भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 948
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १९९

महाकालकी परिक्रमा, यात्रा और विभिन्न देवताओंके दर्शनका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! जो मनुष्य यमेश्वरका दर्शन करता और तिलमिश्रित जलसे उन्हें स्नान कराकर कुंकुमका अनुलेप दे कमल-पुष्पोंसे उनकी पूजा करता है, उसकी जहाँ कहीं भी मृत्यु क्यों न हुई हो, यमराज उसके लिये पिताके समान बर्ताव करनेवाले हो जाते हैं।

रुद्रसरोवर नामक तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। जो उस तीर्थमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् शिवके लोकमें जाता है। कोटि तीर्थमें पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह सब कोटिगुना होकर उन्हें मिलता है। कोटि तीर्थमें नहाकर जो अविनाशी परब्रह्मका चिन्तन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कार्तिक अथवा वैशाखकी पूर्णिमाको सामयिक पुष्पों तथा सुन्दर वस्त्र एवं गन्ध आदिसे महादेवजीकी पूजा करे। कर्पूर, पुष्प, चन्दन तथा अगरु—इन सबको बराबर-बराबर लेकर सिलपर पीस ले और उसीका महाकालजीके श्रीअंगोंमें अनुलेपन करे। जो इस प्रकार उनकी आराधना करता है, वह उन्हींका पार्षद होता है।

रुद्रसरोवरमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन तथा वन्दन करनेके पश्चात् मनुष्य सनातन महाकालजीका दर्शन करनेके लिये जाय। गन्ध, पुष्प, नमस्कार आदि उपचारोंके द्वारा उन देवेश्वर शिवकी भलीभाँति आराधना करके प्रणाम करे। तत्पश्चात् कपालमोचन तीर्थको जाय। यह वही स्थान है, जहाँ देवेश्वर शिवने पृथ्वीपर कपाल रखा था। वहाँ कपाल रखते ही एक उत्तम शिवलिंग प्रकट हुआ, जो कपालमोचन कहलाया। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कृपणता छोड़कर सौ पल घीसे कपालमोचनको स्नान करावे। इतना सम्भव न हो तो पचास, पचीस अथवा साढ़े बारह पल घीसे भी स्नान करावे। जो ऐसा करता है, वह आयु पूर्ण होनेपर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् नमस्कार करके उत्तम कपिलेश्वर तीर्थमें जाय। कपिलेश्वरजीके दर्शनसे ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है। वहाँसे हनुमत्केश्वर देवका दर्शन करनेके लिये एकाग्रचित्तसे जाय। व्यासजी ! हनुमत्केश्वरके दर्शनसे अतुल ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सनातन पिप्पलाद महादेवजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मुक्ति हो जाती है। तदनन्तर भक्ति और श्रद्धाके साथ स्वप्नेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। स्वप्नेश्वरदेवके दर्शनसे दुःस्वप्नका नाश होता है। वहाँसे सब ओर मुखवाले विश्वतोमुख ईशान महादेवजीके पास जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण विश्वका स्वामी होता है। तत्पश्चात् क्रोधको जीतकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सोमेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनसे मनुष्य कुष्ठ रोग आदि दोषोंसे मुक्त हो जाता है। व्यासजी ! वहाँसे एकाग्रचित्त होकर मनुष्य वैश्वानरेश्वरके समीप जाय। उनके दर्शनसे इहलोकमें मनुष्यका सदा अभ्युदय होता है। इसके बाद हाथमें बीजपूरक (बिजौरा नींबू) धारण करनेवाले लकुलीशके समीप जाय। उनके दर्शनसे रुद्रत्व प्राप्त होता है। तत्पश्चात् गणपेश्वर महादेवकी सेवामें जाय, जिनके दर्शनमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वहाँसे वयोवृद्ध सनातन महाकालका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनसे रोग, जरा और व्याधिका सर्वथा अभाव हो जाता है। तदनन्तर विघ्नोंका नाश करनेवाले प्राणीशदेवके समीप जाय और भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो सौ घड़ा जलसे उनको स्नान करावे। उनको स्नान करानेसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और उनके दर्शनसे स्वर्ग मिलता है। तत्पश्चात् उसी मार्गमें प्राप्त होनेवाले दण्डपाणिजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोक नहीं देखना पड़ता। तदनन्तर भक्ति और