भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 938, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 938

ॐ श्रीपरमात्मने नमः श्रीउमामहेश्वराभ्यां नमः

संक्षिप्त श्रीस्कन्दमहापुराण

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आवन्त्यखण्ड

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अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य

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सनत्कुमारजीके द्वारा महाकालतीर्थकी श्रेष्ठताका निरूपण

स्रष्टारोऽपि प्रजानां प्रबलभवभयाद्यं नमस्यन्ति देवा यश्चित्ते सम्प्रविष्टोऽप्यवहितमनसां ध्यानयुक्तात्मनां च। लोकानामादिदेवः स जयतु भगवाञ्छ्रीमहाकालनामा विभ्राणः सोमलेखामहिवलययुतं व्यक्तलिङ्गं कपालम्॥

'प्रजाकी सृष्टि करनेवाले प्रजापति देव भी प्रबल संसार-भयसे मुक्त होनेके लिये जिन्हें नमस्कार करते हैं, जो सावधान चित्तवाले ध्यानपरायण महात्माओंके हृदय-मन्दिरमें सुखपूर्वक विराजमान होते हैं और चन्द्रमाकी कला, सर्पोंके कंकण तथा व्यक्त चिह्नवाले कपालको धारण करते हैं, सम्पूर्ण लोकोंके आदिदेव उन भगवान् श्रीमहाकालकी जय हो।'

पार्वतीजी बोलीं—भगवन्! पृथ्वीपर जो-जो पुण्यतीर्थ और पवित्र नदियाँ हैं, जिनमें श्राद्ध किया जाता है, उन सबका यत्नपूर्वक वर्णन कीजिये।

महादेवजीने कहा—देवि! त्रिपथगा गंगा सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात हैं। समस्त जगत्‌को पवित्र करनेवाली सूर्यपुत्री यमुना भी बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली हैं। चन्द्रभागा (चनाब), वितस्ता (झेलम), नर्मदा, अमरकण्टक, कुरुक्षेत्र, गया, प्रभास क्षेत्र, नैमिषारण्य, केदार, पुष्कर, कायावरोहण तथा उत्तम महाकालवन अत्यन्त पवित्र तीर्थ हैं। पापोंको जलानेके लिये अग्निके समान श्रीमहाकाल यहाँ विराज रहे हैं, वह चार कोसतक फैला हुआ क्षेत्र ब्रह्महत्या आदि पातकोंका नाश करनेवाला है।

पार्वतीजी बोलीं—महेश्वर! आप इस महाकालक्षेत्रका माहात्म्य कहिये।

महादेवजीने कहा—देवि! महाकालक्षेत्र समस्त पातकोंका नाश करनेवाला आदिक्षेत्र है। श्रीमेरु पर्वतके समीप जो परमात्मा ब्रह्माजीका वैराज नामक भवन है, वहाँ कान्तिमती नामवाली सभा देवताओंको हर्ष प्रदान करनेवाली है। एक समय ब्रह्माजीके मानसपुत्र वागीश्वर सनत्कुमारजी उस सभामें बैठकर भगवान् शंकरकी आराधनामें लगे हुए थे। उसी समय पराशरनन्दन श्रीकृष्णद्वैपायन (व्यास) उन्हें प्रणाम करके उनसे महाकालका माहात्म्य पूछते हुए बोले—'भगवन्! महाकालवन सबसे श्रेष्ठ क्यों कहा जाता है और उसे गुह्यवन, पीठस्थान तथा ऊसर भूमि क्यों कहा गया है?'

सनत्कुमारजी बोले—यहाँ सब पातक क्षीण हो जाता है, इसलिये इसे क्षेत्र कहा जाता है। यह मातृकाओंका निवासस्थान होनेके कारण पीठ कहलाता है। इस भूमिमें मरे हुए जीव फिर जन्म नहीं लेते, इसीलिये इसे ऊसर नाम दिया गया है। अतः यह परमात्मा शंकरका गुह्य, प्रिय एवं नित्य क्षेत्र है और इसीलिये सम्पूर्ण भूतोंको बहुत प्रिय है। भगवान् शिवके इस अतिशय प्रिय क्षेत्रको श्मशान, महाकाल वन और विमुक्ति क्षेत्र भी कहते हैं। एकाग्रक, भद्रकाल, करवीर वन, कोलागिरि, काशी, प्रयाग, अमरेश्वर, भरत, केदार, दिव्यरुद्रमहालय—ये सब तीर्थ दिव्य श्मशान हैं, जो शिवजीको सदा ही अत्यन्त प्रिय हैं। इन सिद्ध क्षेत्रोंमें सर्वदा भगवान् शिव क्रीड़ा करते हैं। पृथ्वीपर नैमिषारण्य और पुष्करतीर्थ उत्तम हैं। कुरुक्षेत्र तीनों लोकोंमें उत्तम कहा जाता है। कुरुक्षेत्रसे दसगुनी पुण्यमयी काशीपुरी मानी गयी है और काशीसे भी दसगुना महाकाल वन है।

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