संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- काशीखण्ड-उत्तरार्ध * ९०७
महालिङ्गकी आराधना करे। इस यात्राको पूर्ण करके मनुष्य संसाररूपी दुःखसागरमें फिर कभी जन्म नहीं लेता। यह यात्रा कृष्णाप्रतिपदासे आरम्भ करके चतुर्दशीतक क्रमसे करनी चाहिये। इसे कर लेनेपर पुनः संसारमें जन्म नहीं होता।
इसके सिवा ग्यारह मन्दिरोंकी एक यात्रा और है, जो करने ही योग्य है। आग्नीध्रकुण्डमें भलीभाँति स्नान करके आग्नीध्रेश्वरका दर्शन करे। उसके बाद उर्वशीश्वरतीर्थमें जाय। फिर वहाँसे नकुलीश्वरका दर्शन करके आषाढीश्वरका दर्शन करे। तत्पश्चात् भारभूतेश्वर, लांगलीश्वर तथा त्रिपुरान्तकका दर्शन करके मनःप्रकामेश्वर और प्रीतिकेश्वर-तीर्थमें जाय। वहाँसे क्रमशः मदालसेश्वर तथा तिलपर्णेश्वरकी यात्रा करे। इस प्रकार इन ग्यारह लिंगोंकी प्रयत्नपूर्वक यात्रा करनी चाहिये। इस यात्राको करनेवाला पुरुष रुद्रत्वको प्राप्त होता है।
इसके बाद मैं परम उत्तम गौरीयात्राका वर्णन करता हूँ। शुक्लपक्षकी तृतीयाको की हुई यह यात्रा सब ओरसे समृद्धि देनेवाली होती है। गोप्रेक्षतीर्थमें स्नान करके मुखनिर्मालिका गौरीके समीप जाय। फिर ज्येष्ठवापीमें स्नान करके मनुष्य ज्येष्ठा गौरीकी आराधना करे। तत्पश्चात् ज्ञानवापीमें स्नान और तर्पण आदि करके सौभाग्यगौरीकी पूजा करे, फिर वहीं जलसम्बन्धी कार्य करके शृंगारगौरीकी अर्चना करे। उसके बाद विशालगंगामें स्नान करके विशालाक्षीदेवीका दर्शन करनेके लिये जाय। तदनन्तर ललितातीर्थमें भलीभाँति स्नान करके ललितादेवीकी पूजा करे। तत्पश्चात् भवानीतीर्थमें स्नान करके भवानीका पूजन करे। फिर विन्दु-तीर्थमें स्नान आदि करके मंगलागौरीकी पूजा करनी चाहिये। वहाँसे स्थिर लक्ष्मीकी वृद्धिके लिये महालक्ष्मीके समीप जाय। इस मुक्तिदायक क्षेत्रमें यह गौरीयात्रा करके मनुष्य इहलोक या परलोकमें कहीं भी दुःखोंसे पीड़ित नहीं होता।
काशीमें प्रत्येक चतुर्थीको विघ्नराज गणेशके समीप यात्रा करे और गणेशजीकी प्रीतिके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको मोदक दान करे। मंगलवारको कालभैरवके दर्शनकी यात्रा करे। यह यात्रा सब पातकोंका नाश करनेवाली है। रविवारको अथवा रविवारयुक्त षष्ठी एवं सप्तमीको सूर्यदेवके दर्शनकी यात्रा करनी चाहिये। यह यात्रा सब विघ्नोंकी शान्ति करनेवाली है। नवमी अथवा अष्टमी तिथिको चण्डी देवीकी यात्रा शुभ मानी गयी है।
काशीके अन्तर्गृहकी यात्रा प्रतिदिन करनी चाहिये। पहले प्रातःकाल स्नान करके पाँचों विनायकोंको नमस्कार करे। फिर विश्वनाथजीको नमस्कार करके मुक्तिमण्डपमें स्थित हो 'मैं अपनी पापराशिके निवारणके लिये अन्तर्गृहकी यात्रा करूँगा'—इस प्रकार नियम लेकर पहले मणिकर्णिका तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करके मौनभावसे आकर मणिकर्णिकेश्वरकी पूजा करे। फिर कम्बल और अश्वतरको नमस्कार करके वासुकीश्वरको प्रणाम करे। तत्पश्चात् पर्वतेश्वरका दर्शन करके गंगाकेशवका दर्शन करे। फिर ललितादेवीका दर्शन करके जरासन्ध्येश्वरको नमस्कार करे। वहाँसे सोमनाथ और वाराहेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। तत्पश्चात् क्रमशः ब्रह्मेश्वर, अगस्तीश्वर, कश्यपेश्वर और हरिकेशवको नमस्कार करके वैद्यनाथका दर्शन करे। तत्पश्चात् ध्रुवेश्वरका दर्शन करके गोकर्णेश्वरका पूजन करते हुए हाटकेश्वरके समीप जाय। वहाँसे अस्थिक्षेप तड़ागपर जाकर कीकशेश्वरका दर्शन करे। वहाँसे आगे जाकर क्रमशः भारभूतेश्वर, चित्रगुप्तश्वर, चित्रघण्टादेवी तथा पशुपतीश्वरको नमस्कार करके पितामहेश्वरके समीप जाय। तत्पश्चात् कलशेश्वरका दर्शन करके क्रमशः चन्द्रेश्वर, वीरेश्वर, विघ्नेश्वर, अग्नीश्वर, नागेश्वर, हरिश्चन्द्रेश्वर, चिन्तामणि विनायक और सब विघ्नोंको हरनेवाले सेनाविनायकका दर्शन करे। तदनन्तर वसिष्ठ और वामदेव दोनों मूर्तिमान् महर्षियोंका काशीमें यत्नपूर्वक दर्शन करना चाहिये। ये दोनों बड़े-बड़े विघ्नोंका नाश करनेवाले हैं। तदनन्तर सीमाविनायक, करुणेश्वर, त्रिसन्ध्येश्वर, विशालाक्षी, धर्मेश्वर, विश्वभुजा, आशाविनायक, वृद्धादित्य, चतुर्वक्त्रेश्वर, ब्राह्मीश्वर, मनःप्रकामेश्वर,