संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९१७
हविष्यान्नयुक्त नूतन कमण्डलु देता है और उन्हें शाक एवं मूल-फल अर्पण करता है, वह इहलोक और परलोकमें जो सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न स्थान है, वहाँ जाता और उत्तम ऐश्वर्य भोगता है।
तदनन्तर देवदेवेश्वर पिनाकपाणि भगवान् शिवने पवित्र भावसे देवाधिदेव दिवाकरका स्तवन किया। इससे सन्तुष्ट होकर दिवानाथ सूर्य वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'भूतनाथ ! आप मुझसे वर माँगिये।' भगवान् शिव बोले—'देव ! आप समस्त देहधारियोंके हितके लिये यहाँ एक अंशसे स्थित होइये।' भगवान् शंकरका यह वचन सुनकर सूर्यदेवने वहाँ अवतार लिया। सम्पूर्ण लोकोंको शान्ति प्रदान करनेवाले देवेश्वर सूर्य वहाँ शंकरादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं। उस समय देवगण विस्मित होकर कहने लगे—'अहो ! यह स्थान धन्य है, जहाँ साक्षात् भगवान् शिव विराजमान हैं और सूर्यदेव भी इस तीर्थका माहात्म्य बढ़ानेके लिये यहीं आकर बस गये हैं।' तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता शंकरादित्यकी स्थापना और पूजा आदि करके बोले—'प्रभो ! जो मनुष्य आपकी स्तुति करेंगे, उन्हें जरा और मृत्युका कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा। शंकरादित्यके दर्शन करनेवालेको कभी आधि-व्याधि और दारिद्र्य, रोग और बन्धु-वियोग आदि नहीं होते।'
सनत्कुमारजी कहते हैं—एक समय भगवान् महेश्वरने कपाल धोनेके लिये शुद्ध जल लेकर उससे कपालको अच्छी तरह धोकर उस जलको पृथ्वीपर फेंक दिया। वहीं त्रिभुवन-विख्यात गन्धवती नामवाली पुण्य नदी प्रकट हुई। उसमें स्नान करना सदा ही उत्तम है, ऐसा साक्षात् महादेवजीने कहा है। वहाँ किया हुआ श्राद्ध और तर्पण सब अक्षय होता है। जो मनुष्य वहाँ चन्द्रग्रहणमें स्नान करके पिण्डदान देता है, उसके पितर बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। काशी और गया आदि तीर्थोंमें जो एक मासमें तृप्ति होती है, वह यहाँ तत्काल हो जायगी और सन्तुष्ट हुए पितर उन मनुष्योंको मनोवांछित सिद्धिका वरदान देंगे। वहाँ दशाश्वमेध तीर्थमें स्नान करके शिवजीका दर्शन करनेपर मनुष्य दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाता है।
अब मैं हरसिद्धि देवीका माहात्म्य बतलाऊँगा, जो उत्तम सिद्धि देनेवाली हैं। पूर्वकालमें चण्ड और प्रचण्ड नामवाले दो महाबली दानव स्वर्गलोकको उजाड़कर कैलास पर्वतपर आये। वहाँ उन्होंने दाहिने हाथमें पिनाक और खट्वांग लिये हुए और दूसरे हाथमें 'पाँसा' उठाये हुए भगवान् सदाशिवको देखा। तब वे दैत्य शिवजीके पार्षदोंको पीड़ा देने लगे। यह देख नन्दीने उन्हें रोका। उनके मना करनेपर उन दानवोंने अपने-अपने त्रिशूलोंसे एक ही साथ नन्दीके दायें और बायें पार्श्वमें आघात किया। नन्दी दोनों ओरसे विदीर्ण हो गये और उनके अंगोंसे रक्तकी बड़ी भारी धारा बह चली। उन्हें घायल हुआ देख भगवान् शिवने देवीसे कहा—'इन दोनों महादैत्योंको मार डालना चाहिये।' देवीने कहा—'अभी मारती हूँ।' इतना कहते-कहते वे दोनों बलाभिमानी दानव देवीके हाथसे मरे हुए दिखायी दिये। तब भगवान् हरने कहा—'चण्डि ! तुमने दोनों दुष्ट दानवोंका तत्काल संहार किया है, इसलिये लोकमें तुम 'हरसिद्धि' के नामसे विख्यात होओगी। जो मनुष्य हरसिद्धि देवीका परम भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह अक्षय भोग पाता और मृत्युके पश्चात् शिवधामको जाता है।'
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक एक महीनेतक प्रतिदिन भगवती वटयक्षिणीका दर्शन करता है और धतूरके फूलोंसे उनकी पूजा करता है, उसकी सिद्धि कभी क्षीण नहीं होती।
जो मनुष्य पिशाचतीर्थमें विशेषतः चतुर्दशीको स्नान करके भक्तिपूर्वक तिलदान देता है, वह कभी पिशाच नहीं होता। इतना ही नहीं, उसका कुल भी पिशाचतासे मुक्त हो जाता है। जिसका नाम लेकर मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह भी पिशाचतासे छुटकारा पा जाता है। शिवभक्त एवं जितेन्द्रिय मनुष्य 'शिप्रागुप्तेश्वर' का दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य