संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १९९
महाकालकी परिक्रमा, यात्रा और विभिन्न देवताओंके दर्शनका माहात्म्य
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी ! जो मनुष्य यमेश्वरका दर्शन करता और तिलमिश्रित जलसे उन्हें स्नान कराकर कुंकुमका अनुलेप दे कमल-पुष्पोंसे उनकी पूजा करता है, उसकी जहाँ कहीं भी मृत्यु क्यों न हुई हो, यमराज उसके लिये पिताके समान बर्ताव करनेवाले हो जाते हैं।
रुद्रसरोवर नामक तीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। जो उस तीर्थमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् शिवके लोकमें जाता है। कोटि तीर्थमें पितरोंके उद्देश्यसे जो कुछ दिया जाता है, वह सब कोटिगुना होकर उन्हें मिलता है। कोटि तीर्थमें नहाकर जो अविनाशी परब्रह्मका चिन्तन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। कार्तिक अथवा वैशाखकी पूर्णिमाको सामयिक पुष्पों तथा सुन्दर वस्त्र एवं गन्ध आदिसे महादेवजीकी पूजा करे। कर्पूर, पुष्प, चन्दन तथा अगरु—इन सबको बराबर-बराबर लेकर सिलपर पीस ले और उसीका महाकालजीके श्रीअंगोंमें अनुलेपन करे। जो इस प्रकार उनकी आराधना करता है, वह उन्हींका पार्षद होता है।
रुद्रसरोवरमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन तथा वन्दन करनेके पश्चात् मनुष्य सनातन महाकालजीका दर्शन करनेके लिये जाय। गन्ध, पुष्प, नमस्कार आदि उपचारोंके द्वारा उन देवेश्वर शिवकी भलीभाँति आराधना करके प्रणाम करे। तत्पश्चात् कपालमोचन तीर्थको जाय। यह वही स्थान है, जहाँ देवेश्वर शिवने पृथ्वीपर कपाल रखा था। वहाँ कपाल रखते ही एक उत्तम शिवलिंग प्रकट हुआ, जो कपालमोचन कहलाया। वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ कृपणता छोड़कर सौ पल घीसे कपालमोचनको स्नान करावे। इतना सम्भव न हो तो पचास, पचीस अथवा साढ़े बारह पल घीसे भी स्नान करावे। जो ऐसा करता है, वह आयु पूर्ण होनेपर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तत्पश्चात् नमस्कार करके उत्तम कपिलेश्वर तीर्थमें जाय। कपिलेश्वरजीके दर्शनसे ब्रह्महत्यारा भी मुक्त हो जाता है। वहाँसे हनुमत्केश्वर देवका दर्शन करनेके लिये एकाग्रचित्तसे जाय। व्यासजी ! हनुमत्केश्वरके दर्शनसे अतुल ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर सनातन पिप्पलाद महादेवजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मुक्ति हो जाती है। तदनन्तर भक्ति और श्रद्धाके साथ स्वप्नेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। स्वप्नेश्वरदेवके दर्शनसे दुःस्वप्नका नाश होता है। वहाँसे सब ओर मुखवाले विश्वतोमुख ईशान महादेवजीके पास जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण विश्वका स्वामी होता है। तत्पश्चात् क्रोधको जीतकर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सोमेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनसे मनुष्य कुष्ठ रोग आदि दोषोंसे मुक्त हो जाता है। व्यासजी ! वहाँसे एकाग्रचित्त होकर मनुष्य वैश्वानरेश्वरके समीप जाय। उनके दर्शनसे इहलोकमें मनुष्यका सदा अभ्युदय होता है। इसके बाद हाथमें बीजपूरक (बिजौरा नींबू) धारण करनेवाले लकुलीशके समीप जाय। उनके दर्शनसे रुद्रत्व प्राप्त होता है। तत्पश्चात् गणपेश्वर महादेवकी सेवामें जाय, जिनके दर्शनमात्रसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वहाँसे वयोवृद्ध सनातन महाकालका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनसे रोग, जरा और व्याधिका सर्वथा अभाव हो जाता है। तदनन्तर विघ्नोंका नाश करनेवाले प्राणीशदेवके समीप जाय और भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो सौ घड़ा जलसे उनको स्नान करावे। उनको स्नान करानेसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और उनके दर्शनसे स्वर्ग मिलता है। तत्पश्चात् उसी मार्गमें प्राप्त होनेवाले दण्डपाणिजीके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोक नहीं देखना पड़ता। तदनन्तर भक्ति और
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श्रद्धाके साथ पुष्यदन्तका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पातकोंसे छूट जाता है। तत्पश्चात् एकाग्रचित्त हो गुह्यमहाकालके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्यको गुप्त पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। वहाँसे उत्तम दुर्वासेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। दुर्वासेश्वरके समीप श्वास रोककर चले और महादुर्गा गौरीके पास जाकर श्वास छोड़े। इसके बाद एकाग्रचित्त होकर देवीकी पूजा करे। इसके अनन्तर कायेश्वर नामसे प्रसिद्ध देवाधिदेव महेश्वरके समीप जाय, जिनके दर्शनमात्रसे यमलोकको देखनेका अवसर नहीं आता। वहाँसे वधिरेश्वरका दर्शन करनेके लिये जाय, जिनके दर्शनमात्रसे बहरापन दूर हो जाता है। तत्पश्चात् यात्रेश्वरके समीप जाय, जो यात्राके पूर्ण फलको देनेवाले हैं। वहाँ अपने नाम, स्थान और गोत्रका उच्चारण करना चाहिये। यदि नामका उच्चारण न करे तो उसकी यात्रा निष्फल होती है। यात्रेश्वरदेवके आगे एकाग्रचित्त होकर बैठे और भक्तियुक्त होकर बार-बार नमस्कार करके स्तुति बोले। स्तुतिके पश्चात् इस प्रकार कहे—
मया समर्पिता यात्रा त्वत्प्रसादान्महेश्वर।
संसारसागराद् घोरान्मामुद्धर जगत्पते॥
'महेश्वर! मैंने आपकी ही कृपासे यह यात्रा पूरी करके आपके चरणोंमें समर्पित की है। जगत्पते! इस घोर संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।'
जो इस विधिसे भगवान् महाकालकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपोंसे युक्त समस्त पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। श्रेष्ठ ब्राह्मणको दो लाख गोदान करनेसे जो फल होता है, वही देवाधिदेव महाकालकी एक बार प्रदक्षिणा करनेसे मिल जाता है। महाकालकी प्रदक्षिणा बड़ी भक्तिके साथ करनी चाहिये। इससे पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। यह मुझसे साक्षात् भगवान् शंकरने कहा है। जो इस प्रकार भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए यात्रा पूरी करता है और वस्त्रसहित दक्षिणा देता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है। इस तरह यात्रा समाप्त करके मनुष्य अपने घर जाय और यात्रामें जो मुख्य-मुख्य देवता आते हैं, उनकी संख्याके अनुसार छब्बीस श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा शिवध्यानपरायण शिवभक्तोंको भोजन करावे। फिर वस्त्रसहित दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद ले उन्हें विदा करे। तदनन्तर सब भृत्यवर्गके साथ स्वयं भोजन करे। दीनों, अनाथों, दरिद्रों, अन्धों और अंगविकल मनुष्योंको भी भोजन करावे। यह सब करनेसे एकाग्रचित्तवाला मनुष्य माता-पिताकी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकमें आनन्दका अनुभव करता है।
वाल्मीकिकी तपस्या और वाल्मीकेश्वरकी महिमा
सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यासजी! जो मौन और ध्यानपरायण होकर भक्तिपूर्वक वाल्मीकेश्वर देवका पूजन करता है, वह उत्तम कवित्व-शक्तिको प्राप्त होता है।
व्यासजीने पूछा—भगवन्! भगवान् वाल्मीकेश्वर कौन हैं और वे यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए हैं?
सनत्कुमारजीने कहा—विप्रवर! प्राचीन कालमें सुमति नामक एक भृगुवंशी ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी कौशिकवंशकी कन्या थीं। सुमतिके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम अग्निशर्मा रखा गया। वह पिताके बार-बार कहनेपर भी वेदाभ्यासमें मन नहीं लगाता था। एक बार उसके देशमें बहुत दिनोंतक वर्षा नहीं हुई। उस समय बहुत लोग दक्षिण दिशामें चले गये। विप्रवर सुमति भी अपने पुत्र और स्त्रीके साथ विदिशाके वनमें चले गये और वहाँ आश्रम बनाकर रहने लगे। वहाँ अग्निशर्माका लुटेरोंसे साथ हो गया; अतः जो भी उस मार्गसे आता, उसे वह पापात्मा मारता और लूट लेता था। उसको अपने ब्राह्मणत्वकी स्मृति नहीं रही। वेदका अध्ययन जाता रहा, गोत्रका
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ध्यान चला गया और वेद-शास्त्रोंकी सुधि भी जाती रही। किसी समय तीर्थयात्राके प्रसंगसे उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सप्तर्षि उस मार्गपर आ निकले। अग्निशर्माने उन्हें देखकर मारनेकी इच्छासे कहा—'ये सब वस्त्र उतार दो, छाता और जूता भी रख दो।' उसकी यह बात सुनकर अत्रि बोले—'तुम्हारे हृदयमें हमें पीड़ा देनेका विचार कैसे उत्पन्न हो रहा है? हम तपस्वी हैं और तीर्थयात्राके लिये जा रहे हैं।'
अग्निशर्माने कहा—मेरे माता-पिता, पुत्र और पत्नी हैं। उन सबका पालन-पोषण मैं ही करता हूँ। इसलिये मेरे हृदयमें यह विचार प्रकट हुआ है।
अत्रि बोले—तुम अपने पितासे जाकर पूछो तो सही कि मैं आपलोगोंके लिये पाप करता हूँ, यह पाप किसको लगेगा। यदि वे यह पाप करनेकी आज्ञा न दें, तब तुम व्यर्थ प्राणियोंका वध न करो।
अग्निशर्मा बोला—अबतक तो कभी मैंने उन लोगोंसे ऐसी बात नहीं पूछी थी। आज आपलोगोंके कहनेसे मेरी समझमें यह बात आयी है। अब मैं उन सबसे जाकर पूछता हूँ। देखूँ किसका कैसा भाव है? जबतक मैं लौटकर नहीं आता, तबतक आपलोग यहीं रहें।
