संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९१५
| निर्वाह करना चाहिये। भगवान् शिवके भक्त सर्वतोभावसे जीवोंपर अनुग्रह करनेवाले होते हैं। जो मुमुक्षु मानव महाकाल वन नामक क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् सुन्दर विमानोंद्वारा रुद्रलोकमें जाते हैं। अथवा जो | उपलब्ध हुई ज्ञानाग्निमें अपने शरीर आदि अनात्मपदार्थोंका हवन करता है, नित्य रुद्राध्यायका पाठ करता है और महान् सत्त्व (सत्त्वगुण एवं धैर्य) से सम्पन्न है, वह भगवान् शंकरके धाममें निवास करता है। |
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हालाहल दैत्यका वध, रुद्रसरोवरकी महिमा तथा कुशस्थलीमें चार समुद्रोंका आगमन और उसका माहात्म्य
| व्यासजी बोले—भगवन्! आचार सब धर्मोंमें मुख्य है। वही सब धर्मोंका आश्रय है। जो स्वधर्ममें तत्पर, क्रोधको जीतनेवाले तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं, वे तो भगवान् शिवके लोकमें जाते ही हैं, उनके लिये मेरे मनमें कोई चिन्ता नहीं है। वैसे लोग तो किसी उत्तम क्षेत्रमें निवास किये बिना भी पूर्वोक्त नियमोंके पालनसे ही चन्द्रमाके समान कान्तिमान् विमानोंद्वारा निश्चय ही रुद्रलोकमें चले जाते हैं। परंतु जो स्त्रियाँ, शूद्र, म्लेच्छ, पशु-पक्षी, मृग, मूक, जड़, अन्ध और बधिर हैं, जिनमें तप और नियमका अभाव है, वे यदि महाकालक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त हों, तो उनकी क्या गति होती है? | महादैत्यको शिवगणोंने त्रिशूलसमूहों, तलवारों, मूसलों तथा बाणसमुदायसे मूर्च्छित करके पृथ्वीपर मार गिराया। उसके मारे जानेपर महादेवजीने कहा—'अहो! इस मूढ़को बड़ा घमण्ड हो गया था, उसीसे यह मृत्युको प्राप्त हुआ है।' इसी समय पूर्वोक्त कपालसे बड़ी भयानक और प्रज्वलित मुखवाली प्रचण्ड मातृकाएँ प्रकट हुईं, जो बड़ी बलवती और भयानक अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थीं। वे उस स्थानपर दौड़ी हुई आयीं और महादेवजीको निवेदन करके उस महाबली दैत्यको काट-काटकर खाने लगीं। इससे वे इस क्षेत्रमें कपालमातृकाके नामसे विख्यात हुईं। |
| सनत्कुमारजीने कहा—ब्रह्मन्! यदि स्त्री, म्लेच्छ, शूद्र, पशु-पक्षी और मृग भी अपनी स्वाभाविक वृत्तिसे ही उस क्षेत्रमें मरें तो वे दिव्य शरीर धारण करके रुद्रलोकमें जाते हैं और वहाँ सब प्रकारके सुखभोगसे सम्पन्न होते हैं। | पूर्वकालमें वहाँ स्थापित हुए कपालको भेदकर एक कुण्ड प्रकट हुआ, जो शिवतड़ागके नामसे प्रसिद्ध है। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। आज भी वह महादिव्य रुद्रसरोवर वहाँ प्रकाशित होता है। गन्धर्वगण उसका सेवन करते हैं। रुद्रसरोवरका जल किसी पात्रमें रखा हो अथवा हाथमें निकाला गया हो, ठंडा हो, गरम हो या उसका क्वाथ बनाया गया हो, किसी प्रकार भी उपयोगमें लाये जानेपर वह अश्वमेध-यज्ञके अवभृथ-स्नानकी भाँति पवित्र करता है। सैकड़ों देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजी भी उस रुद्रसरोवरपर गये हैं तथा उन्होंने उसे स्वर्गलोककी सीढ़ी कहा है। जो यहाँ प्राण त्याग करते हैं, वे रुद्रलोकमें जाते हैं। व्यासजी! जो लोग महाकाल वनमें निवास करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। जो रुद्रसरोवरमें स्नान करते अथवा उसका जल पीते हैं, वे स्वधर्म तथा |
| एक समय देवताओंके लिये कण्टकरूप हालाहल नामक दानव महाकाल वनकी ओर दौड़ा हुआ आया। वह दुरात्मा क्रोधसे जल रहा था। ब्रह्माजीका वरदान पाकर देवताओंके लिये दुर्जय हो गया था। उसने भैंसेका स्वरूप धारण कर रखा था। उस देवशत्रुको आते देख पिनाकधारी भगवान् शिव अपने गणोंसे बोले—'पार्षदो! यह मायावी दैत्य तीनों लोकोंके लिये कण्टक है और बड़े वेगसे इधर आ रहा है, अतः तुम सब लोग मिलकर इसे मारो।' तब वहाँ आते हुए उस |