भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 940, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 940
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९९१

महापाशुपत व्रतका वर्णन शिवशाखामें जैसा किया गया है, शास्त्रोंमें उसकी जैसी विधि बतायी गयी है और जैसे आचार-व्यवहारकी शिक्षा दी गयी है, उसके सहित वह शैव-व्रत देवताओंको बताया। वह व्रत पापों और दुःखोंका नाश करनेवाला, पुष्टि और बलको बढ़ानेवाला, सिद्धिदायक, सुयश बढ़ानेवाला, मनको प्रिय लगनेवाला तथा कलियुगके समस्त पापोंसे छुटकारा दिलानेवाला है। इस व्रतको धारण करनेवाले मनुष्योंको भस्म-स्नान करते हुए एकाग्रचित्त, जितेन्द्रिय, शान्त और दान्त (दमनशील) भावसे रहना चाहिये। तथा कमण्डलु धारण करना, रुद्राक्ष पहनना तथा अशुभदर्शन, असत् आलाप और आसक्ति आदिसे रहित होकर रहना चाहिये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे सब देवताओंने इसी प्रकार व्रत धारण करके उस वनमें उमापति महादेवजीकी आराधना की। वे सभी पराभक्तिसे युक्त हो उत्तम विधिका पालन करते हुए दीर्घकालतक भगवान्‌का ध्यान करते रहे। रुद्रके ध्यानकी अग्निसे उनके समस्त पाप दग्ध हो गये और वे अपूर्व शोभा एवं दीप्तिसे सम्पन्न हो गये। तब भगवान् शंकरने देवताओंके पास जाकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। भगवान् सदाशिवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले उन महेश्वरका इस प्रकार स्तवन किया।

देवता बोले—गणों तथा नन्दीसहित शान्तस्वरूप भगवान् शिवको नमस्कार है। जो धर्मस्वरूप वृषकी पीठपर आरूढ़ होनेवाले, सौम्यस्वरूप तथा शक्ति एवं शूल धारण करनेवाले हैं, उन्हें नमस्कार है। दिशाएँ तथा व्याघ्रचर्म आदि ही जिनके वस्त्र हैं, जिनका चित्त परम विशुद्ध और तेज अत्यन्त दुःसह है, जो ब्रह्मस्वरूप हैं, ब्रह्मा जिनका शरीर हैं तथा जो ब्रह्माजीके द्वारा भक्तानुग्रहके कार्यमें लगाये जाते हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। अन्धकासुरका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है। सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी भगवान् शिवको बार-बार नमस्कार है। सब प्रकारके रोगोंका अपहरण करनेवाले पंचमुख रुद्रको नमस्कार है। कैलास पर्वतपर शयन करनेवाले देवताओंके स्वामी ईशानदेवको बारम्बार नमस्कार है। भीम, उग्रस्वरूप तथा विजयरूप शंकरको नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओं, दैत्यों तथा यतियोंके भी अधिपति भगवान् शंकरको प्रणाम है। जो चण्ड (दैत्योंपर अत्यन्त क्रोध करनेवाले), चण्ड-दण्ड (भयंकर दण्ड देनेवाले) तथा श्रेष्ठ खट्वांग धारण करनेवाले हैं, उन रुद्रदेवको नमस्कार है। विरूपाक्ष (भयंकर नेत्रवाले), शुभाख्य (कल्याणकारी नामवाले) तथा विश्वरूपको बार-बार नमस्कार है। शान्त एवं ज्ञानस्वरूप त्रिनेत्रधारी शिवको बार-बार नमस्कार है। वेधा (ब्रह्मा), विश्वरूप (विष्णु) तथा विश्वसंहारकारी (रुद्र) को नमस्कार है। भक्तोंपर अत्यन्त कृपा करनेवाले तथा रुद्रज्ञानपरायण शिवको नमस्कार है। कुरूप, सुरूप तथा सैकड़ों रूप धारण करनेवाले भगवान् शंकरको नमस्कार है। पंचमुख, शुभमुख तथा चन्द्रमुख धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। वर देनेवाले, वरण करनेयोग्य तथा उत्तम कर्म करनेवाले शिवको नमस्कार है। त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले त्रिलोचन! महेश्वर! हम मन, वाणी, शरीर और भावोंसे आपकी शरणमें आये हैं। आप हमारी रक्षा कीजिये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तवन किये जानेपर महादेवजीने कहा—'महाभागगण! तुम सबने मेरे दर्शनकी इच्छासे बहुत ही श्रद्धापूर्वक मेरा आराधन किया है; अतः मैं तुम्हें उत्तम वरदान दूँगा। देवताओ! तुम्हारे हितके लिये उज्जयिनीपुरीमें आकर मैंने कपालको फेंक दिया है। अब तुम और क्या चाहते हो?'

देवताओंने पूछा—देव! आपने यहाँ कपाल फेंककर हमारा कौन-सा हित किया है, आपका यह कार्य निरर्थक नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें जो यथार्थ कारण हो, उसे बताइये।

महादेवजीने कहा—तुमलोगोंके हितके लिये मैंने तुम्हारे ऊपर आनेवाले एक महान् भयको टाला है। हय नामक दैत्य, जो बहुत ही बलवान्,

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