भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 947, कुल 1406 में से

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९१८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्नान करके भक्तिपूर्वक अगस्त्येश्वरका दर्शन करता है, वह यमराजके घरमें न जाकर रुद्रलोकको जाता है। जो मनुष्य शिप्रा में स्नान करके दुण्ढेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। पूर्वकालमें महादेवजीने यहाँ डमरू बजाया था, इसलिये वे डमरुकेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हुए। जो भक्तिपूर्वक डमरुकेश्वर महादेवका दर्शन करता है, उसे रोगका भय नहीं होता और वह मरनेपर शिवलोकको जाता है। जो मानव भक्तिके साथ अनादिकल्पेश्वरका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकका राज्य पाता है। जो सिद्धेश्वर, वीरभद्र और चण्डिकाका दर्शन करता है, वह सिद्धि और सर्वत्र विजय पाता है। त्रिविष्टपतीर्थमें स्नान करके स्वर्णजालेश्वरका दर्शन करनेके पश्चात् जो स्वर्ण (धतूर) से उनका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो स्नानके पश्चात् भक्तिपूर्वक कर्कटेश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे कभी सर्पसे भय और दरिद्रता नहीं होती। जो पराभक्तिपूर्वक सनातनी महामायाका दर्शन करता है, वह विष्णुमायासे मुक्त होकर परम पदको प्राप्त होता है। स्वर्गद्वारमें स्नान करके भैरव-देवका दर्शन करनेसे मनुष्य सौ यज्ञोंका फल पाता है।

जो शिव-सरोवरमें स्नान करके हनुमत्केश्वरका दर्शन करता है, वह कोटि सहस्र कल्पोंतक वायुलोकमें आनन्द भोगता है।

व्यासजी बोले— भगवन् ! आपने जिस हनुमत्-केश्वरकी चर्चा की है, उनकी सनातन कथा कहिये।

सनत्कुमारजीने कहा— ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें रावण नामक सुप्रसिद्ध राक्षस हो चुका है, जो तीनों लोकोंके लिये कण्टक था। भगवान् विष्णुने श्रीरामचन्द्रजीका अवतार धारण करके उसे लंकामें मार गिराया। दुष्ट रावणका वध करके जनकनन्दिनी सीताको साथ ले वे वानर और भालुओंसहित अपनी नगरी अयोध्याको लौटे। वहाँ राज्य पाकर श्रीरामचन्द्रजी ऋषियोंसे घिरे हुए बैठते और कथा सुनते थे। एक दिन कथाके अन्तमें श्रीरामने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे पूछा—'मुने! भगवान् शंकर और हनुमान्‌जीमें कौन अधिक बलवान् है?' तब मुनिवर अगस्त्यने दशरथनन्दन श्रीरामसे कहा—'प्रभो! युद्ध और शौर्यमें जैसे भगवान् महेश्वरकी कहीं उपमा नहीं है, उसी प्रकार वायुनन्दन हनुमान्‌जीको भी समझना चाहिये।'

यह सुनकर हनुमान्‌जीने मन-ही-मन सोचा—'मुनिवर अगस्त्यजीने श्रीरघुनाथजीके सामने मेरी उपमा शिवजीके साथ दी है, अतः अब मैं लंकापुरीमें राक्षसराज विभीषणसे एक शिवलिंग माँग लानेके लिये जाऊँगा।' इस निश्चयके अनुसार वे लंकामें जाकर विभीषणसे बोले—'महाभाग! तुम मुझे एक उत्तम शिवलिंग प्रदान करो।' राक्षसराज विभीषण बोले—'सुव्रत! रावणके द्वारा स्थापित किये हुए ये छः लिंग हैं। इनमेंसे जो तुम्हें प्रिय हो उसे बताओ, वही मैं तुम्हें दे दूँगा।'

तदनन्तर हनुमान्‌जीने मोतीके समान स्वच्छ एक शिवलिंगका हाथसे स्पर्श किया। विभीषण बोले—'महावीर! तुमने जिस शिवलिंगको ग्रहण किया है, वह मैंने तुम्हें दे दिया।' तत्पश्चात् उस महालिंगको लेकर हनुमान्‌जी निर्मल आकाशमार्गसे चले और सातवें दिन अवन्तीपुरीमें आ पहुँचे। वहाँ रुद्रसरोवरके तटपर उसे स्थापित करके उन्होंने सरोवरमें स्नान किया और महाकालजीकी पूजाके लिये जानेका विचार किया। उस समय हनुमान्‌जीने उस लिंगको उठा लेनेकी चेष्टा की, किंतु उठानेमें समर्थ न हुए। तब वहाँ स्थित हुए महादेवजीने प्रत्यक्ष दर्शन दे वायुनन्दन हनुमान्‌से कहा—'हनुमन्! तुम इस क्षेत्रमें अपने नामसे मेरी स्थापना करके पूजन करो। यह शिवलिंग संसारमें हनुमत्केश्वरके नामसे प्रसिद्ध होगा।' तब हनुमान्‌जीने पर्वतके समान ऊँचे उस शिवलिंगको वहीं स्थापित कर दिया। जो मनुष्य शनिवारको हनुमत्केश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे शत्रु का भय नहीं होता और वह संग्राममें विजय पाता है।

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