ऐसा कहकर अग्निशर्मा तुरंत अपने पिताके समीप गया और बोला—'पिताजी! धर्मका नाश करने और जीवोंको पीड़ा देनेसे बड़ा भारी पाप देखा जाता है (और मुझे जीविकाके लिये यही सब पाप करना पड़ता है)। बताइये, यह पाप किसको लगेगा?' पिता और माताने उत्तर दिया—'तुम्हारे पापसे हम दोनोंका कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम करते हो, अतः तुम जानो। जो कुछ तुमने किया है, उसे फिर तुम्हें ही भोगना पड़ेगा।' उनका यह वचन सुनकर अग्निशर्माने अपनी पत्नीसे भी पूर्वोक्त बात पूछी। पत्नीने भी यही उत्तर दिया—'पापसे मेरा सम्बन्ध नहीं है, सब पाप तुम्हें ही लगेगा।' फिर उसने अपने पुत्रसे पूछा। पुत्र बोला—'मैं तो अभी बालक हूँ (मेरा आपके पापसे क्या सम्बन्ध?)।' उनकी बातचीत और व्यवहारको ठीक-ठीक समझकर अग्निशर्मा मन-ही-मन बोला—'हाय! मैं तो नष्ट हो गया। अब वे तपस्वी महात्मा ही मुझे शरण देनेवाले हैं।' फिर तो उसने उस डंडेको दूर फेंक दिया, जिससे कितने ही प्राणियोंका वध किया था और सिरके बाल बिखराये हुए वह तपस्वी महात्माओंके आगे जाकर खड़ा हुआ। वहाँ उनके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम करके बोला—'तपोधनो! मेरे माता, पिता, पत्नी और पुत्र कोई नहीं हैं। सबने मुझे त्याग दिया है, अतः मैं आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ। अब उत्तम उपदेश देकर आप नरकसे मेरा उद्धार करें।'
उसके इस प्रकार कहनेपर ऋषियोंने अत्रिजीसे कहा—मुने! आपके कथनसे ही इसको बोध प्राप्त हुआ है, अतः आप ही इसे अनुगृहीत करें। यह आपका शिष्य हो जाय। 'तथास्तु' कहकर अत्रिजी अग्निशर्मासे बोले—'तुम इस वृक्षके नीचे बैठकर इस प्रकार ध्यान करो। इस ध्यानयोगसे और महामन्त्र (रामनाम)-के जपसे तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी।' ऐसा कहकर वे सब ऋषि यथेष्ट स्थानको चले गये। अग्निशर्मा तेरह वर्षोंतक मुनिके बताये अनुसार ध्यानयोगमें संलग्न रहा। वह अविचल भावसे बैठा रहा और उसके ऊपर बाँबी जम गयी। तेरह वर्षोंके बाद जब वे सप्तर्षि पुनः उसी मार्गसे लौटे, तब उन्हें वल्मीकमेंसे उच्चारित होनेवाली रामनामकी ध्वनि सुनायी पड़ी। इससे उनको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने काठकी कीलोंसे वह बाँबी खोदकर अग्निशर्माको देखा और उसे उठाया। उठकर उसने उन सभी श्रेष्ठ मुनियोंको, जो तपस्याके तेजसे उद्भासित हो रहे थे, प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'मुनिवरो! आपके ही प्रसादसे आज मैंने शुभ ज्ञान प्राप्त किया है। मैं पाप-पंकमें डूब रहा था, आपने मुझ दीनका उद्धार कर दिया है।'
उसकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा सप्तर्षि बोले—वत्स! तुम एकचित्त होकर दीर्घकालतक
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वल्मीक (बाँबी) में बैठे रहे हो, अतः इस पृथ्वीपर तुम्हारा नाम 'वाल्मीकि' होगा। यों कहकर वे तपस्वी मुनि अपनी गन्तव्य दिशाकी ओर चल दिये। उनके चले जानेपर तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकिने कुशस्थलीमें आकर महादेवजीकी आराधना की और उनसे कवित्वशक्ति पाकर एक मनोरम काव्यकी रचना की, जिसे 'रामायण' कहते हैं और जो कथा-साहित्यमें सबसे प्रथम माना गया है।
व्यासजी! तभीसे अवन्तीमें वाल्मीकेश्वर शिवकी ख्याति हुई, जो मनुष्योंको कवित्वशक्ति देनेवाले हैं।
शुक्रेश्वर आदिके पूजनकी महिमा, पंचेशानी यात्राका माहात्म्य तथा पद्मावती आदिके दर्शनका फल
सनत्कुमारजी कहते हैं—श्वेत पुष्प और चन्दनसे शुक्रेश्वरकी पूजा करके उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। व्यासजी! भीमेश्वरका दर्शन और भक्तिसे उनका पूजन करके मनुष्य युद्धमें, रात्रिमें, जलमें और अग्निमें कहीं भी भयको प्राप्त नहीं होता। जो मनुष्य तिलके तेलसे गर्गेश्वरको स्नान कराकर बिल्वपत्रसे उनका पूजन करता है, उसके धर्मकी वृद्धि होती है। जो चतुर्दशीको उपवास करके एक प्रस्थ तिलके जलसे गर्गेश्वरको नहलाकर तिलोंसे ही उनकी पूजा करता है, वह सदा सौख्यका भागी होता है। कामेश्वरका कुंकुम, चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजन करके मनुष्य इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा निःसन्देह स्वर्गलोकको जाता है। कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी तिथिमें चूडामणि देवको नमस्कार करके मनुष्य कभी विपरीत योनिमें नहीं जाता और उसकी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहती है। कृष्णपक्षकी अष्टमीको उपवास करके जो मनुष्य चण्डेश्वरजीकी पूजा करता है, वह निर्माल्य-लंघनजनित पाप-तापसे कभी लिप्त नहीं होता। महादेवजीके इन सब पवित्र तीर्थोंकी यात्रा करके विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य सदाशिवके मनोहर धामको प्राप्त होता है।
जो मानव इस महाकाल-क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंद्वारा रुद्रलोकको जाते हैं। कृष्णपक्षकी चतुर्दशी अथवा अमावास्याको एक दिन उपवास करके जो मनुष्य महेश्वरके ध्यानपूर्वक प्रतिलोम और अनुलोम-क्रमसे पंचेशानी यात्रा करते हुए पाँचों ईशान-विग्रहोंको नमस्कार करता है, वह बहुत जन्मोंके किये हुए समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है और वह इसी शरीरसे रुद्रलोकको जाता है।
पंचेशानी यात्रा इस प्रकार की जाती है—एकादशीको प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो रुद्रसरोवरमें स्नान करे। तत्पश्चात् श्राद्ध करके महाकालेश्वरको प्रणाम करे। फिर पिंगलेश्वरके समीप जाकर वहाँ स्नान और श्राद्ध करे। तदनन्तर पिंगलेश्वर गणेशजीके समीप जाकर गन्ध, पुष्प और धूप आदिसे उनका पूजन करे। वहाँसे लौटकर फिर महाकालेश्वरके समीप आकर स्नान करे। स्नानके पश्चात् जितेन्द्रिय पुरुष स्वयं प्रकट हुए सनातन देवदेवेश्वर महाकालका पूजन करे। वहीं ईशानके समीप रात्रिमें भोजन करके महेश्वरका ध्यान करते हुए भूमिपर शयन करे। इस प्रकार रात्रि बितानेके अनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल उठकर स्नानके पश्चात् पूर्ववत् सब कुछ करे। कायावरोहणतीर्थमें जाकर पिंगलेश्वरकी ही भाँति पूजा करे। इसी प्रकार त्रयोदशीको भी यात्रा करके पश्चिममें बिल्वेश्वरका पूजन करे। चतुर्दशीको उत्तर दिशामें उत्तरेश्वरका पूजन करे। फिर अमावास्यामें स्नान करके पवित्र हो महाकालेश्वरके समीप जाकर गन्ध, पुष्प, धूप और भाँति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा उनका पूजन करे। गीत, नृत्य
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आदि एवं प्रणाम करके उनसे क्षमा-प्रार्थना करे। | फूलोंसे अमरावती देवीका पूजन करता है, वह इस प्रकार यात्रा करके अपने घर जाय और | स्वर्गमें देवताओंके साथ सदा आनन्द भोगता वहाँ शिवभक्तिपरायण पाँच ब्राह्मणोंको भोजन | है। जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक उज्जयिनी करावे। व्यासजी! जो मनुष्य ऐसा करता है, | देवीका दर्शन करता है, वह रुद्रलोकमें सम्पूर्ण वह स्वर्गलोकमें आनन्दका भागी होता है। | ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो प्रतिष्ठित होता है। जो जो नियमपूर्वक कुशस्थलीकी परिक्रमा करता | भगवान् शिवमें भक्ति रखते हुए विशाला देवीका है, उसके द्वारा सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी | दर्शन करता है, वह कायिक, वाचिक और परिक्रमा हो जाती है। जो मनुष्य पद्मावतीजीका | मानसिक त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। दर्शन और कमलके पुष्पोंद्वारा उनका पूजन करता | कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास करके तथा धूप और नैवेद्य चढ़ाता है, वह मृत्युके | जितेन्द्रिय, पवित्र एवं जितात्मा होकर किसीके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाता है। जो सुवर्णके समान | साथ भी वार्तालाप न करे—मौन रहे। इस प्रकार पीले रंगवाले पुष्पोंसे महाभक्तिपूर्वक स्वर्णशृंगाटिका | रहकर जो अक्रूरेश्वर देवका दर्शन और पूजन देवीकी पूजा करता है, वह शिवलोकको जाता | करता है, वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो है। जो त्रिभुवन-विख्यात अवन्ती देवीका दर्शन | स्नान करके पवित्र हो, इन्द्रियोंको वशमें रखते करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानद्वारा | हुए ब्रह्माजीका दर्शन करता है, वह घोर पातकसे इन्द्रलोकको जाता है। जो भक्तिपूर्वक कमलके | मुक्त हो ब्रह्मलोकको जाता है।
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अंकपादतीर्थकी महिमा, श्रीकृष्णके द्वारा मरे हुए गुरुपुत्रके लाये जानेकी कथा
सनत्कुमारजी कहते हैं—जहाँ भगवान् | प्रकट हुए थे। उन दोनोंका रूप दिव्य था। दोनों महाकाल हैं, शिप्रा नदी है, अत्यन्त निर्मल गति | ही बड़े तेजस्वी पुरुष थे। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने प्राप्त होती है और जिस उज्जयिनीमें विशालाक्षी | कंस और चाणूरको मारकर उग्रसेनको यदुकुलके देवीका दर्शन प्राप्त होता है, वहाँका निवास किसको | राजपर अभिषिक्त किया और पूछा—'राजन्! अब नहीं भाता है। जो मनुष्य महानदी शिप्रा में स्नान | मेरे लिये क्या आज्ञा है?' उनके ऐसा कहनेपर करके भगवान् महाकालको नमस्कार करता है, वह | राजा उग्रसेन बोले—'कृष्ण! मेरा सब कार्य सिद्ध मृत्युका शोक नहीं करता। महाकाल क्षेत्रमें मरा | है, तुम्हारे रहते मेरे लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ हुआ कीट और पतंग भी भगवान् शिवका सेवक | नहीं है। अब तुम दोनों उज्जयिनी पुरीमें जाकर होता है। अवन्तीमें अंकपाद नामक तीर्थके भीतर | विद्या पढ़ो।' राजाका यह आदेश पाकर बलराम श्रीबलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। उन दोनोंके | और श्रीकृष्ण आचार्य सान्दीपनि मुनिके घर गये। दर्शनमात्रसे मनुष्य यमलोकको नहीं देखता। | वहाँ जाकर उन्होंने चारों वेदोंको कण्ठस्थ किया, व्यासजीने पूछा—महामुने! वे दोनों बलराम | सम्पूर्ण आचार-विचारका ज्ञान प्राप्त किया और और श्रीकृष्ण अंकपाद नामक तीर्थमें कैसे गये? | रहस्य तथा संहारसहित धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त सनत्कुमारजीने कहा—मुने! बलराम और | की। यह सारा ज्ञान उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही श्रीकृष्ण—ये दोनों भाई भगवान्के अवतार थे | प्राप्त कर लिया। सान्दीपनि मुनिने उन दोनोंका और इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यदुकुलमें | यह असम्भव एवं अलौकिक कर्म देखकर सोचा,
