संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सदाचारमें तत्पर रहनेवाले पुरुष सबके स्वामी महादेवजीका प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं।
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**प्राचीनकालमें सुद्युम्न नामक एक धर्मात्मा राजा थे। उनकी पत्नीका नाम सुदर्शना था। उसने दाल्भ्य मुनिका दर्शन करके पुत्रकी कामनासे पूछा—'भगवन्! किस दान, स्नान और विधिसे मुझे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्र प्राप्त हो सकता है?'
**दाल्भ्यजी बोले—**बेटी! लोकस्रष्टा ब्रह्माजीने तुम्हारे लिये पहलेसे ही श्रेष्ठ पुत्र रच रखा है। तुम्हारे पतिदेव भगवान् शंकरकी आराधना करके उनके प्रसादसे अवन्तीपुरीमें जब चारों समुद्रोंको स्वरूपतः ले आवेंगे, तब उनमें राजाके स्नान करनेपर तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। अतः तुम अपने पतिको शंकरकी आराधनाके लिये प्रेरित करो।
दाल्भ्यके वचनसे रानी सुदर्शनाने अपने पतिको भगवान् शंकरकी आराधनाके लिये भेजा। उन्होंने गन्धमादन पर्वतपर जाकर आराधनाद्वारा भगवान् शिवको सन्तुष्ट किया। सन्तुष्ट होनेपर शंकरजी बोले—'राजेन्द्र! तुम अवन्तीपुरीको जाओ। वहाँ तुम्हें सुन्दर पुत्रकी प्राप्ति होगी। मेरे आदेशसे बादल उस मरुप्राय प्रदेशमें कुशस्थलीके निकट जायँगे और वहीं तुम्हें चारों समुद्र एकत्र दिखायी देंगे। नरश्रेष्ठ! तुम्हारे प्रार्थना करनेपर वे सभी समुद्र अंशकलाद्वारा वहाँ सदा निवास करेंगे।' ऐसा कहकर महादेवजी अन्तर्धान हो गये। तब राजा सुद्युम्न अपनी पत्नीके साथ कुशस्थलीमें गये और वहाँ उन्होंने राजस्थलके समीप चारों समुद्रोंको आया हुआ देखा। देखकर उन सबको नमस्कार किया। सुद्युम्नको नमस्कार करते देख वे समुद्र बोले—'सुव्रत! कोई उत्तम वरदान माँगो।' तब उन्होंने समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्र माँगा और इस प्रकार कहा—'जबतक यह पृथ्वी स्थित है, तबतक इस राजस्थलके समीप आप सब लोग निवास करें।'
**समुद्रोंने कहा—**राजन्! जबतक इस कल्पका अन्त न हो जायगा, तबतक हम सब लोग यहीं स्थित रहेंगे और हमारे जलमें स्नान करनेमात्रसे तुम्हें समस्त शुभ लक्षणोंसे युक्त पुत्रकी प्राप्ति होगी। इसलिये यहाँ स्नान करो।
व्यासजी! इस प्रकार राजा सुद्युम्नने अवन्तीपुरीमें चारो समुद्रोंको उतारा है। जो वहाँकी यात्रा करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो। मनुष्यको चाहिये कि वह महापुण्यमय क्षार-समुद्रमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करे। फिर स्थलभागमें विद्यमान पार्वतीवल्लभ महादेवजीकी पूजा करे। तत्पश्चात् ताँबेका एक पात्र लेकर उसे नमकसे भर दे और उसमें कुछ सुवर्ण रखकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान कर दे। उसके बाद सप्तधान्यसे युक्त और वस्त्रसे वेष्टित बाँसके पात्रमें फल और दक्षिणा रखकर यत्नपूर्वक अर्घ्य प्रदान करे। तदनन्तर क्षीरसागरमें जाकर पूर्ववत् स्नान करे और ताम्रके पात्रमें दूध भरकर दान करे। फिर दधिसमुद्रमें स्नान करके शुभ दही-भात दान करे। पुनः इक्षुसमुद्रमें स्नान करके ब्राह्मणको गुड़ समर्पित करे। इस प्रकार यात्रा करके दूध देनेवाली गौका दान करे। जो इस विधिसे राजस्थलके समीप यात्रा करता है, वह कल्याणमयी लक्ष्मी और सुन्दर पुत्र पाता है तथा मरनेपर स्वर्गलोकमें जाता है।
शंकरवापी, शंकरादित्य, गन्धवती नदी, हरसिद्धि देवी, वटयक्षिणी, पिशाचतीर्थ, शिप्रागुप्तेश्वर आदि तथा हनुमत्केश्वरकी महिमा
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**व्यासजी! क्रीड़ा करते हुए भगवान् शंकरने 'शंकरवापी' नामक एक शुभ महातीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य रविवारयुक्त अष्टमीको उक्त शंकरवापीमें पूर्व आदि दिशाओंके क्रमसे सभी दिशाओं और कोणोंमें एवं वापीके मध्यभागमें भी स्नान करके ब्राह्मणोंको