भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 935

९०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पंचतीर्थी, चतुर्दश आयतन, अष्ट आयतन, शैलेशादि और एकादश आयतनोंकी यात्रा, गौरीयात्रा, गणेशयात्रा, अन्तर्गृहयात्रा तथा विश्वनाथयात्राका वर्णन

सूतजी बोले—सत्यवतीनन्दन ! सिद्धिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंके हितके लिये आप काशी-यात्राके क्रमका वर्णन कीजिये।

व्यासजीने कहा—महाप्राज्ञ सूत ! ध्यान देकर सुनो। यात्रियोंको सबसे पहले (१) चक्रपुष्करिणी (मणिकर्णिका)-के जलमें वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये। फिर देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मणों एवं याचकोंको तृप्त करके (२) आदित्य, द्रौपदी, विष्णु, दण्डपाणि और महेश्वरको नमस्कार करे। तत्पश्चात् (३) ढुण्ढिराज गणेशका दर्शन करनेके लिये जाय। (४) उसके बाद ज्ञानवापीमें आचमन करके नन्दिकेश्वरका पूजन करे, साथ ही तारकेश्वरकी पूजा करके महाकालेश्वरका भी पूजन करे। (५) तदनन्तर पुनः दण्डपाणिका दर्शन, पूजन करे। यह पंचतीर्थी यात्रा कहलाती है। महान् फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको प्रतिदिन यह यात्रा करनी चाहिये। इसके बाद विश्वनाथकी यात्रा करे, जो समस्त प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाली है। कृष्णपक्षकी प्रतिपदासे लेकर चतुर्दशीपर्यन्त विधिपूर्वक चौदह आयतनोंकी भी प्रयत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। अथवा क्षेत्रसिद्धिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको प्रत्येक चतुर्दशीमें यात्रा करनी चाहिये। भिन्न-भिन्न तीर्थोंमें स्नान और वहाँके शिवलिंगोंकी पूजा करके मौनपूर्वक यात्रा करनेवाला यात्री मनोवांछित फलको पाता है। पहले मत्स्योदरीमें स्नान और तर्पण आदि करके ॐकारेश्वरका दर्शन करे। तत्पश्चात् क्रमशः त्रिविष्टप, महादेव, कृत्तिवासा, रत्नेश्वर, चन्द्रेश्वर, केदार, धर्मेश्वर, वीरेश्वर, कामेश्वर, विश्वकर्मेश्वर, मणिकर्णीश्वर और अविमुक्तेश्वरका दर्शन करके अन्तमें विश्वनाथजीका दर्शन-पूजन करना चाहिये। काशीक्षेत्रमें निवास करनेवाले पुरुषको यह यात्रा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिये। जो काशी-क्षेत्रमें रहकर इस यात्राको नहीं करता, उसे उस क्षेत्रसे मनको उचाट देनेवाले विघ्न प्राप्त होते हैं। इन विघ्नोंकी शान्तिके लिये अन्य आठ स्थानोंकी यात्रा करनी चाहिये। जिनके नाम इस प्रकार हैं—दक्षेश्वर, पार्वतीश्वर, पशुपतीश्वर, गंगेश्वर, नर्मदेश्वर, गभस्तीश्वर, सतीश्वर और आठवें तारकेश्वर। प्रत्येक अष्टमीको विशेषरूपसे इन लिंगोंका दर्शन करना चाहिये। यह दर्शन बड़े-बड़े पापोंकी शान्ति करनेवाला होता है। एक दूसरी भी शुभ यात्रा है, जो सदा योग और क्षेमकी सिद्धि करनेवाली है। वह सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करनेवाली भी है। काशीक्षेत्रके निवासियोंको वह यात्रा अवश्य करनी चाहिये। प्रथम वरणामें स्नान करके शैलेश्वरका दर्शन करे, फिर संगममें स्नान करके संगमेश्वरका दर्शन-पूजन करे। तत्पश्चात् स्वलीनतीर्थमें भलीभाँति स्नान करके स्वलीनेश्वरका दर्शन करे। उसके बाद मन्दाकिनी-तीर्थमें स्नान करके मध्यमेश्वरका दर्शन करे। हिरण्यगर्भ-तीर्थमें स्नान-तर्पणादि जलक्रिया करके हिरण्यगर्भेश्वरका दर्शन करे। तदनन्तर मणिकर्णिकामें स्नान करके ईशानेश्वरका, कूपमें स्पर्श एवं आचमन करके गोप्रेक्षेश्वरका, कापिलेय-कुण्डमें स्नान करके वृषभध्वजका, उपशान्तकूपमें जलक्रिया करके उपशान्त्येश्वरका तथा पंचचूडाकुण्डमें स्नान करके ज्येष्ठ स्थानका दर्शन एवं पूजन करे। फिर चतुःसमुद्रमें स्नान करके महादेवका पूजन करे, महादेवके आगे जो बावड़ी है, उसमें स्नान करके फिर शुक्रेश्वरका दर्शन करना चाहिये और वहीं कूपमें स्नान और तर्पण आदि कार्य भी पूरा करना चाहिये। तदनन्तर दण्डखात-तीर्थमें स्नान करके व्याघ्रेश्वरका पूजन करे। फिर शौनकेश्वर कुण्डमें स्नान करके जम्बुकेश्वर