भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 942
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १९३

पूजनीय है। संसारके बन्धनसे छुटकारा दिलानेके लिये यह कल्याणमय व्रत परम पवित्र है, क्योंकि यह सम्पूर्ण धर्मके द्वारा मोक्षका कारण है। जो अजितेन्द्रिय पुरुष इस कपालव्रत (संन्यास)-को ग्रहण करके फिर छोड़ देता है, वह यमदूतोंद्वारा शीघ्र ही रौरव नरकमें डाला जाता है। जो भावसे इस व्रतकी बात तो करता है, किंतु तदनुकूल कर्म नहीं करता है, वह रागयुक्त चित्तवाला शृंगारी (शृंगाररसमें डूबा हुआ) पुरुष धर्मका प्रिय नहीं है। जो इस व्रतको लेकर भी किसी एक स्थानपर ही भोजन करता है, मिठाइयाँ उड़ाता है, निष्कपट बातें जिसे अच्छी नहीं लगतीं, जो बुरे गाँव और नगरोंमें रहता है, खेती और वाणिज्य-व्यवसायका सेवन करता है—इत्यादि दोषोंसे दूषित उस मिथ्याचारीके साथ वार्तालाप करनेसे भी मनुष्य नरकगामी होता है, क्योंकि वह मेरे व्रतको कलंकित करनेवाला है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् सदाशिवने ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ उस क्षेत्रको बसाया। श्रेष्ठ मुनिगण इस आदिक्षेत्रको श्मशान कहते हैं। जहाँ भगवान् शिवका निवास है, वह स्थान महाकाल वन कहलाता है। वह भूभाग भगवान् शंकरके अनुग्रहका घर है, इसमें संशय नहीं है। मरणशील प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही इस क्षेत्रका प्रादुर्भाव हुआ है। वहाँ सुवर्ण और मणिसे निर्मित वेदिका बनायी गयी, जो सब ओरसे परम सुन्दर थी। चौंतीस सुन्दर कलश स्थापित किये गये, जो भरे हुए थे। वहाँ वेदीके चारों ओर चार दरवाजे थे, जो होमाग्निसे तप रहे थे। उस स्थानपर रखे हुए घट नवोदित सूर्यकी भाँति दिखायी देते थे। ऐसे उत्तम महाकाल वनमें भगवान् शिव क्रीड़ा करते हैं। यह सब कुछ सत्ययुगमें सबको प्रत्यक्ष दिखायी देता है, त्रेतामें धर्मपरायण तपस्वी ब्रह्मचारी ही भगवान्‌को प्रत्यक्ष देखते हैं, द्वापरमें धर्मात्मा और वैदिक ज्ञानसे सम्पन्न पुरुष ही उन्हें देख पाते हैं, परंतु कलियुगमें विशुद्ध विज्ञानसे सुशोभित अधिक तपस्यावाले पुरुष ही महाकाल वनमें शूलपट्टिशधारी उन देवाधिदेव भगवान् महेश्वरका दर्शन करते हैं, जो सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। व्यास ! मैंने तुम्हें यह सब यथार्थ वृत्तान्त बतलाया है। भगवान् शिवका यह स्थान विश्वविख्यात गुणगणोंसे पूजित है और सब दोषोंका नाश करनेवाला है। जो कल्याणमयी बुद्धिसे युक्त मानव इहलोकमें एकाग्रचित्त होकर इस स्थानके माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह देवताओंसे अभिषिक्त एवं पूजित होकर भगवान् शंकरके धामको जाता है।

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रुद्रभक्तिका निरूपण तथा महाकाल क्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके नियम

व्यासजीने पूछा— भगवन् ! महाकाल वनमें रुद्रलोककी इच्छा रखनेवाले उस क्षेत्रके निवासियोंको किस विधिसे रहना चाहिये ?

सनत्कुमारजीने कहा— व्यास ! भगवान् शंकरकी भक्ति तीन प्रकारकी बतायी गयी है—मानसिक, वाचिक और कायिक। लौकिकी, वैदिकी और आध्यात्मिकी—ये तीन भेद और भी हैं। ध्यान, धारणा एवं बुद्धिके द्वारा जो भगवान् रुद्रके स्वरूपोंका स्मरण किया जाता है, वह रुद्रके प्रति भक्ति-भावको बढ़ानेवाली मानसी भक्ति कहलाती है। स्तुति और कीर्तन आदि वाचिकी भक्तिके अन्तर्गत हैं। इन्द्रियोंको रोककर संयममें रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जो व्रत, उपवास और नियम आदिका पालन किया जाता है—ज्ञान और ध्यानमें स्थित धर्मात्मा पुरुषोंकी वह भक्ति कायिक कही गयी है। गोघृत, गोदुग्ध, गोदधि, चन्दन, कुंकुम, कुशोदक, गन्ध,