भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 934, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 934
  • काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ९०५

इनका पूजन और नमस्कार करें। इनका पूजन करनेपर मैं बहुत प्रसन्न होऊँगा। मैं कभी किसीको प्रत्यक्ष दर्शन देता हूँ और कभी अदृश्य होता हूँ। देवताओ! सर्वदा सब भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये मैं इस आनन्दवनमें सदा स्वेच्छासे निवास करता हूँ और भक्तोंको मनोवांछित फल देनेवाला मैं यहाँ लिंगरूपसे सदैव निवास करता रहूँगा। इस तीर्थमें स्वयम्भू और अस्वयम्भू जितने भी लिंग हैं, वे सब सदा इस लिंगका दर्शन करनेके लिये आते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि मैं सम्पूर्ण लिंगोंमें समान रूपसे स्थित हूँ तथापि यह तो लिंगस्वरूपा मेरी परा मूर्ति है। जिसने श्रद्धा और शुद्धदृष्टिसे मेरे इस लिंगका दर्शन किया है, उसने मानो मेरा प्रत्यक्ष दर्शन कर लिया है। ऋषियोंके साथ सम्पूर्ण देवता सुन लें—इस श्रेष्ठ लिंगका नाम श्रवण करनेसे भी जन्मभरका पातक क्षणभरमें नष्ट हो जाता है और इसके स्मरणसे दो जन्मोंका पाप दूर होता है। इस उत्तम लिंगके दर्शनके उद्देश्यसे अपने घरसे निकलते समय ही तीन जन्मोंका संचित किया हुआ महापाप भी लीन हो जाता है। देवताओ! मुझ विश्वेश्वरके इस स्वयम्भू लिंगका स्पर्श करनेमात्रसे सहस्रों राजसूय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। इस लिंगराजकी भक्तिपूर्वक पूजामात्र करनेसे सहस्रों सुवर्णकमलोंद्वारा पूजन करनेका फल प्राप्त होता है। जो पंचामृत आदिके साथ इस शिवलिंगकी महापूजा करता है, उसे चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति होती है। देवताओ! वस्त्रसे छाने हुए जलके द्वारा इस लिंगको स्नान कराकर श्रेष्ठ पुरुष एक लाख अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। जो इस विश्वेश्वर लिंगका दर्शन करके अन्यत्र भी मृत्युको प्राप्त होता है, उसकी भी जन्मान्तरमें मुक्ति हो जाती है। जिसकी जिह्वाके अग्रभागमें 'विश्वनाथ' यह नाम विराज रहा है, कानोंमें विश्वनाथकी कथा सुनायी पड़ती है और चित्तमें भगवान् विश्वनाथका चिन्तन हो रहा है, उसका इस संसारमें जन्म कैसे हो सकता है। जो मुझ विश्वनाथके लिंगमय विग्रहका दर्शन करके मन-ही-मन प्रसन्न होता है, वह अपने महान् पुण्यके बलसे मेरे गणोंमें गिना जाता है। जो प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओंके समय 'विश्वनाथ, विश्वनाथ, विश्वनाथ' का जप करता है, उस पुण्यात्माका नाम मैं भी निश्चय ही जपता रहता हूँ। देवताओ! यह महालिंग मेरे द्वारा भी सदैव पूजन करने योग्य है। इसलिये देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंको तो सर्वथा प्रयत्न करके इसकी पूजा करनी चाहिये। जिन्होंने इस लिंगको प्रणाम किया है, वे देवताओं और दैत्योंसे भी वन्दित होते हैं। 'मैं अपनी भुजा उठाकर बारंबार इस बातको दोहराता हूँ कि इस त्रिगुणमय जगत्में तीन ही सार वस्तु हैं—विश्वनाथ लिंग, मणिकर्णिकाका जल और काशीपुरी।'

तदनन्तर महादेवजीने पार्वतीजीके साथ उठकर उस शुभ लिंगका स्वयं सुन्दर पूजन किया और फिर उसीमें लीन हो गये। तब उन देवताओंने जय-जयकारपूर्वक महेश्वरका स्तवन किया। अगस्त्य! इस प्रकार इस अविमुक्त क्षेत्रके प्रभावका एक अंशमात्र बताया गया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। तुम थोड़े ही समयमें पुनः उत्तम काशीपुरीको प्राप्त होओगे। देखो, ये भगवान् सूर्य अस्ताचलके शिखरपर जा चुके हैं। इसलिये अब तुम्हारे और मेरे लिये भी मौन धारण करनेका समय आया है।

व्यासजी कहते हैं—सूत! इस प्रकार काशीकी महिमा सुनकर लोपामुद्रासहित मुनिवर अगस्त्य पार्वतीजीके पुत्र स्कन्दको बार-बार प्रणाम करके सन्ध्योपासनाके लिये चले गये। चन्द्रशेखर भगवान् शिवके क्षेत्र काशीधामका रहस्य जानकर अगस्त्यजी स्थिरचित्त हो शिवके ध्यानमें तत्पर हो गये। सूत! इस आनन्दवनकी बड़ी भारी महिमा है। कौन ऐसा मनुष्य है, जो सैकड़ों वर्षोंमें भी इसकी महिमाका वर्णन कर सकता है? परमात्मा शिवने पार्वतीजीसे काशीका जैसा माहात्म्य कहा था, वैसा ही स्कन्दने भी महर्षि अगस्त्यको सुनाया था। फिर उसी प्रसंगको मैंने तुम्हारे और शुकदेव आदिके आगे भलीभाँति कहा है।

~~ ० ~~