भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 956, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 956

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९२७

करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुलोकको जाता है। जो मनुष्य अजागन्धमें स्नान करके ब्रह्मेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह ब्रह्महत्याके समान पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है। जो चक्रतीर्थमें स्नान करके चक्रस्वामीकी पूजा करता है, वह इस पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है। जो विधिपूर्वक स्नान करके सिद्धेश्वरका दर्शन करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा रुद्रलोकमें जाता है। जो मनुष्य सोमवतीमें स्नान करके सोमेश्वर शिवका पूजन करता है, वह चन्द्रमाके समान निर्मल होकर चन्द्रलोकमें आनन्द भोगता है।

व्यासजीने पूछा—भगवन्! सोमवतीतीर्थ और सोमेश्वर लिंगका प्राकट्य किस प्रकार हुआ, इसको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।

सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! सुनो, सम्पूर्ण लोकोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले जो भगवान् सोम हैं, उनके पिता महाभाग अत्रिमुनि पूर्वकालमें उज्जयिनीपुरीमें रहकर तीन हजार दिव्य वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्यामें लगे रहे। वे दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर ब्रह्मध्यानमें तत्पर हो तपस्या करते थे। उन महात्माका ब्रह्मतेज उनके नेत्रोंसे प्रकट हुआ और सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ ऊर्ध्वलोकतक फैल गया। जब कोई भी उसे धारण करनेमें समर्थ न हुआ, तब वह असह्य तेज सम्पूर्ण लोकोंको उद्भासित करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसीसे शीतकिरणोंवाले सोम प्रकट हुए, जो सब लोगोंको प्रिय हैं। उसी तेजसे सोमा नामकी एक नदी भी उत्पन्न हुई, जो अमृतमय जलसे पूरित हो शिप्रा नदीमें जाकर मिल गयी। तबसे वह तीर्थ सोमवती-शिप्राके नामसे विख्यात है। सोमवती-शिप्रा अत्यन्त पुण्यदायिनी है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंको त्याग देता है। मुने! सोमवती अमावास्याका योग आनेपर जो बुद्धिमान् मनुष्य सोमवती-शिप्रामें स्नान-दान, जप तथा होम करता है, उसका किया हुआ वह सब पुण्य अक्षय होता है। यहाँपर तिल और जलद्वारा तर्पण तथा पिण्डदान करनेसे पितरोंकी यथावत् तृप्ति होती है। शिप्रा नदी एवं सोमवतीके संगमका जल कोटि तीर्थोंका फल देनेवाला है। यदि अमावास्या और सोमवारका योग मिल जाय तब तो वह साक्षात् पितृतीर्थ (गया)-के समान हो जाता है। अमावास्या, सोमवार और व्यतीपात तीनोंका योग होनेपर सोमवतीतीर्थमें गयासे सौ गुना अधिक पुण्य कहा गया है।

चन्द्रमाको पृथ्वीपर गिरा हुआ देख जगद्गुरु ब्रह्माजीने उन्हें सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे रथपर बिठाया। उस रथपर ब्रह्माजीके साथ चन्द्रमाको देखकर सब देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक स्तवन किया। उस समय चन्द्रमाका प्रकाशमान तेज पृथ्वीपर सब ओर गिरा। ब्रह्माजीने उस रथसे इक्कीस बार पृथ्वीकी परिक्रमा की। इससे चन्द्रमाका शीतल तेज सर्वत्र गिरा। वह तेज ही पृथ्वीसे अत्यन्त निर्मल ओषधियों (अन्न आदि)-के रूपमें उत्पन्न हुआ। उन्हीं ओषधियोंके द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व तथा यहाँ रहनेवाली चार प्रकारकी प्रजा जीवन धारण करती है। तदनन्तर भगवान् सोमने प्रसन्न होकर दस हजार वर्षोंतक अत्यन्त दुःसह तप किया। उस तपस्यासे सन्तुष्ट हुए लोकपितामह ब्रह्माजीने सोमको आधिपत्य प्रदान किया। वे बीज, ओषधि और ब्राह्मणोंके राजा हुए। प्रचेताओैंके पुत्र प्रजापति दक्षने अपनी सत्ताईस कन्याओंको, जो महान् व्रतका पालन करनेवाली तथा नक्षत्र नामसे प्रसिद्ध थीं, राजा सोमके साथ ब्याह दिया।

एक समय सोमवारके दिन सोमवती अमावास्याके योगमें राजा सोम महादेवजीके दर्शनकी इच्छासे अवन्ती पुरीमें आये। उन्होंने अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके सोमवतीमें स्नान किया और सोमेश्वरकी पूजा की। उनकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने कहा—'सोम! मेरी कृपासे तुम्हारा शरीर बहुत सुन्दर एवं कमनीय हो जायगा और आजसे यह मेरा विग्रह सोमेश्वर नामसे विख्यात होकर भोग

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