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जान पड़ता है इन दोनोंके रूपमें साक्षात् सूर्य और चन्द्रमा आ गये हैं। तदनन्तर वे अपने शिष्योंके साथ स्नान करनेके लिये महाकाल तीर्थमें गये। उन शिष्योंके साथ बलराम और श्रीकृष्ण भी थे। वहाँ उन दोनों भाइयोंने जब भगवान् महाकालको प्रणाम किया, तब वे साक्षात् प्रकट होकर उनसे बोले—'प्रभो! तुम सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हो। मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए तुम्हारे द्वारा साधु पुरुषों और अज्ञानी जीवोंको भी सदा सुख ही प्राप्त हुआ है तथा मनुष्योंको पीड़ा देनेवाले राजा कंस आदि बलाभिमानी दैत्योंको तुम दोनोंने मार गिराया है। अब तुम्हें मुनियों, सिद्धों और देवताओंका पालन करना चाहिये।'
'बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा'—ऐसा कहकर विश्ववन्द्य भगवान् श्रीकृष्ण वहाँसे चले गये। अपना अध्ययन पूरा करके कृतकृत्य हुए श्रीकृष्ण और बलरामने सान्दीपनि मुनिसे हर्षमें भरकर कहा—'आचार्य! श्रीचरणोंकी सेवामें गुरुदक्षिणाके रूपमें हम क्या दें।' उनका यह प्रिय वचन सुनकर गुरुने प्रसन्न होकर कहा—'मेरे एक पुत्र पैदा हुआ था। उसे तीर्थयात्रामें प्रभासक्षेत्रके भीतर समुद्रके जलमें एक जल-जन्तुने मार डाला। मेरे उसी पुत्रको तुम ले आओ।'
'बहुत अच्छा' कहकर श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ चले गये। प्रभासक्षेत्रमें समुद्रने उनसे कहा—'भगवन्! मेरे जलमें पंचजन नामक एक महादैत्य रहता है। उसीने तिमिका रूप धारण करके उस बालकको खा लिया है।' तब ग्राहरूपी उस महाबली पंचजनको मारकर श्रीकृष्णने उसके उदरमें स्थित शंखको ग्रहण किया। उसके पेटमें जब बालक नहीं दिखायी दिया, तब वे वरुणलोकमें गये और वरुणदेवसे बोले—'भगवन्! मुझे एक महान् रथ दीजिये, जिसपर आरूढ़ होकर मैं प्रेतराज यमका दर्शन करूँ।' यह सुनकर वरुणजीने प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णको रथ प्रदान किया। उस रथको देखकर श्रीकृष्ण और बलराम बड़े प्रसन्न हुए और उसकी परिक्रमा करके बड़े भाईके साथ श्रीकृष्णचन्द्र उसपर आरूढ़ हुए। तदनन्तर वे यमलोकको लक्ष्य करके दक्षिण दिशाकी ओर गये। सहस्रों किरणोंसे आवृत्त यमपुरीको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने शंख हाथमें लिया और उसे खूब जोरसे बजाया। उसकी ध्वनिसे समस्त यमलोकवासी भयभीत हो गये। श्रीकृष्णके दर्शनसे नरक-यातना भोगनेवाले पापियोंको भी सुख प्राप्त हुआ और उन नरकोंमें जलती हुई आग स्वतः बुझ गयी। जगदीश्वर श्रीकृष्णके नरकोंके समीप पदार्पण करनेपर सबके पापोंका नाश हो गया। सभी पापी नरकसे छूट गये और अक्षय धामको प्राप्त हो गये। उस समय सब नरक सूने हो गये। यह देख यमराजके दूतोंने नरकोंकी ओर जानेसे उनको रोका।
दूत बोले—वीरवर! इस मार्गसे अपना रथ न लाइये; क्योंकि यहाँ परस्त्रीहरण, परधनहरण करनेवाले पापी अपने पापके फलसे यमराजकी आज्ञाके अनुसार अधोगतिको प्राप्त हुए हैं। जिन्हें करोड़ों वर्षोंमें नरकसे छूटना चाहिये, वे आपका दर्शन करके तत्काल ही स्वर्गलोकको जा पहुँचे हैं।
यमदूतोंकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णने दयासे आर्द्र होकर कहा—यमदूतो! मैं इन पापी जीवोंका उद्धार करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। मैं सबके लिये यमलोकका निवारक और स्वर्गलोकका दाता हूँ। तुम मेरी बातें यमराजसे जाकर कहो। श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर यमदूत बड़ी उतावलीके साथ यमराजके समीप गये और उनसे नारकी जीवोंके मुक्त हो जानेका सब समाचार कह सुनाया। दूतोंकी बात सुनकर यमराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने श्रीकृष्ण-बलरामके साथ घोर युद्ध किया; परंतु पग-पगपर उन्हें पराजित ही होना पड़ा। अन्ततोगत्वा यमने अमोघ अस्त्र कालदण्डका प्रहार किया। उस जलते हुए कालदण्डको आते देख बलरामजीने लीलापूर्वक पकड़ लिया और पुनः उसे यमराजपर ही चलानेका विचार किया। इतनेमें ही ब्रह्माजी उन दोनोंके बीचमें आ गये और उन्होंने श्रीकृष्णको युद्धसे रोका। तत्पश्चात् बलरामजीसे कहा—'चराचर
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जगत्को धारण करनेवाले वीरवर बलभद्रजी ! आप इस कालास्त्रको यमराजके ऊपर न छोड़िये। इस संसारमें आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। सम्पूर्ण विश्वका पालन करनेवाले भगवान् विष्णुको भी आप सदा अपनी गोदमें धारण करते हैं। भला आपके समान दूसरा कौन है, जो सम्पूर्ण जगत्का भार वहन करनेमें समर्थ हो। जो जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले जगदीश्वर हैं, उन एकमात्र विश्वनायक विष्णुको भी आप गोदमें लेकर लाड़-प्यार करते हैं। जगत्में आपकी स्तुति कर सकनेवाला कौन है? कौन आपके गुणोंको जान सकता है? हम तो भगवान् विष्णुकी नाभिसे प्रकट हुए एक कमलके निवासी हैं, अतः सदा आपके अंकमें ही रहते हैं। हमें आपकी महान् महिमाका ज्ञान कैसे हो सकता है?'
बलरामजीसे इस प्रकार कहकर चतुर्मुख ब्रह्माने पुनः भगवान् वासुदेवसे कहा—'कृष्ण! कृष्ण! आप इस विकराल काल (यमराज)-पर कृपा कीजिये। आप सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र अधीश्वर साक्षात् विष्णु हैं और नरक-समुद्रसे सबका उद्धार करनेवाले हैं। जगन्नाथ! यह आपको नहीं जानता। भगवन्! आपने ही पूर्वकालमें इसे यमके पदपर स्थापित किया था। प्रभो! पापी पुरुषोंको नरकमें ले जानेके लिये ही यमराजकी नियुक्ति हुई है। अतः जगदीश्वर! पुरुषोत्तम! आप इसके अपराधको क्षमा करें। भगवन्! यमराज आपका अपराधी है। इससे आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कहिये।
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णने कहा—'पितामह! सुनिये। मेरे गुरु सान्दीपनि मुनिका पुत्र यहाँ लाया गया है। हम उसीके लिये यहाँ आये हैं। हमें अपने श्रेष्ठ गुरुको गुरु-दक्षिणा देनेके लिये वह बालक सौंप दीजिये। प्रभो! हम दोनोंने जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसका पालन करवाइये।
यह सुनकर ब्रह्माजीने युद्धमें हारे हुए यमराजको बुलाकर कहा—'ये विष्णुस्वरूप श्रीकृष्ण जो आज्ञा देते हैं उसका पालन करो। यह सुनकर धर्मराजने सान्दीपनि मुनिके पुत्रको श्रीकृष्णकी सेवामें अर्पित कर दिया। गुरुपुत्रको पाकर प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने ब्रह्माजीसे कहा—'ब्रह्मन्! आजसे लेकर उज्जयिनीमें मेरे चरणोंसे चिह्नित जो अंकपाद नामक स्थान है, वहाँ मरे हुए मनुष्य यमराजका दर्शन नहीं करेंगे। महाकालके उत्तर भागमें पुरुषोत्तम, विश्वरूप, गोविन्द, शंखोद्धार तथा केशव—इन पाँचों विग्रहोंका जो कुशस्थलीमें दर्शन करेंगे, वे कभी नरकमें नहीं जायँगे। इसी प्रकार मेरे और बलरामजीके यहाँ आनेसे नरकोंमें पड़े हुए जीव घोर नरकसे मुक्त होकर सब-के-सब दिव्यलोकको प्राप्त होंगे।'
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर कहा—'श्रीकृष्ण! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा हो। इस प्रकार बलभद्रसहित श्रीकृष्ण गुरुपुत्रको साथ लेकर श्रीब्रह्माजीसे पूछकर अपने रथपर सवार हुए और नरकमें पड़े हुए प्राणियोंके उद्धारके लिये उन्होंने पुनः शंखध्वनि की। उस शंखनादको सुनकर और श्रीकृष्णके स्मरणजनित पुण्यसे समस्त नारकी जीव दिव्य विमानोंपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चले गये। यमराजने भी पुनः बलदेवजीसे अपना दण्ड लेकर नगरमें प्रवेश किया और ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर बलभद्रसहित श्रीकृष्ण शीघ्रगामी रथके द्वारा उज्जयिनीपुरीमें आये। वहाँ उन्होंने गुरुको उनका पुत्र समर्पित किया।
इस प्रकार वहाँ आये हुए सान्दीपनि मुनिके पुत्रको देखकर समस्त नगर-निवासियों तथा वहाँके राजाको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण-बलरामको कोई श्रेष्ठ देवता मानकर उनका पूजन किया। वहाँ शंखी, विश्वरूप, माधव और चक्री—ये चार भगवान् विष्णुके क्षेत्र हैं और पाँचवाँ अंकपाद नामक क्षेत्र है। अब मैं इनकी यात्राका क्रम बतलाऊँगा। मन्दाकिनीमें स्नान करके बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। तत्पश्चात् शंखोद्धारतीर्थमें
९२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्नान करके पुनः उन्हीं दोनोंका दर्शन करे। उसके बाद कुण्डमें स्नान करके गोविन्दकी पूजा करे। फिर चक्री और शंखीभगवान्का दर्शन करके युगल अंकपादों (चरणचिह्नों)-का दर्शन करके विश्वरूपका दर्शन करे। विश्वरूपके आगे करीकुण्डमें विधिपूर्वक स्नान करनेके पश्चात् पूर्ववत् बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। तदनन्तर पुनः कुण्डमें स्नान करके गोविन्दजीकी पूजा करे। उसके बाद चक्रधारी श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करके केशवके समीप जाय। शिप्राके जलमें स्नान करके मनुष्य भक्तिपूर्वक केशवकी पूजा करे। फिर वहाँसे अंकपादमें लौटकर वहीं रात्रि व्यतीत करे। प्रातःकाल स्नान आदिसे पवित्र हो वहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पाँच ब्राह्मणोंको भोजन करावे। जो पुरुष द्वादशीको उपवास करके चन्दन, पुष्प, धूप तथा भाँति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा अंकपादजीकी पूजा करता है तथा जो वहाँ श्राद्ध करता है, वह सदैव वैकुण्ठधाममें निवास करता है।
लड्डुकप्रिय गणेश, कुसुमेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, ब्रह्माणी देवी, ब्रह्मेश्वर, यज्ञवापी, रूपकुण्ड, अनंगेश्वर तथा सोमेश्वरका माहात्म्य
