संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
महाकाल वनमें भगवान् शिवका प्रवेश, कपाल-मोचन, देवताओंद्वारा स्तवन तथा महापाशुपत व्रतकी महिमा
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास! प्राचीन कालकी बात है। ब्रह्माजीने उत्तम कुशों और समिधाओंद्वारा अग्निहोत्र किया। अतः उस पुण्य स्थानका नाम ‘कुशस्थली’ हुआ। भगवान् विष्णुने नर-नारायण ऋषिके रूपसे बदरिकाश्रममें रहकर सम्पूर्ण जीवोंके लिये बड़ी भारी तपस्या की। (अतः उस पुण्यक्षेत्रको नर-नारायणाश्रम कहते हैं।) देवेश्वर भगवान् शिव हाथमें कपाल लेकर इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरण कर रहे थे। घूमते-घूमते वे कुशस्थलीमें जा पहुँचे और वहाँके उत्तम वनमें उन्होंने प्रवेश किया। वह वन अनेक प्रकारके वृक्षों और लताओंसे हरा-भरा और भाँति-भाँतिके पुष्पोंसे सुशोभित था। नाना भाँतिके पक्षी उसमें सब ओर कलरव करते थे तथा बहुत-से मृग वहाँ सब ओर फैले हुए थे। वह वन नन्दनकाननके समान मनोहर था। भगवान् शिवने उसकी ओर सौम्यदृष्टिसे देखा। भगवान् रुद्रको वहाँ पधारे हुए देख सब वृक्षोंने बड़ी भक्तिके साथ अपनी पुष्पसम्पदा उन्हें समर्पित करके उनके चरणोंमें फूलोंकी वर्षा की। वृक्षोंका वह पुष्पोपहार ग्रहण करके महेश्वरने उनसे कहा—‘तुम्हारा कल्याण हो, तुम सब मुझसे वर माँगो।’
भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर सब वृक्ष हाथ जोड़ उन्हें नमस्कार करके बोले—देवेश्वर! शरणागतवत्सल! आप यहीं इस वनमें सदा निवास करें।
महादेवजी बोले—बहुत अच्छा, इस उत्तम वनमें मेरा सदा मनसे निवास होगा। तुम्हें मैं दूसरा वरदान यह देता हूँ कि अग्नि, वायु, जल, सूर्य-किरणोंका ताप, बिजली, वज्रपात और सर्दी—इनमेंसे कुछ भी तुम्हारे लिये रोग नहीं उत्पन्न कर सकेगा।
इस प्रकार भगवान् शिवने वहाँके वृक्षोंको अनुगृहीत किया और एक वर्षतक वहीं रहकर कपालको पृथ्वीपर फेंक दिया। यह जानकर भगवान् ब्रह्माजी देवता और दैत्योंके साथ उस वनस्थलीको गये, जहाँ भगवान् वृषध्वज शिव विराजमान थे। उस वनकी अन्तिम सीमातक महादेवजीको ढूँढ़ते हुए देवताओंने कहीं भी उनको नहीं देखा। तब ब्रह्माजी देवताओंसे बोले—‘भगवान् शिवके दर्शनके लिये सदा तीन उपाय हैं—श्रद्धापूर्वक ज्ञान, तपस्या और योग। इन्हीं तीनोंसे उनकी प्राप्ति बतायी जाती है। योगी महादेवजीके कलासहित और कलारहित दोनों स्वरूपोंका दर्शन करते हैं। तपस्वी केवल कलायुक्त रूपका और ज्ञानी केवल निष्कल रूपका दर्शन पाते हैं। ज्ञान प्रकट होनेपर भी जिसकी श्रद्धा मन्द है, वह भगवान्का दर्शन नहीं पाता। पराभक्तिसे युक्त योगी पुरुष उन परमात्माका साक्षात्कार करते हैं। अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् महेश्वरकी आराधनामें निरन्तर संलग्न हो तुम सब लोग तपस्या करो।’
देवता बोले—ब्रह्मन्! आप हम सब लोगोंको ऐसी दीक्षा दीजिये, जो भगवान् शिवको सन्तुष्ट करनेवाली हो।
ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! तुम शिवयज्ञके लिये यहाँ पर्याप्त सामग्री ले आओ और इस स्थानपर यज्ञकी वेदी बनाओ। उसीपर अष्टमूर्ति शिवका यजन (पूजन) किया जायगा।
ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर देवताओंने सब कुछ उनके कथनानुसार किया। उन्होंने विनययुक्त वेषमें आकर ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया और वे निष्पाप देवता उनका अनुसरण—उनकी आज्ञाका पालन करने लगे। भगवान् शिवका प्रसाद प्राप्त करनेके लिये ब्रह्माजीने विधिपूर्वक चन्द्रार्धशेखर शिवका यजन किया। फिर अनुग्रहपूर्वक सम्पूर्ण देवताओंको व्रतोंमें श्रेष्ठ दिव्य पाशुपत व्रतका उपदेश किया। विरोधभावको भुला देनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने स्वयं ही देवताओंको वह दीक्षा दी।