भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 937

९०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ईशानेश्वर, चण्डी, चण्डीश्वर, भवानी, शंकर तथा ढुण्ढिराज गणेशका दर्शन एवं उन्हें प्रणाम करे। तदनन्तर राजराजेश्वरकी पूजा करे। उसके बाद लांगलीश्वर, नकुलीश्वर, पटान्नेश्वर, परद्रव्येश्वर, प्रतिग्रहेश्वर, निष्कलंककेश्वर और मार्कण्डेयेश्वरकी पूजा करके, अप्सरसेश्वर तथा गंगेश्वरका पूजन करे। तदनन्तर ज्ञानवापीमें स्नान करना चाहिये। स्नानके पश्चात् नन्दिकेश्वर, तारकेश्वर, महाकालेश्वर, दण्डपाणि, महेश्वर, मोक्षेश्वर, वीरभद्रेश्वर, अविमुक्तेश्वर तथा पाँचों विनायकोंको नमस्कार करके विश्वनाथजीका दर्शन करनेके लिये जाय। उसके बाद मौनव्रतका त्याग करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—

अन्तर्गृहस्य यात्रेयं यथावद् या मया कृता।
न्यूनातिरिक्तया शम्भुः प्रीयतामनया विभुः ॥

'मैंने जो यह अन्तर्गृहकी यथावत् यात्रा की है, इसमें न्यूनातिरिक्तताका दोष आ गया हो तो भी इसके द्वारा भगवान् विश्वनाथजी प्रसन्न हों।'

इस मन्त्रका उच्चारण करके क्षणभर मुक्तिमण्डपमें विश्राम करे। तत्पश्चात् निष्पाप एवं पुण्यवान् हुआ मनुष्य अपने घरको जाय। एकादशी तिथि आनेपर महान् पुण्यकी वृद्धिके लिये प्रयत्नपूर्वक काशीके सभी वैष्णव तीर्थोंकी यात्रा करे। भाद्रपदकी पूर्णिमाको कुलस्तम्भका पूजन करना चाहिये। उसकी पूजासे दुःख एवं रुद्रपिशाचताकी प्राप्ति नहीं होती। काशीक्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे श्रद्धापूर्वक इन सभी यात्राओंको करें। पर्वके दिन भी ये सभी यात्राएँ करनेयोग्य हैं। पुण्यात्मा एवं विद्वान् पुरुष यात्राके बिना कोई भी दिन व्यर्थ न बीतने दे। प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक दो यात्राएँ तो अवश्य करनी चाहिये। पहली गंगाकी, दूसरी विश्वनाथजीकी। काशीमें निवास करते हुए भी जिसका दिन यात्राके बिना व्यर्थ बीत जाता है, उसी दिन उसके पितर निराश हो जाते हैं। जिसने काशीमें रहकर भी जिस दिन विश्वनाथजीका दर्शन नहीं किया, उस दिन उस मनुष्यको मानो कालसर्पने डस लिया, मृत्युने देख लिया अथवा किसीने उसका सर्वस्व लूट लिया। जिसने मणिकर्णिकामें स्नान करके विश्वनाथजीका दर्शन कर लिया, उसने सब तीर्थोंमें नहा लिया और सब यात्राएँ पूरी कर लीं। यह सत्य है, सत्य है, सत्य है और बार-बार सत्य है। प्रतिदिन मणिकर्णिकामें स्नान और विश्वनाथजीका दर्शन अवश्य करना चाहिये।

व्यासजी कहते हैं—सूत! सहस्रों पाप किये होनेपर भी मनुष्य स्कन्दपुराणके इस उत्तम काशी-माहात्म्यका श्रवण करके नरकमें नहीं जाता। सब तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य जिस श्रेयका उपार्जन करता है, वह सब काशीखण्डके श्रवणसे अवश्य प्राप्त होता है। सम्पूर्ण काशीखण्डका श्रद्धापूर्वक पाठ अथवा श्रवण करे—यही सबसे बड़ी देवाराधना बतायी गयी है। जो काशीखण्डकी एक कथा भी सुन लेता है, उसने सम्पूर्ण धर्मशास्त्रोंका श्रवण कर लिया। इसमें संशय नहीं है। यह काशीखण्ड महान् धर्मका उत्पादक, महान् अर्थकी प्राप्ति करानेवाला तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिका हेतु बताया गया है। इसके श्रवणसे मनुष्योंके लिये मोक्षकी प्राप्ति दूर नहीं रह जाती। इस उत्तम खण्डको सुनकर सब पितर तृप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता प्रसन्न होते हैं, मुनि आनन्दमग्न होते हैं और सनकादि मुनीश्वर भी अत्यन्त सन्तुष्ट होते हैं। जो विद्वान् इस काशीखण्डको पूरा, आधा, एक चौथाई अथवा एक अष्टमांश भी सुनाता है, वह यत्नपूर्वक प्रणाम करनेयोग्य तथा इष्टदेवकी भाँति पूजनीय है। भगवान् विश्वनाथकी प्रीतिके लिये उसको सदा अन्न, धन आदिका दान करना चाहिये, क्योंकि वाचकके सन्तुष्ट होनेपर निःसन्देह भगवान् विश्वनाथ ही सन्तुष्ट होते हैं। जहाँ परमानन्दके आश्रयभूत इस काशीखण्डका पाठ किया जाता है, वहाँ कोई अमंगलजनक विघ्न अपना प्रभाव नहीं डालता है।


काशीखण्ड (उत्तरार्ध) समाप्त।