संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विविध माल्य, अनेक प्रकारके धातु, घी, गुग्गुल, धूप, कालागुरु, सुगन्धित पदार्थ, सुवर्ण और रत्नोंके आभूषण, विचित्र माला, वस्त्र, स्तोत्र, पताका, व्यजन, नृत्य, वाद्य, गीत, सब प्रकारके उपहार, भक्ष्य, भोज्य, अनुपान तथा अक्षतोंके द्वारा जो पूजा की जाती है, वह लौकिकी भक्ति मानी गयी है। वेदमन्त्रोंके द्वारा हविष्यकी आहुति आदिके योगसे जो यजनक्रिया की जाती है, वह वैदिकी भक्ति कहलाती है। मुने! आध्यात्मिकी शिव-भक्ति दो प्रकारकी है—एक सांख्या भक्ति और दूसरी यौगिकी भक्ति। अब इनका विभागपूर्वक वर्णन सुनो। संख्यासे प्रधान (प्रकृति) आदि तत्त्व चौबीस* हैं। वे सभी अचेतन तथा चेतनके उपयोगमें आने योग्य भोग्य हैं। इनसे भिन्न पुरुष पचीसवाँ तत्त्व है, वह चेतन एवं भोक्ता है। भगवान् रुद्र छब्बीसवें तत्त्व हैं। वे कर्ता, सर्वज्ञ, चेतन और सबके स्वामी हैं। अव्यक्त प्रकृति नित्य (अनादि) एवं अजन्मा है तथा पुरुष उसका अधिष्ठाता और प्रेरक है। वह व्यक्त और नित्य है। महेश्वर इन सबके कारण हैं। पहले चौबीस तत्त्वोंकी सृष्टि हुई; फिर उन्हीं तत्त्वोंसे पंचभूतोंकी सृष्टि हुई है। प्रधान या प्रकृति त्रिगुणात्मक है। भगवान् रुद्रका पुरुषके साथ साधर्म्य है—चैतन्यरूप धर्म दोनोंमें समान रूपसे है; परंतु प्रधान तत्त्व जड होनेके कारण उनसे विपरीत धर्मवाला है। वह रुद्रकी इच्छा (संकल्पशक्ति)-के अनुसार भौतिक जगत्का कारण होता है। सर्वत्र रुद्रमें ही कर्तृत्व है, पुरुषमें कर्तृत्वका अभाव है और प्रधान (प्रकृति)-में अचेतनता है। इन तीनोंका विवेक तत्त्वज्ञान कहा गया है। कार्य और कारण दोनों तत्त्वान्तरसे मुक्त होते हैं। प्रेरक-तत्त्वमें जो विलक्षणता है, उसको जानकर रुद्रतत्त्वार्थका विचार करनेवाले पुरुष तत्त्वोंकी संख्या निश्चित करते हैं। इस प्रकार रुद्रके यथार्थस्वरूपका विवेचन तथा तत्त्वोंकी तात्त्विक संख्या बतायी गयी है। सांख्यमतमें रुद्रके स्वरूपका यह चिन्तन ही विद्वानोंद्वारा आध्यात्मिक सांख्या भक्ति बतायी गयी है।
ब्रह्मन्! अब मुझसे यौगिकी भक्तिका वर्णन सुनो। जो पुरुष अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर सदा प्राणायाम-परायण होकर ध्यान करता है, अथवा जो हृदयमें धारणाको स्थिर करके महेश्वरका इस प्रकार ध्यान करता है कि 'हृदयकमलकी कर्णिकाके आसनपर भगवान् शिव विराजमान हैं, उनके पाँच मुख हैं, प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र हैं, चन्द्रमाकी कलासे उनकी जटा जगमगा रही है और कटिभागमें सर्पकी करधनी शोभा पाती है। उनका श्रीअंग श्वेत है, वे दस भुजाओंसे सुशोभित हैं, उनका स्वरूप सबके लिये मंगलमय है, उनके हाथोंमें वरद और अभयकी मुद्रा है।' उस योगीके द्वारा किये जानेवाले इस ध्यानको भगवान् रुद्रकी 'पराभक्ति' कहते हैं। जो इस प्रकार भगवान् शिवके प्रति भक्ति रखता है, वह रुद्रभक्त कहलाता है।
व्यास! अब महाकाल क्षेत्रमें निवास करनेवाले मनुष्योंके लिये जो विधि बतायी गयी है, उसको सुनो। जो ब्राह्मण ममता, अहंकार, आसक्ति तथा परिग्रहसे रहित हैं, बन्धुजनोंके प्रति अनासक्त रहकर मिट्टी, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हुए महाकाल वनमें निवास करते हैं, मन, वाणी और शरीरद्वारा किये जानेवाले त्रिविध कर्मोंद्वारा सदा सब प्राणियोंको अभय दान देते हैं, सांख्य और योगकी विधिको जानते हैं, धर्मके स्वरूपको समझते हैं और संशयरहित हो नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवान् शंकरका यजन करते हैं, वहाँ मृत्यु होनेके पश्चात् वे सभी अत्यन्त दुर्लभ एवं अक्षय ब्रह्म-सायुज्यको प्राप्त होते हैं। इस संसारमें पुनर्जन्म न पाकर अक्षय मुक्ति लाभ करते हैं। क्षेत्रनिवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र सबको अपने-अपने धर्ममें तत्पर होना तथा अपनी ही वृत्ति एवं आचार-व्यवहारसे जीवन
* प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, गन्धतन्मात्रा, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, मन और पंचमहाभूत—ये चौबीस तत्त्व हैं।