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**देवताओंने लड्डुओंसे विघ्नराज गणेशजीकी पूजा की थी, तबसे यहाँ गणेशजी लड्डुकप्रियके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो भक्तिपूर्वक विघ्नराज गणेशजीकी पूजा करता है, उसे कभी विघ्नका सामना नहीं करना पड़ता। गणेशजी सन्तुष्ट होकर उस पुरुषकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी कर देते हैं। चतुर्थीको केवल रातमें भोजन करनेका व्रत लेकर विशेषतः शिप्रा नदीमें स्नान करके रक्त वस्त्र धारण करे और लाल चन्दनके जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक गणेशजीको स्नान करावे। फिर लाल चन्दनका अनुलेपन करके लाल फूलोंसे उनकी पूजा करे। धूप और उत्तम गन्ध निवेदन करे। नैवेद्यमें लड्डुओंका भोग लगावे। जो ऐसा करता है, वह मृत्युके पश्चात् शिवधामको जाता है।
जो सुरद्वारमें देवदानववन्दित कुसुमेश्वर शिवकी श्रद्धासे पूजा करता है, वह शिवलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जो देवाधिदेव जयेश्वर महादेवका दर्शन करता है, वह सब कार्योंमें विजयी होता है और अन्तमें शिवलोकको जाता है। यदि मनुष्य शिवद्वारमें शिवलिंगका अर्चन करे तो विमानद्वारा दिव्यलोकको जाता है और गणपतिका पद प्राप्त करता है। पूर्वकालमें महामुनि मार्कण्डेयजीने जहाँ बड़ी भारी तपस्या की थी, वहाँ भगवान् शंकरका दर्शन करके मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता है और वह सब पापोंसे शुद्ध होकर दीर्घायु होता है। जहाँ हंसवाहिनी ब्रह्माणी देवी स्थित हैं, वह महास्थान अवन्ती पुरीमें बहुत उत्तम माना गया है। वे भक्तोंकी आशा पूर्ण करती तथा जैसे माता अपने पुत्रका पालन करती है, उसी प्रकार भक्तोंका पालन करती हैं। सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाली उन हंसवाहिनी देवीका गन्ध, पुष्प और नैवेद्योंद्वारा पूजन करे। जो ब्रह्मसरोवरमें स्नान करके ब्रह्मेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जहाँ ब्रह्माजीने यज्ञ किया था, उस स्थानपर यज्ञके लिये जो कुण्ड बनाया गया था, उसका नाम यज्ञवापी है। उसमें स्नान करके पवित्र हो जो पशुपतिका दर्शन करता है, वह पशुयोनिमें पड़े हुए पितरोंका भी उद्धार कर देता है और स्वयं शिवलोकमें जाता है, जहाँ साक्षात् महेश्वर निवास करते हैं। रूपकुण्डमें स्नान करके मनुष्य रूपवान् होता है। जो अनंगकुण्डमें स्नान करके अनंग (कामदेव) द्वारा पूजित अनंगेश्वर महादेवकी पूजा करता है, वह मनोवांछित कामना प्राप्त करता है और मरनेके बाद शिवधामको जाता है। जो करीकुण्डमें नहाकर भगवान् विश्वरूपका पूजन
* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२७
करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य अजागन्धमें स्नान करके ब्रह्मेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह ब्रह्महत्याके समान पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है। जो चक्रतीर्थमें स्नान करके चक्रस्वामीकी पूजा करता है, वह इस पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है। जो विधिपूर्वक स्नान करके सिद्धेश्वरका दर्शन करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा रुद्रलोकमें जाता है। जो मनुष्य सोमवतीमें स्नान करके सोमेश्वर शिवका पूजन करता है, वह चन्द्रमाके समान निर्मल होकर चन्द्रलोकमें आनन्द भोगता है।
व्यासजीने पूछा—भगवन्! सोमवतीतीर्थ और सोमेश्वर लिंगका प्राकट्य किस प्रकार हुआ, इसको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।
सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! सुनो, सम्पूर्ण लोकोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले जो भगवान् सोम हैं, उनके पिता महाभाग अत्रिमुनि पूर्वकालमें उज्जयिनीपुरीमें रहकर तीन हजार दिव्य वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्यामें लगे रहे। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर ब्रह्मध्यानमें तत्पर हो तपस्या करते थे। उन महात्माका ब्रह्मतेज उनके नेत्रोंसे प्रकट हुआ और सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ ऊर्ध्वलोकतक फैल गया। जब कोई भी उसे धारण करनेमें समर्थ न हुआ, तब वह असह्य तेज सम्पूर्ण लोकोंको उद्भासित करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसीसे शीतकिरणोंवाले सोम प्रकट हुए, जो सब लोगोंको प्रिय हैं। उसी तेजसे सोमा नामकी एक नदी भी उत्पन्न हुई, जो अमृतमय जलसे पूरित हो शिप्रा नदीमें जाकर मिल गयी। तबसे वह तीर्थ सोमवती-शिप्राके नामसे विख्यात है। सोमवती-शिप्रा अत्यन्त पुण्यदायिनी है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंको त्याग देता है। मुने! सोमवती अमावास्याका योग आनेपर जो बुद्धिमान् मनुष्य सोमवती-शिप्रामें स्नान-दान, जप तथा होम करता है, उसका किया हुआ वह सब पुण्य अक्षय होता है। यहाँपर तिल और जलद्वारा तर्पण तथा पिण्डदान करनेसे पितरोंकी यथावत् तृप्ति होती है। शिप्रा नदी एवं सोमवतीके संगमका जल कोटि तीर्थोंका फल देनेवाला है। यदि अमावास्या और सोमवारका योग मिल जाय तब तो वह साक्षात् पितृतीर्थ (गया)-के समान हो जाता है। अमावास्या, सोमवार और व्यतीपात तीनोंका योग होनेपर सोमवतीतीर्थमें गयासे सौ गुना अधिक पुण्य कहा गया है।
चन्द्रमाको पृथ्वीपर गिरा हुआ देख जगद्गुरु ब्रह्माजीने उन्हें सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे रथपर बिठाया। उस रथपर ब्रह्माजीके साथ चन्द्रमाको देखकर सब देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक स्तवन किया। उस समय चन्द्रमाका प्रकाशमान तेज पृथ्वीपर सब ओर गिरा। ब्रह्माजीने उस रथसे इक्कीस बार पृथ्वीकी परिक्रमा की। इससे चन्द्रमाका शीतल तेज सर्वत्र गिरा। वह तेज ही पृथ्वीसे अत्यन्त निर्मल ओषधियों (अन्न आदि)-के रूपमें उत्पन्न हुआ। उन्हीं ओषधियोंके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व तथा यहाँ रहनेवाली चार प्रकारकी प्रजा जीवन धारण करती है। तदनन्तर भगवान् सोमने प्रसन्न होकर दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुःसह तप किया। उस तपस्यासे सन्तुष्ट हुए लोकपितामह ब्रह्माजीने सोमको आधिपत्य प्रदान किया। वे बीज, ओषधि और ब्राह्मणोंके राजा हुए। प्रचेताओैंके पुत्र प्रजापति दक्षने अपनी सत्ताईस कन्याओंको, जो महान् व्रतका पालन करनेवाली तथा नक्षत्र नामसे प्रसिद्ध थीं, राजा सोमके साथ ब्याह दिया।
एक समय सोमवारके दिन सोमवती अमावास्याके योगमें राजा सोम महादेवजीके दर्शनकी इच्छासे अवन्ती पुरीमें आये। उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके सोमवतीमें स्नान किया और सोमेश्वरकी पूजा की। उनकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने कहा—'सोम! मेरी कृपासे तुम्हारा शरीर बहुत सुन्दर एवं कमनीय हो जायगा और आजसे यह मेरा विग्रह सोमेश्वर नामसे विख्यात होकर भोग
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और मोक्ष देनेवाला होगा।' व्यासजी! इस प्रकार वह शिवलिंग और तीर्थ अत्यन्त दुर्लभ बताया गया है। जो श्रावणमासमें इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रतिदिन भगवान् सोमेश्वरका दर्शन करता है, वह प्रतिदिन सौराष्ट्रप्रदेशके ज्योतिर्मय लिंग सोमनाथकी पूजाका फल पाता है।
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नरकोंका संक्षिप्त वर्णन, केदारेश्वर, जटेश्वर, इन्द्रेश्वर, कुण्डेश्वर, गोपेश्वर, आनन्देश्वर तथा रामेश्वरके दर्शन-पूजनका माहात्म्य
सनत्कुमारजी कहते हैं—नरकतीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्यको कभी नरक नहीं देखना पड़ता।
व्यासजीने पूछा—प्रभो! नरक कितने हैं? और किस स्थानपर उनकी स्थिति है? यह बतानेकी कृपा करें।
सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! समस्त नरक पाताललोकमें स्थित हैं, जो सदैव दुःख देनेवाले हैं। सब जीव अपने-अपने पुण्योंका नाश होनेसे अपने-अपने कर्मोंके अनुसार अधोगतिको प्राप्त होते हैं। रौरव, शूकर, रौद्र, ताल, विनशक, तप्तकुम्भ, तप्तायस, महाज्वाल, कुम्भीपाक, क्रकचन, अतिदारुण, कृमिभुक्ति, रक्त, लालाभक्ष, गण्डक, अधोमुख, अस्थिभंग, यन्त्र-पीड़नका, सन्दंश, रुधिरांग, असिपत्र और कुभोजन इत्यादि सभी नरक अत्यन्त भयंकर हैं। यमराजके राज्यमें उन सबकी स्थिति है। उनका नाम सुन लेनेमात्रसे अत्यन्त भय हो जाता है। पापकर्मोंमें संलग्न रहनेवाले मनुष्य उनमें गिरते हैं और गिरे हुए जीव अपने कर्मोंके अनुसार उनमें पकाये जाते हैं। भाँति-भाँतिकी यातनाओं द्वारा उनके भयानक पापकर्मोंका क्षय होता है। तपायी हुई लोहेकी साँकलसे मनुष्योंके दोनों हाथ खूब कसकर बाँध दिये जाते हैं और बड़े-बड़े वृक्षोंके शिखरोंपर यमदूत उन्हें लटका देते हैं। वे अपने-अपने कर्मोंके लिये शोक करते हुए चुपचाप लटके रहते हैं और भयंकर यमदूत अग्निके समान कीलों, काँटों और लोह-दण्डोंसे उन पापात्माओंको मारते-पीटते रहते हैं। कभी क्षणभरमें वे आगसे तपाये जाते हैं और कभी काटकर सारे शरीरको जर्जर करके उन्हें सब ओर फेंक दिया जाता है। इस प्रकार उन नरकोंमें यातना दे-देकर पापी पुरुषोंको पकाया जाता है। यह यातना उन्हीं पापियोंको भोगनी पड़ती है, जो बहुत पाप करके उनके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं करते। जिस पुरुषको पाप करनेके बाद उसके लिये बहुत पश्चात्ताप होता है, उसकी पापशुद्धिके लिये एकमात्र भगवान् शिवका स्मरण ही सर्वोत्तम प्रायश्चित्त है। इसलिये दिन-रात पुरुषोत्तम शिवका स्मरण करनेवाला मनुष्य अपने समस्त पापोंका नाश करके शुद्ध हो जाता है, फिर उसे नरकमें नहीं जाना पड़ता।
