे महेश्वरका पूजन किया। मातृगणोंने आरती उतारी। तत्पश्चात् अखिल देववृन्दके द्वारा वन्दनीय भगवान् शिवने सबसे पहले मुनीश्वरोंको चिरवांछित मनोरथ देकर सन्तुष्ट किया। फिर ब्रह्माजीसे बातचीत करके भगवान् विष्णुसे कहा—‘देव! तुम यहाँ आकर बैठो, मेरी समस्त प्रभुताके एकमात्र हेतु तुम्हीं हो। तुम दूर रहकर भी मेरे निकट हो, तुमसे बढ़कर मेरा कार्य करनेवाला कोई नहीं है। तुम्हींने अपने सदुपदेशोंसे राजाओंमें श्रेष्ठ दिवोदासको ऐसी शिक्षा दी, जिससे वे परम सिद्धिको प्राप्त हुए और मेरा भी मनोवांछित कार्य सिद्ध हो गया। आज मुझको जो यह आनन्दवन प्राप्त हुआ है, इसमें तुम और गणेश ये ही दो कारण हैं। जहाँ मरे हुए जन्तुओंका फिर जन्म नहीं होता, वह ब्रह्मरसायनकी खान काशीपुरी मेरे लिये जैसी उत्तम सुखकी भूमि है, वैसी प्रिय तीनों लोकोंमें कोई भी वस्तु नहीं है।’
विष्णुजी बोले—पिनाकपाणे! मैं आपके चरणारविन्दोंसे दूर न होऊँ।
मधुसूदनका यह वचन सुनकर महादेवजी बहुत प्रसन्न और सन्तुष्ट होकर बोले—मुरारे! मोक्षलक्ष्मीके आश्रयभूत इस स्थानपर तुम सदा मेरे समीप रहो। भक्तियुक्त होकर भी जो पहले तुम्हारी आराधना किये बिना मेरी सेवा-पूजा करेगा, उसकी मनोवांछा कदापि सिद्ध न होगी। अच्युत! इस मुक्तिमण्डपमें रहकर जो मुझे सब ओरसे सुख प्राप्त होता है, वह अत्यन्त निर्मल कैलास पर्वतपर भी नहीं मिलता और निश्चल शोभावाले भक्त-हृदयमें भी वैसे सुखकी प्राप्ति नहीं होती। जिनकी चित्तवृत्तियाँ स्थिर हैं, जो मेरे अनन्य भक्त तथा दृढ़ हृदयवाले हैं, वे यदि इस दक्षिण मण्डपमें पलभर भी स्थित होते हैं तो उन्हें पुनः गर्भावस्थामें नहीं आना पड़ता।
वहाँ पूर्वाभिमुख बैठे हुए महेश्वरके दक्षिण भागमें ब्रह्माजी और वामपार्श्वमें विष्णु स्थित हुए। देवराज इन्द्र उन्हें चवँर डुलाते थे, ऋषि उनको सब ओरसे घेरकर खड़े थे, पार्षदगण भगवान्के पृष्ठ भागमें चुपचाप आदरपूर्वक खड़े हुए थे और बहुत सम्मानवाले तथा हाथोंमें आयुध उठाये रहनेवाले अनेक सेवक उनकी सेवामें उपस्थित थे। उस समय महादेवजीने अपना दाहिना हाथ उठाकर भगवान् ब्रह्मा और विष्णुको एक शिवलिंग दिखलाया और कहा—‘सब लोग देखो, यही परम ज्योति है, यही परात्पर ब्रह्म है और यही अत्यन्त सिद्धिदायक मेरा स्थावर रूप है। यहाँ जो ये मेरे भक्त रहते हैं, ये सिद्ध हैं, आबाल ब्रह्मचारी हैं, जितेन्द्रिय, तपस्वी, पंचाक्षर मन्त्रके ज्ञानसे निर्मल, भस्मसमूहपर शयन करनेवाले, इन्द्रियसंयमी, सुशील, ऊर्ध्वरेता, लिंगार्चनपरायण, मन और इन्द्रियोंको मेरे सिवा अन्यत्र न ले जानेवाले, जल और भस्मद्वारा स्नान करके अत्यन्त पवित्र, कन्द, मूल और फल भोजन करनेवाले, परम-तत्त्व सदाशिवकी ओर सदैव दृष्टि रखनेवाले, क्रोधको जीतनेवाले, मोहरहित, परिग्रहशून्य, निष्काम, निष्प्रपंच, निर्भय, नीरोग, धन-ऐश्वर्यसे रहित, निःसंग, निर्मल अन्तःकरणवाले, भयंकर संसारसागरके पार पहुँचे हुए, निर्विकल्प, निष्पाप, निर्द्वन्द्व, सिद्धान्तभूत अर्थको ग्रहण करनेवाले, अहंकारकी वृत्तियोंसे रहित, सदा ही मेरे परम प्रिय, मेरे पुत्रतुल्य तथा मेरे ही स्वरूप हैं। मेरी सेवामें संलग्न रहनेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे मेरे इन भक्तोंको सदा ही मेरा स्वरूप समझकर