भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 941
९१२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

योगमायाका जाननेवाला तथा असुरोंका स्वामी था, बलके घमण्डमें आकर रसातल लोकको अपने वशमें करके वहीं रहता था। उस दैत्यके बलवान् सेवक तुम सब लोगोंको तपस्यामें स्थित जानकर यहाँ मारनेके लिये आये थे। उन्होंने मायासे अपने शरीरको छिपा रखा था। यहाँ कपालके गिरानेसे जो अत्यन्त भयानक शब्द हुआ है, उससे और पृथ्वी काँपनेसे उन सब दैत्योंके प्राण निकल गये हैं। उन दैत्योंने सम्पूर्ण लोकोंकी सत्ताका विनाश करनेके लिये उद्योग किया था। वे राज्य और ऐश्वर्यके दर्पसे उन्मत्त हो उठे थे। इसीलिये मैंने उनका वध किया है।

देवता बोले—प्रभो! आप देवताओंके ऊपर बड़ी भारी कृपा करनेवाले हैं।

महादेवजी बोले—देवताओ! तुम्हारे इस तपसे तथा दुःसह कष्टसे तुम्हारा तेज सब ओरसे बढ़े और अधिक उत्कर्षको प्राप्त हो।

देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मा आदि देवता पृथ्वीपर घुटने टेककर, ऊपरकी ओर मुँह करके बोले—देवेश्वर! आप हमारे प्राणदाता हैं, कारण हैं। देव! तपस्यासे ही आपका दर्शन होता है। आपके ध्यानमें लगे हुए हम भक्तोंकी रक्षा कीजिये।

महादेवजी बोले—देवताओ! मैंने यत्नपूर्वक तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया है। अब तुम वर माँगो, मैं तुम्हें बहुतसे वर दूँगा।

भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने कहा—भगवन्! हमें उत्तम ऐश्वर्य और उन राक्षसोंको अक्षय धाम दीजिये।

भगवान् शिव बोले—देवताओ! इस लोकमें जो मेरे भक्त हैं अथवा जो मेरे हाथसे मारे गये हैं, वे दुर्गति को नहीं प्राप्त होते। उन्हें परम उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। वे देवद्रोही असुर जटाजूटधारी एवं शूलपाणि होकर मेरे वाम पार्श्वमें विराजमान होते हैं। इन दैत्योंके निग्रह और आप लोगोंके बोधके लिये मैंने इस भूतलपर कपालको फेंका है। मेरी भक्तिकी इच्छा रखनेवाले भक्तोंपर इस प्रकार मैंने अनुग्रह किया है। वृक्षोंके प्रार्थना करनेपर मैंने इस वनमें नित्य निवास स्वीकार किया है। देवताओ! इस वनमें आये हुए मेरे और यहाँ तपस्या करनेवाले तुम्हारे सामीप्यसे यह महाकाल वन दो नामोंसे लोकमें विख्यात होगा—गुह्य वन और श्मशान। यह तीर्थ सब क्षेत्रोंमें श्रेष्ठ एवं महान् है।

मैंने कपाल-व्रतचर्याका वर्णन इस प्रकार किया है—कपालपात्रमें भोजन करे, कपाल-व्रतको ही आभूषणकी भाँति धारण करे, हाथमें कपाल लिये रहे, सदा सन्तोषपूर्वक रहे और नियमपूर्वक भिक्षान्नका आहार करे। श्मशानमें निवास करे, समस्त प्राणियोंके प्रति प्रसन्न रहे, प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें समभाव रखे, सब अंगोंको भस्मसे विभूषित करे, विशेषतः ज्ञानवान् और जितेन्द्रिय हो, सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे, मिट्टी, भस्म और जलमात्रका संग्रह करे, सदा योगयुक्त रहे, नित्य-निरन्तर जप करे। श्रेष्ठ आसनको जीते, पवित्र तीर्थमें आश्रम बनाकर रहे, धीरे-धीरे इष्टदेवमें चित्तको एकाग्र करे। यही लोकातीत उत्तम ज्ञान एवं महापाशुपत-व्रत है। पूर्वकालमें कपाल-व्रतका आश्रय लेकर मैंने स्वयं इसका पालन किया है। कपाल-व्रत परम गोपनीय, पवित्र एवं पापनाशक है। कपाल-व्रत कठिनतासे धारण करनेयोग्य और परम अद्भुत है। महापाशुपत-व्रत धारण करनेवाले एक महात्माको जो श्रद्धापूर्वक भोजन कराता है, उसे करोड़ों वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त होता है। जो यतियोंको कपालपूरणी (नारियलके खप्परको भरकर) भिक्षा देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर कभी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है। यह लोक और वेदमें वन्दित तथा देवताओं और दानवोंद्वारा पूजित व्रत है। सम्पूर्ण भूतोंको मोहनेवाले इस कपाल-व्रतको जो धारण करते हैं, वे मेरे समान होकर इस पृथ्वीपर विचरते हैं तथा इस दीक्षा और योगसे समस्त प्राणियोंको तारते हैं। पितामह! जैसे मैं सम्पूर्ण देवताओंका पूजनीय हूँ, उसी प्रकार यह महाव्रत सम्पूर्ण योगोंसे