जो मनुष्य यहाँ समस्त लोकोंमें विख्यात केदारतीर्थमें स्नान करके शुद्ध हो केदारेश्वर महादेवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो शिवलोकमें परमानन्दका अनुभव करता है। जटाश्रृंगतीर्थमें स्नानसे पवित्र हो जितेन्द्रिय पुरुष यदि जटेश्वर शिवका दर्शन करे, तो वह सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। इन्द्रतीर्थमें स्नान करके इन्द्रेश्वर शिवका दर्शन करनेवाला मनुष्य भी सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो शिवजीके ध्यानमें तत्पर हो कुण्डेश्वरका दर्शन करता है, वह शिवदीक्षाका शुभ फल प्राप्त करता है। गोपतीर्थमें स्नान करके गोपेश्वरका दर्शन करनेवाला मनुष्य शिवलोकको जाता है। चिपिटातीर्थमें स्नान करके जो भगवान् शिवको प्रणाम करता है, वह पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म नहीं लेता। विजयतीर्थमें नहाकर आनन्देश्वरकी पूजा करनेसे समस्त पापोंसे छूटा हुआ मानव स्वर्गलोकमें विजयी होता है।
* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२९
पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मणके साथ चित्रकूटसे इस उज्जयिनी पुरीमें आये। यहाँ मुनिश्रेष्ठ परशुरामजीसे मिलकर उन्होंने पूछा— 'महामुने! यहाँ कौन-कौनसे पुण्यतीर्थ हैं और कौन-सा क्षेत्र है?' श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर विप्रवर परशुरामजीने कहा— 'रघुवंशकी वृद्धि करनेवाले वीर श्रीराम! प्राचीन कालमें अवन्ति देशके अन्तर्गत जो कुशस्थली नामकी भूमि थी, वही इस समय उज्जयिनीके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर तुम अपने पिता दशरथजीको पिण्डदानसे तृप्त करो। उस पुरीमें देवताओं और दानवोंके गुरु भगवान् महाकाल निवास करते हैं। वहाँ जो ब्राह्मण और महाबली क्षत्रिय जाते हैं, उन्हें उस परम पदकी प्राप्ति होती है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं।'
यह सुनकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी, जहाँ पुण्यदायिनी शिप्रा नदी बहती है, उस अवन्ती पुरीमें आये। वहाँ स्नान करके उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् वे महाकालजीका दर्शन करनेके लिये चले। इसी समय आकाशवाणीके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीने कहा— 'रघुनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो, तुम अपने नामसे यहाँ मेरी स्थापना करो।' यह आकाशवाणी सुनकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा— 'सुमित्रानन्दन! भगवान् शिवने मुझपर अनुग्रह किया है, अतः इस तीर्थमें तुम रामेश्वर नामक शुभ शिवलिंगकी प्रतिष्ठा करो।' यह आज्ञा पाकर लक्ष्मणने वहाँ भगवान् शंकरको स्थापित किया। फिर शिवजीका पूजन करके श्रीराम, लक्ष्मण तथा जानकीजीने वहाँसे यात्रा की। जो मनुष्य रामतीर्थमें स्नान करके रामेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको जाता है।
सौभाग्य आदि तीर्थोंकी महिमा, अर्जुनको इन्द्रसे सूर्यप्रतिमाकी प्राप्ति तथा अवन्तीमें उसकी स्थापना और उनके दर्शनका माहात्म्य
सनत्कुमारजी बोले—सौभाग्यतीर्थमें स्नान करके सौभाग्येश्वरका दर्शन करनेपर मनुष्य सब पापोंसे छूटकर परम सौभाग्य पाता है। घृततीर्थमें स्नान करके भगवान् शिवको घृतसे नहलावे और अग्निमें घृतकी आहुति दे। ऐसा करनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। देवताओं और दैत्योंसे वन्दित योगीश्वरी देवीका पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो जाता है और परम उत्तम योगको प्राप्त होता है। शृंखावार्त तीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे छूटा हुआ पुरुष धन-धान्यसे सम्पन्न हो निर्मल कुलमें जन्म लेता है। शुद्धोदकतीर्थमें चतुर्दशीको मुक्तिके लिये स्नान करनेवाला मनुष्य सुरेश्वर शिवका दर्शन करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अवन्तीमें पत्तनेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् महेश्वर दर्शनीय हैं। जो मनुष्य गन्ध, पुष्प, धूप और दीप आदि मनोरम उपचारोंसे भाव-भक्तिके साथ उनकी विधिवत् पूजा करता है, उसके वंशका नाश नहीं होता है और अन्तमें वह शिवलोकको जाता है।
पूर्वकालमें भगवान् सूर्यदेवने शिप्रा नदीके तटपर दुर्धर्ष नामसे प्रसिद्ध तीर्थका निर्माण किया है। जो मनुष्य सप्तमी, अष्टमी, रविवार और संक्रान्तिके दिन उसमें स्नान करके पवित्र हो तीन रात वहाँ उपवास करता है और शिप्रा नदीके तटपर स्थित भगवान् शिवका दर्शन एवं भक्ति-भावसे पूजन करता है, वह पिता-माताके वंशका भलीभाँति उद्धार करके भगवान् शिवके समीप जाता है। गोपीन्द्र नामसे प्रसिद्ध जो तीर्थ है, उसमें स्नान करके मनुष्य इन्द्रके तुल्य पराक्रमी होता और स्वर्गलोक प्राप्त करता है। जो उस तीर्थमें मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे पुनः इस भूतलपर जन्म नहीं
९३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
लेते। गंगातीर्थमें ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको स्नान करनेका विशेष फल बताया जाता है। जो मनुष्य गंगातीर्थमें स्नान करके पुष्करण्डकका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकमें सुखी होता है। उत्तरेश्वरतीर्थमें स्नान करके मानव शीघ्र ही अपने पितरोंका नरकसे उद्धार कर देता है और स्वयं भी स्वर्गलोकमें जाता है। भूतेश्वरमें स्नान करके मनुष्य भूतेश्वरजीका गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे पूजन करे। इससे मृत्युके पश्चात् वह स्वर्गलोकको जाता है। जो मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर एकाग्रचित्त हो अम्बालिका देवीका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो गन्ध और पुष्पद्वारा देवेश्वर शिवका अर्चन करता है, उसे शिवलोकमें निवास प्राप्त होता है। जो मनुष्य पवित्र हो भगवान् पुण्येश्वरका दर्शन करता है, वह गणपतिपदको प्राप्त होता है। जो लुम्पेश्वरतीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरकी भलीभाँति पूजा करता है, वह नरकमें नहीं जाता, स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जो स्थविरविनायक तीर्थमें स्नान करके गन्ध, पुष्प, धूप और भक्ष्य, भोज्य आदि सामग्रियोंसे गणेशजीकी पूजा करता है, वह मृत्युके पश्चात् शिवलोकमें जाता है। जो विद्वान् मानव नवनदीके समीप गन्ध, पुष्प, धूप आदिके द्वारा पार्वतीजीका पूजन करता है, वह अनुपम सौभाग्यका भागी होता है। प्रयागतीर्थमें स्नान करके जो प्रयागेश्वरका दर्शन करता है, वह सब लोकोंको लाँघकर भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।
पूर्वकालमें भगवान् नर और नारायणने इस पृथ्वीपर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रूपमें अवतार लिया था। श्रीकृष्णके अवतारका उद्देश्य कुछ और था और अर्जुन किसी अन्य हेतुसे ही प्रकट हुए थे। श्रीकृष्णने कंस आदि समस्त दानवोंका युद्धमें संहार कर डाला। तदनन्तर कुन्तीपुत्र अर्जुन इन्द्रसे अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये स्वर्गलोकमें गये। वहाँ अस्त्रविद्या प्राप्त कर लेनेपर वीरवर अर्जुनने देवराज इन्द्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये कहा। तब देवराज इन्द्रने कहा—‘अर्जुन! हिरण्यपुरमें निवास करनेवाले जो निवातकवच नामक उग्र दानव हैं, उनका शीघ्र वध करो, यही मेरे लिये गुरुदक्षिणा होगी।’ तब अर्जुनने उन दुष्ट दानवोंके वधकी प्रतिज्ञा की और एक भयंकर रथपर आरूढ़ हो धनुष-बाण लेकर युद्धके लिये प्रस्थान किया। उन समस्त दानवोंका संहार करके पार्थने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम दिखाया और सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न किया। उस समय कृतकार्य हुए अर्जुनसे इन्द्रने कहा—‘वीर! तुम कोई उत्तम वर माँगो।’ तब अर्जुनने उन दो प्रतिमाओंको माँगा, जिनकी पूजा साक्षात् ब्रह्माजीने की थी।
यह सुनकर इन्द्र बोले—अर्जुन! इन दोनों प्रतिमाओंका महात्मा शंकरने लाल कमलके फूलोंद्वारा ब्रह्माके एक दिनतक पूजन किया है। इसी प्रकार पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंका पालन करनेके लिये सुगन्धित नीलकमलके फूलोंसे सहस्रों वर्षोंतक इनकी पूजा की है। प्रजापति ब्रह्माजीने भी सृष्टि-रचनाकी कामना लेकर एकाग्रचित्त हो लाल कमलके फूलोंसे इन युगल प्रतिमाओंका पूजन किया है। कुन्तीनन्दन! तुम इन्हें मृत्युलोकमें कैसे ले जाओगे। इन प्रतिमाओंके बिना तो यह स्वर्गलोक तिनकेके तुल्य हो जायगा।
अर्जुनने कहा—प्रभो! मैं तो इसी वरदानका अभिलाषी हूँ, मुझे दूसरी कोई वस्तु नहीं चाहिये।
तब इन्द्रने कहा—वीर! तुम इन प्रतिमाओंको लेकर कुशस्थली (उज्जयिनी पुरी)-में स्थापित करो। शिप्राके उत्तर तटपर भगवान् केशव समस्त पापोंका नाश करनेवाले केशवार्की स्थापना करेंगे। सदा आषाढ़ और कार्तिकमासमें वहाँकी यात्रा होगी, मैं भी उस समय दर्शन करनेके लिये आऊँगा। मेरे साथ पवन, मेघ और बिजलियाँ भी होंगी। इन्हीं लक्षणोंसे मनुष्य कहेंगे कि ‘देवराज इन्द्र आ गये।’ मैं ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा पूजित भगवान् सूर्यको नमस्कार करके पुनः लौट आऊँगा।
ऐसा कहकर इन्द्रने अर्जुनको वे दोनों प्रतिमाएँ
- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३१
दे दीं और उन्हें अपने पुत्रके साथ मर्त्यलोकको भेज दिया। देवर्षि नारदजी भगवान् श्रीकृष्णको बुलानेके लिये द्वारकामें गये और वहाँ इन्द्रका रहस्ययुक्त वचन सुनाकर कहा—'श्रीकृष्ण! आप कुशस्थलीको चलिये और विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई पारिजात-निर्मित युगल प्रतिमाओंका पूजन कीजिये। इन्द्रने वे दोनों प्रतिमाएँ आप तथा अर्जुनके लिये भेंट की हैं।'
नारदजीका यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण उज्जयिनी पुरीको गये और वहाँ पाण्डुनन्दन अर्जुनको हृदयसे लगाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् उन्होंने अर्जुनसे कहा—'पार्थ! आज मुझे अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई है, तुम पूर्व दिशाकी ओर जाकर एक प्रतिमाकी स्थापना करो। दिनके पूर्वाह्नकालमें ही अति मनोरम शुभलग्नका उदय होगा। तब मैं भी प्रतिमा-स्थापनके लिये नदीके उत्तर तटको जाऊँगा। जब मेरा शंख बजे, उसी समय तुम सूर्यदेवकी स्थापना करो।'
