संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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स्नान करके पुनः उन्हीं दोनोंका दर्शन करे। उसके बाद कुण्डमें स्नान करके गोविन्दकी पूजा करे। फिर चक्री और शंखीभगवान्का दर्शन करके युगल अंकपादों (चरणचिह्नों)-का दर्शन करके विश्वरूपका दर्शन करे। विश्वरूपके आगे करीकुण्डमें विधिपूर्वक स्नान करनेके पश्चात् पूर्ववत् बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। तदनन्तर पुनः कुण्डमें स्नान करके गोविन्दजीकी पूजा करे। उसके बाद चक्रधारी श्रीकृष्ण और बलरामका दर्शन करके केशवके समीप जाय। शिप्राके जलमें स्नान करके मनुष्य भक्तिपूर्वक केशवकी पूजा करे। फिर वहाँसे अंकपादमें लौटकर वहीं रात्रि व्यतीत करे। प्रातःकाल स्नान आदिसे पवित्र हो वहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पाँच ब्राह्मणोंको भोजन करावे। जो पुरुष द्वादशीको उपवास करके चन्दन, पुष्प, धूप तथा भाँति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा अंकपादजीकी पूजा करता है तथा जो वहाँ श्राद्ध करता है, वह सदैव वैकुण्ठधाममें निवास करता है।
लड्डुकप्रिय गणेश, कुसुमेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, ब्रह्माणी देवी, ब्रह्मेश्वर, यज्ञवापी, रूपकुण्ड, अनंगेश्वर तथा सोमेश्वरका माहात्म्य
**सनत्कुमारजी कहते हैं—**देवताओंने लड्डुओंसे विघ्नराज गणेशजीकी पूजा की थी, तबसे यहाँ गणेशजी लड्डुकप्रियके नामसे प्रसिद्ध हैं। जो भक्तिपूर्वक विघ्नराज गणेशजीकी पूजा करता है, उसे कभी विघ्नका सामना नहीं करना पड़ता। गणेशजी सन्तुष्ट होकर उस पुरुषकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी कर देते हैं। चतुर्थीको केवल रातमें भोजन करनेका व्रत लेकर विशेषतः शिप्रा नदीमें स्नान करके रक्त वस्त्र धारण करे और लाल चन्दनके जलसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक गणेशजीको स्नान करावे। फिर लाल चन्दनका अनुलेपन करके लाल फूलोंसे उनकी पूजा करे। धूप और उत्तम गन्ध निवेदन करे। नैवेद्यमें लड्डुओंका भोग लगावे। जो ऐसा करता है, वह मृत्युके पश्चात् शिवधामको जाता है।
जो सुरद्वारमें देवदानववन्दित कुसुमेश्वर शिवकी श्रद्धासे पूजा करता है, वह शिवलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जो देवाधिदेव जयेश्वर महादेवका दर्शन करता है, वह सब कार्योंमें विजयी होता है और अन्तमें शिवलोकको जाता है। यदि मनुष्य शिवद्वारमें शिवलिंगका अर्चन करे तो विमानद्वारा दिव्यलोकको जाता है और गणपतिका पद प्राप्त करता है। पूर्वकालमें महामुनि मार्कण्डेयजीने जहाँ बड़ी भारी तपस्या की थी, वहाँ भगवान् शंकरका दर्शन करके मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता है और वह सब पापोंसे शुद्ध होकर दीर्घायु होता है। जहाँ हंसवाहिनी ब्रह्माणी देवी स्थित हैं, वह महास्थान अवन्ती पुरीमें बहुत उत्तम माना गया है। वे भक्तोंकी आशा पूर्ण करती तथा जैसे माता अपने पुत्रका पालन करती है, उसी प्रकार भक्तोंका पालन करती हैं। सब प्रकारकी सिद्धि देनेवाली उन हंसवाहिनी देवीका गन्ध, पुष्प और नैवेद्योंद्वारा पूजन करे। जो ब्रह्मसरोवरमें स्नान करके ब्रह्मेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो ब्रह्मलोकमें आनन्दका अनुभव करता है। जहाँ ब्रह्माजीने यज्ञ किया था, उस स्थानपर यज्ञके लिये जो कुण्ड बनाया गया था, उसका नाम यज्ञवापी है। उसमें स्नान करके पवित्र हो जो पशुपतिका दर्शन करता है, वह पशुयोनिमें पड़े हुए पितरोंका भी उद्धार कर देता है और स्वयं शिवलोकमें जाता है, जहाँ साक्षात् महेश्वर निवास करते हैं। रूपकुण्डमें स्नान करके मनुष्य रूपवान् होता है। जो अनंगकुण्डमें स्नान करके अनंग (कामदेव) द्वारा पूजित अनंगेश्वर महादेवकी पूजा करता है, वह मनोवांछित कामना प्राप्त करता है और मरनेके बाद शिवधामको जाता है। जो करीकुण्डमें नहाकर भगवान् विश्वरूपका पूजन