यह आदेश पाकर अर्जुनने पूर्वदिशाकी ओर जा प्रतिमा-स्थापनाके योग्य शुभ स्थानका निरीक्षण किया। वे मन-ही-मन यह विचार करने लगे कि 'इस देवप्रतिमाका स्थापन कहाँ करूँ।' इतनेमें ही उस प्रतिमाने स्वयं ही कारणसहित उत्तम स्थान बता दिया और अपने तेजसे वह स्थान पार्थको दिखला भी दिया।
अर्जुन बोले—देव! यहाँ अनेक स्थान हैं, बताइये, कौन आपको अधिक पसंद है। गोपते! आप प्रजाजनोंके लिये सौम्य रूप और उत्तम दर्शनीय हो जाइये।
तब सूर्यदेवने अर्जुनसे कहा—पार्थ! तुम मेरे दर्शनसे भय न करो। ऐसा कहकर दाहिने हाथसे अभय प्रदान करते हुए उन्होंने आश्वासन दिया और सौम्य रूप धारण कर लिया। भगवान् प्रभाकरने उस समय अर्जुनको अपने तेजोमय स्वरूपका दर्शन कराया और कहा—'यही मेरा अविचल स्थान है।' इतनेमें ही लग्न आ गया और भगवान् श्रीकृष्णने अपने महान् शंखको बजाया। वह शंखनाद सुनकर नरावतार अर्जुनने देववन्दित सूर्यविग्रहको स्थापित कर दिया और इस प्रकार स्तवन किया।
अर्जुन बोले—किरणोंकी मालासे मण्डित, अत्यन्त प्रकाशमान एवं सात घोड़ोंके रथपर चलनेवाले उन भगवान् सूर्यकी जय हो, जिनका तेज समस्त भुवनोंमें व्याप्त है, जो पूर्व दिशाके अट्टहासकी-सी छवि धारण करते हैं तथा जिनके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे प्रचुर पाप-तापमय दोषोंसे ग्रस्त हुए मनुष्योंके अंग निष्पाप हो जाते हैं। उत्तम बुद्धिवाले प्रभो! ब्रह्मा आदि देवता और मुनि जिनकी स्तुति करते हैं, उन्हीं भगवान् पतंग (सूर्य)-की मैं अपनी बुद्धिद्वारा भलीभाँति विचार करके स्पष्ट अर्थ एवं मधुर अक्षरोंके योगसे युक्त विचित्र पद्योंद्वारा स्तुति करूँगा। नाथ! लाल कमलके समान निर्मल मण्डलवाले आप जबतक अपनी किरणोंसे अन्धकारका नाश करते हुए उदय नहीं होते, तबतक सम्पूर्ण जगत् निश्चल-सा ही (जड़वत्) प्रतीत होता है तथा तबतक नाना प्रकारकी क्रियाएँ भी सिद्ध नहीं होतीं। भगवन्! जबतक आप अपनी परम उत्तम प्रभासे वृक्षोंके सोये हुए पुष्प-गुच्छोंको विकसित (जाग्रत्) नहीं कर देते, तबतक उनके नेत्र बंद होनेके कारण वृक्षोंकी शाखाएँ शोभा नहीं पातीं और न उनपर भ्रमर ही मड़राते हैं। जिस समय आप आकाशमें उदित होते हैं, उस समय समस्त देवताओं और सिद्धोंके समुदाय, ब्रह्मा आदि देवेश्वर, दैत्य, मुनि, किन्नर, नाग, यक्ष तथा ज्ञानी देवगण अपने झुके हुए मस्तकोंद्वारा तथा चमकती हुई मुकुटमणियोंकी उत्तम प्रभाओंसे आपकी अर्चना करते हैं। सदा सबको वर देनेवाले भगवन्! आपके अस्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् सो जाता है और आपके तपनेपर पुनः जाग्रत् हो उठता है, इस प्रकार एकमात्र आप ही समस्त विश्वका हित करनेके लिये अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। नाथ! उत्साह, शक्ति, नीति और शौर्य आदिसे सम्पन्न तथा सेवा-प्रयोग एवं निर्माणक्रियामें तत्पर पुरुषोंके
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भी कार्य जो फलद नहीं होते, उसमें निश्चय ही आपके प्रति उनकी भक्तिका न होना ही कारण है। शरणागतवत्सल! युद्धभूमिमें मनुष्य रथ, हाथी, भाला, शक्ति, नाराच, चक्र, बाण, तोमर तथा भयंकर खड्गोंद्वारा जो शीघ्र ही शत्रुओंको परास्त करके विजयी होकर लौटते हैं, वह सब आपकी ही दी हुई शक्तिका प्रभाव है। भयानक स्थानों, दुर्गम और ऊँची-नीची भूमियोंमें तथा रीछ, हाथी, सिंह, बहुत-से कण्टक तथा चोरोंके बीचमें पड़े हुए संकटग्रस्त एवं अतिशय शोकसे मोहित चित्तवाले मानव भी आपके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे मृत्युके भयसे छूट जाते हैं। तेजोराशे! सूर्य! इस संसारमें जो सब ओरसे दुःखी हैं, उन्हें आप ही शरण देनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत्में आपके समान दयालु दूसरा कोई नहीं है। एकमात्र आपमें ही की हुई भक्ति पूर्णतः सफल होती है। आपकी शरणमें आ जानेपर मनुष्योंको रोग, व्याधिका कष्ट कैसे हो सकता है? देव! आप देखा करते हैं कि कौन कुष्ठरोगसे पीड़ित है, किसे शत्रु और रोग आदि सता रहे हैं, कौन पंगु, अन्ध और जड़ है, किनके पैर गल गये हैं और कौन निर्धन तथा निष्क्रिय हो गया है। इस प्रकार निरीक्षण करके आप कृपापूर्वक प्राणियोंकी उन-उन दोषोंसे रक्षा करते हैं। आपकी जैसी परोपकारपूर्ण चेष्टा देखी जाती है, वैसी और किसमें है? धर्म सेवित होनेपर परलोकमें फल देनेके लिये उपस्थित होता है। देवता उपासना करनेपर कालान्तरमें वरदान देते हैं। परंतु प्रणतवत्सल! आप कल्याणकामी पुरुषोंद्वारा सेवित होनेपर तत्काल ही उन्हें अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। यदि मनुष्योंने एक बार भी किसी प्रकार आपको मस्तक झुकाया है अथवा भुवनेश्वर! अन्तकालमें भी जिसने आपका चिन्तन किया है, वे संसारमें पापी होनेपर भी निष्पाप हो गये हैं और उन्होंने शुद्धचित्त होकर पुण्यात्माओंकी गति प्राप्त कर ली है। सुरश्रेष्ठ! जब आप उदय लेने लगते हैं, उस समय देवनदी गंगाके खिले हुए स्वर्णकमलोंसे निकले हुए झुंड-के-झुंड भ्रमर उनकी स्वर्णमयी धूलिसे अनुरंजित होकर उड़ते हैं। भगवन्! आप अपने किरणसमूहरूपी चरणोंके द्वारा समुद्रके मध्यमें स्थित होकर समस्त जीवोंके जीवनकी रक्षाके उद्देश्यसे तात्त्विक उपायका चिन्तन करनेके लिये मानो तपस्या करते हैं। तीनों लोकोंमें आपके समान दूसरा कौन है? सदा वेदके मार्गमें तत्पर रहनेवाले उदारबुद्धि ऋषि-मुनियोंद्वारा भी आपके गुणोंकी स्तुति नहीं की जा सकती। आप ही विष्णु हैं, आप ही चन्द्रमा हैं, आप ही दैत्योंका मान मर्दन करनेवाले स्वामिकार्तिकेय हैं। आप ही धनाध्यक्ष कुबेर हैं, आप ही काल हैं। आप ही ब्रह्मा हैं और आप ही पर्वत, मिट्टी, जलके आश्रय तथा अग्नि हैं। आप ही ब्राह्मणोंके जपनेयोग्य ॐकार हैं। आप ही वहाँ समुद्र हैं। आप ही यम, रुद्र, इन्द्र और मेघ हैं। आप ही व्रत, यम तथा नियम हैं और आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। त्रिपुरमथन! गोपते! सुराधीश! भगवन्! आपका मुख कमलके समान सुन्दर है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं, तीनों लोकोंमें आपके समान गुणवान् कौन है? आदित्य! भास्कर! दिवाकर! सप्ताश्ववाहन! मार्तण्ड! सूर्य! हरिदश्व! पतंग! भानो! अश्रान्तवाहन! आकाशस्वरूप! अंशुमालिन्! लोकनाथ! यह दास आपकी शरणमें आया है। जगत्प्रदीप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ब्रह्मण्य! सत्य! शुभ! मंगल! लोकनाथ! आकाशकमल! ईश! मुनिसंस्तुत! विश्वमूर्ते! आर्तजनोंका शोक नाश करनेवाले! सेवकोंका पालन करनेवाले! भगवन्! आप अपनी शरणमें आये हुए मुझपर प्रसन्न होइये। देव! आज मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे हुए दोनों हाथोंसे नमस्कारपूर्वक बड़े भक्ति-भावसे आपका स्तवन किया है, इसलिये प्रभो! आप मेरे ऊपर सौम्य रूप हो जाइये और मेरी बुद्धिको धर्ममें लगाइये। जो सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, वेदत्रयीमय हैं अथवा त्रिभुवनस्वरूप हैं, त्रिगुणात्मक शरीर धारण करनेवाले हैं और समस्त विश्वकी उत्पत्ति, पालन तथा संहारके
* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३३
हेतु हैं, उन ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार है।
सूर्यदेव बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले अर्जुन! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे इस समय सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, उसकी पूर्तिके लिये यत्नपूर्वक वर दूँगा।
अर्जुनने कहा—प्रभो! मेरे लिये यही सबसे उत्तम वर है कि आप इस विग्रहमें सदा स्थित रहें। जो मनुष्य आपको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करें, उनको आप मनोवांछित वस्तु प्रदान करें।
सूर्यदेवने कहा—अर्जुन! जो भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करके इस स्तोत्रद्वारा मेरी स्तुति करेंगे, उनके पास कभी धन-सम्पत्तिकी कमी नहीं होगी।
भगवान् सूर्यकी अष्टोत्तरशतनामोंद्वारा स्तुति तथा अन्यान्य तीर्थोंकी महिमा
सनत्कुमारजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्णने भी शंख बजाकर सूर्यदेवकी भलीभाँति स्थापना करके एकाग्रचित्त हो इस प्रकार स्तवन किया—
(१) आदित्य, (२) भास्कर, (३) भानु, (४) रवि, (५) सूर्य, (६) दिवाकर, (७) प्रभाकर, (८) दिवानांथ, (९) तपन, (१०) तपनेवालोंमें श्रेष्ठ, (११) वरेण्य, (१२) वरद, (१३) विष्णु, (१४) अनघ, (१५) वासवानुज (इन्द्रके छोटे भाई), (१६) बल, (१७) वीर्य, (१८) सहस्रांशु, (१९) सहस्रकिरणद्युति, (२०) मयूखमाली, (२१) विश्व, (२२) मार्तण्ड, (२३) चण्डकिरण, (२४) सदागति, (२५) भास्वान्, (२६) सप्ताश्व, (२७) सुखोदय, (२८) देवदेव, (२९) अहिर्बुध्न्य, (३०) घामनिधि, (३१) अनुत्तम, (३२) तप, (३३) ब्रह्ममयालोक, (३४) लोकपाल, (३५) अपाम्पति, (३६) जगत्प्रबोधक, (३७) देव, (३८) जगद्दीप, (३९) जगत्प्रभु, (४०) अर्क, (४१) निःश्रेयसपर, (४२) कारण, (४३) श्रेयसापर, (४४) इन, (४५) प्रभावी, (४६) पुण्य, (४७) पतंग, (४८) पतंगेश्वर, (४९) मनोवांछितदाता, (५०) दृष्टफलप्रद, (५१) अदृष्टफलप्रद, (५२) ग्रह, (५३) ग्रहकर, (५४) हंस, (५५) हरिदश्व, (५६) हुताशन, (५७) मंगल्य, (५८) मंगल, (५९) मेध्य, (६०) ध्रुव, (६१) धर्मप्रबोधन, (६२) भव, (६३) सम्भावित, (६४) भाव, (६५) भूतभव्य, (६६) भवात्मक, (६७) दुर्गम, (६८) दुर्गतिहर, (६९) हरनेत्र, (७०) त्रयीमय, (७१) त्रैलोक्य-तिलक, (७२) तीर्थ, (७३) तरणि, (७४) सर्वतो-मुख, (७५) तेजोराशि, (७६) सुनिर्वाण, (७७) विश्वेश, (७८) शाश्वत, (७९) घाम, (८०) कल्प, (८१) कल्पानल, (८२) काल, (८३) कालचक्र, (८४) क्रतुप्रिय, (८५) भूषण, (८६) मरुत, (८७) सूर्य, (८८) मणिरत्न, (८९) सुलोचन, (९०) त्वष्टा, (९१) विष्टर, (९२) विश्व, (९३) सत्कर्मसाक्षी, (९४) असत्कर्म-साक्षी, (९५) सविता, (९६) सहस्राक्ष, (९७) प्रजापाल, (९८) अधोक्षज, (९९) ब्रह्मा, (१००) वासरारम्भ, (१०१) रक्तवर्ण, (१०२) महाद्युति, (१०३) शुक्ल, (१०४) मध्यन्दिन, (१०५) रुद्र, (१०६) श्याम, (१०७) विष्णु और (१०८) दिनान्त नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्यको प्रणाम करता हूँ।
इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा कहे हुए इन एक सौ आठ दिव्य नामोंको जो मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसे कभी विपत्तियाँ नहीं प्राप्त होतीं तथा सर्वत्र शुभकी प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं; उसे धन, धान्य, सुख, पुत्र, तेज, प्रज्ञा, परम ज्ञान, विशुद्ध बुद्धि एवं परम पदकी प्राप्ति भी होती है।
इस प्रकार स्तुति सुनकर जगदीश्वर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। केशवादित्यके मुखारविन्दका
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दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हुआ मनुष्य सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
सनत्कुमारजी कहते हैं—असुरोंके स्वामी तारकका वध करके महाबलवान् स्वामिकार्तिकेयजीने अपनी शक्तिको शिप्रा नदीके जलमें फेंक दिया। उस शक्तिने पातालतककी भूमिको विदीर्ण कर डाला। उसी मार्गसे भगवती गंगा ऊपर निकल आयीं, जो समस्त तपस्वी मुनियों और देवताओंके द्वारा वन्दनीय हैं। कोटितीर्थ तीनों लोकोंमें पवित्र कहा गया है, वहाँ ब्रह्माजीने कोटितीर्थेश्वर शिवकी स्थापना की है। कोटितीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् कोटिश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुने! जो वहाँ श्राद्ध करता है, उसे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो पूर्णिमा तथा अमावास्याको शस्त्रधारी कार्तिकेयका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंतक पुत्रहीन, निर्धन तथा रोगी नहीं होता। जो मनुष्य उस तीर्थके उत्तम जलमें प्रवेश करता है, वह दिव्य लोकमें तबतक अक्षय सुखका उपभोग करता है, जबतक कि सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता बनी रहती है।
स्वर्णक्षुर आदिकी महिमा, अन्धकासुरका युद्ध, नरदीप एवं शंखोद्धार आदिका माहात्म्य
सनत्कुमारजी कहते हैं—जो मनुष्य स्वर्णक्षुर नामक तीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करता है, उसे सौ कपिलादानसे भी अधिक फल प्राप्त होता है। जो जितेन्द्रिय पुरुष ब्रह्माजीकी वापी (बावली या कुण्ड)-में स्नान करता है, वह हंसयुक्त विमानद्वारा ब्रह्मलोकको जाता है। जो मनुष्य चैत्र या फाल्गुनमासमें विष्णुवापीमें स्नान करके जितेन्द्रिय हो उपवासपूर्वक रात्रिमें जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो मनको संयममें रखकर भक्तिपूर्वक अभयेश्वर देवके पट्टबन्धका दर्शन करता है, वह रुद्रलोकको जाता है। मुने! जो मनुष्य एकचित्त होकर अगस्त्येश्वरके समीप जाता है और अगस्त्योदयके समय उनका दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
काशपुष्पप्रतीकाश वह्निमारुतसंभव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥
‘काश-पुष्पके समान गौरवर्ण, अग्नि और वायु (अग्नीषोम)-से प्रकट मित्रावरुण-पुत्र कुम्भयोने! आपको नमस्कार है।’
इस मन्त्रसे अगस्त्यजीको अर्घ्य देनेवाला मानव पुत्रवान् और धनवान् होता है। मृत्युके पश्चात् वह स्वर्गलोकमें जाता है और स्वर्गभोगके अनन्तर पुनः इस मर्त्यलोकमें आकर पवित्र धनवानोंके घरमें जन्म लेता है अथवा महान् योगीश्वर होता है।
व्यास ! उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाली दिव्य पुरी उज्जयिनी प्रथम कल्पमें स्वर्णशृंगा कहलाती है, दूसरेमें इसका नाम कुशस्थली होता है। तीसरेमें इसे अवन्तिका कहते हैं। चतुर्थ कल्पमें इसका नाम अमरावती होता है। पंचम कल्पमें चूडामणि, छठेमें पद्मावती और सातवेंमें इसका नाम उज्जयिनी जानना चाहिये।
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इन नामोंका पाठ करता है, वह निःसन्देह सात जन्मोंके पापसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन कालकी बात है। उज्जयिनीपुरीमें अन्धक नामसे प्रसिद्ध दैत्य राज्य करता था। उसके महापराक्रमी पुत्रका नाम कनकदानव था। एक बार उस महाशक्तिशाली वीरने युद्धके लिये इन्द्रको ललकारा, तब इन्द्रने क्रोधपूर्वक उसके साथ युद्ध करके उसे मार गिराया। उस दानवको मारकर वे अन्धकासुरके भयसे भगवान् शंकरको ढूँढ़ते हुए कैलास पर्वतपर चले गये। वहाँ देवताओंके स्वामी इन्द्रने भगवान् चन्द्रशेखरका दर्शन करके अपनी अवस्था उन्हें
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बतायी और प्रार्थना की—'भगवन्! मुझे अन्धकासुरसे अभय दीजिये।'
इन्द्रका ऐसा वचन सुनकर शरणागतवत्सल शिवने अभय देते हुए कहा—'इन्द्र! तुम अन्धकासुरसे भय न करो।' इस प्रकार सान्त्वना देकर भगवान् शिवने महाभयानक रौद्र रूप धारण किया और वे एक चरणसे पृथ्वीपर उतरे। जहाँ उनका पैर पड़ा, उसी स्थानपर सर्वदेववन्दित एक कुण्ड प्रकट हो गया। भगवान् शिवने वहाँ पैर रखा था, इसलिये उस कुण्डका नाम 'शिवपद' प्रसिद्ध हो गया। सर्वप्रथम श्रीशंकरके चरणांगुष्ठकी कोटि (कोना) वहाँ पड़ी थी, इसलिये वह तीर्थ सर्वपापनाशक कोटितीर्थके नामसे भी विख्यात हुआ। वहीं भगवान् अगस्त्यने करोड़ों तीर्थोंका स्थापन किया था, इस कारणसे भी लोकमें उसका 'कोटितीर्थ' नाम पड़ गया। उस तीर्थका दर्शन करके सब देवताओंने अपने हितकी इच्छासे उसमें स्नान किया। महाकालमय स्वरूप धारण करके भगवान् शिवका वहाँ आगमन हुआ था, इसीलिये वे उस तीर्थमें महाकालके नामसे प्रसिद्ध हुए हैं।
दानव अन्धकासुरने जब इन्द्रके द्वारा अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुना, तब महान् क्रोधमें भरकर उसने रणके बाजे बजवाये और सेनासहित उस स्थानपर आया, जहाँ सब देवता मौजूद थे। रथ, हाथी आदिसे युक्त विशाल सेनाके साथ महायुद्धके लिये उद्यत हुए दानवोंको आते देख देवतालोग भगवान् शिवकी शरणमें गये। तब वे त्रिनेत्रधारी भगवान् महाकाल 'देवताओ! निर्भय रहो।' ऐसा कहकर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े हो गये। दैत्योंपर भगवान् रुद्रका कोप होते ही सारा आकाश-मण्डल प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त हो गया। अन्धकासुरने क्रोधमें भरकर देवताओंके विनाशके लिये करोड़ों दुःसह बाणोंकी झड़ी लगा दी। पिनाकधारी महाकालने आगकी चिनगारियों और ज्वालाओंको छोड़ते हुए उस दानवके अस्त्र-शस्त्रोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। साथ ही अन्धकासुरको भी अनेक बाणोंसे घायल किया। जैसे भ्रमर कमलके फूलपर छा जाते हैं, उसी प्रकार भगवान् शंकरके बाणोंने अन्धकको सब ओरसे आच्छादित कर दिया। अन्धकासुर युद्धमें स्थित होनेपर भी अत्यन्त शिथिल हो गया, उसके अस्त्र-शस्त्र भी शिथिल हो गये। भगवान् शिवके गण भी बड़े भारी योद्धा थे, साथ ही उन्हें भगवान् शंकरका सामीप्य भी प्राप्त था; इसलिये उन्होंने युद्धमें उत्साहपूर्वक लड़कर अन्धकासुरकी सेनाको मार डाला।
अपनी सेनाको देवताओंद्वारा छिन्न-भिन्न की हुई देख और अपनेको भी महेश्वरके बाणोंसे क्षत-विक्षत हुआ पाकर अन्धकासुर विकल शरीरसे भयभीत हो उठा। तब उसने तामसी माया फैलायी। उस मायासे उसका शरीर अदृश्य हो गया और वह उत्तर दिशाकी ओर चल दिया। अन्धकासुर जिस-जिस मार्गसे गया, उसी-उसीसे शंकरजीने भी उसका पीछा किया। एक स्थानपर पहुँचकर अन्धकासुर बोला। फिर भगवान् शिव भी उसी प्रकार बोले। तबसे वहाँ वागन्धक नामसे विख्यात तीर्थ प्रकट हो गया। अगहन सुदी नवमीको वहाँ स्नान करके पवित्र हो जो श्रद्धापूर्वक शक्करसहित अन्नदान करता है, उसका वह सब पुण्य अक्षय होता है तथा दाता शिवलोकमें जाता है।
इसी समय अपने तेजसे दिशाओंके अन्धकारको दूर करते हुए (अर्जुनद्वारा स्थापित) भगवान् नरादित्य मनुष्यका रूप धारण करके उठे। उनके द्वारा अन्धकार नष्ट होनेपर प्रकाशमें जब वह दैत्य स्पष्ट दिखायी देने लगा, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा नररूपधारी सूर्यनारायणका स्तवन किया और उनका नाम 'नरदीप' रख दिया। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक नरदीप नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्यका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य षष्ठी या सप्तमी तिथिको रविवारके दिन उपवास करके दिनक्षय, संक्रान्ति, ग्रहण तथा विषुवयोगपर कुण्डमें स्नान करके पवित्र हो मनको संयममें रखता और जप करते हुए स्तुति,
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वाद्य और मंगलगीतके साथ भगवान् नरदीपका दर्शन करता है तथा पूजन और साष्टांग प्रणाम करके प्रातःकाल, मध्याह्न एवं अपराह्नमें सूर्यदेवकी परिक्रमा करता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और अन्तमें सूर्यलोकको जाता है। पूर्वकालमें नरावतार अर्जुनने इन्द्रसे सूर्य-प्रतिमाको प्राप्त करके उसे प्रसन्नतापूर्वक इस तीर्थमें स्थापित किया है, इस कारणसे ये भगवान् सूर्य नरदीप कहे गये हैं।
ज्येष्ठ व्यतीत होनेपर भगवान् सूर्यको रथपर विराजमान करके श्रेष्ठ द्विज अपनी भुजाएँ लगाकर उस रथको कुशस्थलीमें पहुँचाते हैं। उस समय उत्तर दिशाको आते हुए भगवान् सूर्यका जो दर्शन करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका पूरा फल प्राप्त होता है। जो केशवादित्यके स्थानसे लौटे हुए रथका दर्शन करता है अथवा रस्सी पकड़कर स्वयं भी उस रथको खींचता है, वह अपने कुलका एवं पिता-पितामह आदि पितरोंका उद्धार कर देता है। जो दक्षिण दिशामें नरदीप देवका संयमपूर्वक दर्शन करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रीसूर्यदेवकी परिक्रमा करते हैं, उनके द्वारा सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा हो जाती है। प्रातःकाल उठकर मौन हो भक्तिभावसे भगवान् सूर्यके समीप जाय; पूर्वद्वारसे दर्शन और नमस्कार कर, दक्षिणद्वारसे प्रवेश करके रथचक्रकी पूजा करे। तदनन्तर उसी द्वारसे निकलकर प्रणामपूर्वक आगे जाय और पश्चिम द्वारका आश्रय ले रथमें स्थित हुए सूर्यदेवका अर्चन करे। जो मनुष्य इस प्रकार नरदीपजीकी रथ-यात्रा करता है, वह अपनी रुचिके अनुसार इन्द्रलोक, सूर्यलोक, शिवलोक तथा गोलोकका सुख पाता है। जो मनुष्य भगवान् सूर्यनारायणके अग्रभागमें स्थित वापीमें एक मासतक प्रतिदिन अवगाहन करके नरदीपजीका दर्शन करता है, उसके दुःस्वप्नका नाश हो जाता है।
अन्धकार नष्ट होनेपर जब सब ओर उत्तम प्रकाश छा गया, तब भगवान् महेश्वरने तीन शिखाओंवाले त्रिशूलसे अन्धकासुरको विदीर्ण कर डाला। इससे ब्रह्मा और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भगवान् विष्णुने देवताओंके हितकी इच्छासे शंखनाद किया। जहाँ उन्होंने शंख बजाया, वहाँ शंखोद्धारण नामसे प्रसिद्ध तीर्थ हो गया। वहाँ भगवान् विष्णु सदा निवास करते हैं। वहीं अनादि चतुर्मुख लिंग भी है। उस लिंगके समीप ही विष्णुदेवके दक्षिण भागमें त्रिशूलसे लक्षित होनेवाले भगवान् शिव विराजमान हैं। जो जितेन्द्रिय पुरुष चतुर्दशी और अष्टमीको इन सबका दर्शन करते हैं, वे समस्त पापराशिके क्षीण हो जानेसे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो वहाँ स्नान और एकादशीका व्रत करके शंखधारी भगवान् जनार्दनका दर्शन करता है, वह अच्युतपद (वैकुण्ठधाम)-को प्राप्त होता है।
## ॐकारेश्वर आदिका महत्त्व तथा अन्धकासुरको शिवगणोंमें श्रेष्ठ स्थानकी प्राप्ति
सनत्कुमारजी कहते हैं—भगवान् रुद्रके त्रिशूलसे अन्धकासुरके विदीर्ण होनेपर वहाँ एक विशेष प्रकारकी ध्वनि प्रकट हुई। उसी स्थानपर ॐकारेश्वर महादेवका अविर्भाव हुआ। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र हो समाधि तथा नियमसे जो ॐकारस्वरूप महादेवका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अन्धकासुरको घायल करके वह त्रिशूल पातालगंगाके जलमें चला गया। पातालनिवासी भगवान् हाटकेश्वर उसी शूलके मार्गसे ऊपर निकले। इसीलिये उन्हें शूलेश्वर कहा गया है। उनके उत्तर भागमें धूतपाप नामक तीर्थ है। वहीं वह पापात्मा एवं पराक्रमी दैत्यराज त्रिशूलसे गिराया गया था।
- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९३७ ---|---
इसीलिये उस तीर्थको धूतपाप कहते हैं। जो जितेन्द्रिय शिवभक्त अष्टमी, पूर्णिमा, चतुर्दशी तथा शनिवारको एक रात उपवास करके धूतपाप नामक महेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य पौषके महीनेमें वहाँ स्नान करके शिवजीका दर्शन करता है, वह शूलेश्वरके प्रभावसे ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है और मृत्युके पश्चात् परम पदको प्राप्त होता है।
इस प्रकार अन्धकासुरको विदीर्ण करके भगवान् शिवका त्रिशूल ज्यों-ही पातालगंगाको गया, त्यों-ही अन्धकासुरके रक्तसे उत्पन्न सहस्रों भयंकर दैत्य वहाँ युद्धके लिये खड़े हो गये। तब महादेवजीने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। उस भयंकर गर्जनासे मूर्च्छित होकर वे पापी दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। उस महावनमें जहाँ भगवान् शंकरने सिंहनाद किया था, वहाँ समस्त पापोंका नाश करनेवाले सिंहेश्वरदेव विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सिंहके समान बलवान् होता है। सिंहनाद करनेपर जहाँ भगवान्का श्री-विग्रह रौद्ररससे कण्टकित (रोमांचित) हो गया था, वहाँ वे कण्टकेश्वरदेवके नामसे विद्यमान हैं, जो भक्तोंको सदा सब कुछ देनेवाले हैं। जो मानव उस तीर्थमें स्नान करके कण्टकेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह कहीं भयको नहीं प्राप्त होता। जहाँ शंकरजीने इन्द्रको अभयदान दिया था, वहाँ अभयेश्वर नामक उत्तम लिंग प्रकट हुआ। वहाँ स्नानसे पवित्र हो उपवास करके जो जितेन्द्रिय पुरुष देवदेवेश्वर शिवका पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञके फलको प्राप्त होता है। उस समय भगवान् शिवके मस्तकसे पृथ्वीपर जो पसीनेकी बूँद गिरी, उससे अंगारके समान लाल अंगवाले भूमिपुत्र मंगल उत्पन्न हुए। अंगारक, रक्ताक्ष तथा महादेव-पुत्र इन नामोंसे स्तुति करके ब्राह्मणोंने उन्हें ग्रहोंके मध्यमें प्रतिष्ठित किया। तत्पश्चात् उसी स्थानपर ब्रह्माजीने अंगारकेश्वर नामक उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। जो पवित्रात्मा मनुष्य मंगलवारको उस तीर्थमें स्नान तथा अंगारकेश्वरका दर्शन करता है, वह समस्त पातकोंसे छूट जाता है। मंगलवारको चतुर्थी तिथिमें रात्रिके समय अर्घ्य देना चाहिये। जबतक चार चतुर्थी पूरी न हो जाय, तबतक प्रयत्नपूर्वक यह अर्घ्यदानका नियम चलाते रहना चाहिये।
इस प्रकार त्रिशूलसे आहत होनेके बाद अन्धकासुरको बड़ा भय हुआ। वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न करने लगा। संसारमें जीवन-रक्षाका दूसरा कोई उपाय न देखकर उसने भगवान् शंकरका ही स्तवन प्रारम्भ किया। वह बोला— 'जो इस सम्पूर्ण चराचर जगत्के कर्ता और इसे अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार सुख-दुःख देनेवाले हैं, जो संसारकी उत्पत्तिके हेतु तथा उसका अन्तकाल भी स्वयं ही हैं, सबको शरण देनेवाले उन्हीं भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके मोह, तमोगुण और रजोगुण दूर हो गये हैं, वे योगीजन, भक्तिसे मनको एकाग्र रखनेवाले निष्काम भक्त तथा अपरिच्छिन्न बुद्धिवाले ज्ञानी भी जिनका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन अनन्त दिव्यस्वरूप शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सुशोभित किरणोंवाले निर्मल अर्धचन्द्रका मुकुट बाँध सदा अपने मस्तकपर गंगाजीको धारण करते हैं और जिन्होंने अपने वामांग भागमें गिरिराजकिशोरी उमाको धारण कर रखा है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। सिद्ध और चारण जिनके चरणारविन्दोंकी सेवा करते रहते हैं और जिन्होंने आकाशसे ऊँची-ऊँची उत्ताल तरंगोंके साथ विषम वेगसे गिरती हुई त्रिभुवनपावनी गंगाको अपने मस्तकपर पुष्पमालाकी भाँति धारण कर लिया था, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिसके भारसे कैलासपर्वतका शिखर हिलने लगता था, उस कैलास शृंगके सदृश विशालकाय दशाननने भी जिनके युगलचरणारविन्दोंकी सेवा की है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। महेश्वर! जो मूढ़ पुरुष चराचर जगत्के गुरु
९३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आपको नहीं जानते हैं, वे ऐश्वर्यका अहंकार नष्ट होनेपर मेरी ही भाँति पश्चात्ताप करते और दुस्सह यातना भोगते हैं।'
इस प्रकार स्तुति करते हुए अन्धकासुरसे सबका कल्याण करनेवाले शूलपाणि भगवान् शिव प्रसन्न होकर बोले—वत्स! मैं प्रसन्न हूँ, अब तुम शुद्ध-निर्मल हो गये हो। अतः तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ, निश्चिन्त होकर मेरी ओर देखो। दानवश्रेष्ठ! तुम्हारे मनमें जो कोई भी आकांक्षा हो, उसे माँगो; मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा।
अन्धकासुर बोला—देवेश्वर! मुझे गणपतिपद प्रदान कीजिये, क्योंकि वह सदा अक्षय है।
भगवान् शिव बोले—वत्स! तुम मेरे गणोंके अध्यक्ष होकर रहो। तुम्हें अणिमा आदि समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और सदैव तुम मेरे प्रिय बने रहोगे।
सनत्कुमारजी कहते हैं—इस प्रकार दुर्लभ वरदान पाकर वह अन्धक महादेवजीका मुख्य गण होकर वहीं अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर भगवान् शिव कैलासपर्वतपर चले गये।
उज्जयिनीपुरीके कनकश्शृंगा आदि नाम पड़नेका कारण
व्यासजीने पूछा—भगवन्! इस महाकाल वनमें कितने तीर्थ और शिवलिंग हैं, यह बतानेकी कृपा करें।
सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! महाकाल वनमें साठ कोटि सहस्र और साठ कोटि शत तीर्थ हैं तथा शिवलिंगोंकी तो कोई संख्या ही नहीं है। सकाम या निष्कामभाव रखनेवाला जो मनुष्य इस सुन्दर महाकाल वनमें जन्म लेता है, वह भगवान् शिवके धाममें प्रतिष्ठित होता है। ब्रह्मन्! सभी तीर्थ और सभी सिद्ध क्षेत्र सब ओरसे पवित्र एवं पुण्यजनक हैं। उन सबमें इस महाकालतीर्थ और क्षेत्रको मुख्य जानो।
व्यासजीने पूछा—मुने! उज्जयिनीपुरीका नाम पहले कनकश्शृंगा क्यों हुआ? फिर उसका कुशस्थली नाम कैसे हुआ? आगे चलकर अवन्ती नाम कैसे पड़ा? पद्मावती और उज्जयिनी नामोंका भी हेतु क्या है? यह सब बतावें।
सनत्कुमारजीने कहा—एक समय महादेवजी तथा ब्रह्माजी सुवर्णमय शिखरोंसे युक्त अद्भुत पुरीका दर्शन करनेके लिये भूतलपर आये। यहाँ आकर उन्होंने सम्पूर्ण विश्वके स्वामी भगवान् विष्णुरूपको नमस्कार किया। विष्णुरूपने भी विधि और आदरके साथ सेवकोंसहित उन दोनोंका स्वागत-सत्कार किया और पूछा—'महेश्वर! तथा ब्रह्माजी! आप दोनों अपने अनुगामियोंसहित देवलोकसे पृथ्वीपर कैसे पधारे हैं!' यह सुनकर ब्रह्मा और महादेवजी बोले—'प्रभो! जहाँ आप विराजमान हैं, वहीं हम दोनोंका भी स्नेह है। आपके बिना हमें स्वर्ग, पृथ्वी अथवा पातालमें भी सुख नहीं है। भगवन्! आपने यह सुवर्णमय शिखरवाली विचित्र पुरी कब बसायी है? जगदीश्वर! आप यहाँ हमें भी स्थान दें।'
यह सुनकर विश्वरूपमय विष्णुने प्रसन्नचित्त होकर कहा—मैं आप दोनोंको अभीष्ट स्थान देता हूँ। प्रजापते! इस पुरीके उत्तर भागमें आपका स्थान है और महेश्वर! आपके लिये दक्षिण भागमें स्थान दिया गया है। अतः आप वहीं पधारें। आप दोनोंने इस पुरीको सुवर्णमय शिखरवाली बताया है, इसलिये यह संसारमें 'कनकश्शृंगा' नामसे विख्यात होगी।
इस प्रकार इस पुरीका प्रथम नाम कनकश्शृंगा बताया जाता है। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी तीनों रहकर प्रसन्नताका अनुभव करते हैं और अपने भक्तोंको समस्त मनोवांछित फल देते हैं।