संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 954, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९२५ ---|---
जगत्को धारण करनेवाले वीरवर बलभद्रजी ! आप इस कालास्त्रको यमराजके ऊपर न छोड़िये। इस संसारमें आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। सम्पूर्ण विश्वका पालन करनेवाले भगवान् विष्णुको भी आप सदा अपनी गोदमें धारण करते हैं। भला आपके समान दूसरा कौन है, जो सम्पूर्ण जगत्का भार वहन करनेमें समर्थ हो। जो जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले जगदीश्वर हैं, उन एकमात्र विश्वनायक विष्णुको भी आप गोदमें लेकर लाड़-प्यार करते हैं। जगत्में आपकी स्तुति कर सकनेवाला कौन है? कौन आपके गुणोंको जान सकता है? हम तो भगवान् विष्णुकी नाभिसे प्रकट हुए एक कमलके निवासी हैं, अतः सदा आपके अंकमें ही रहते हैं। हमें आपकी महान् महिमाका ज्ञान कैसे हो सकता है?'
बलरामजीसे इस प्रकार कहकर चतुर्मुख ब्रह्माने पुनः भगवान् वासुदेवसे कहा—'कृष्ण! कृष्ण! आप इस विकराल काल (यमराज)-पर कृपा कीजिये। आप सम्पूर्ण विश्वके एकमात्र अधीश्वर साक्षात् विष्णु हैं और नरक-समुद्रसे सबका उद्धार करनेवाले हैं। जगन्नाथ! यह आपको नहीं जानता। भगवन्! आपने ही पूर्वकालमें इसे यमके पदपर स्थापित किया था। प्रभो! पापी पुरुषोंको नरकमें ले जानेके लिये ही यमराजकी नियुक्ति हुई है। अतः जगदीश्वर! पुरुषोत्तम! आप इसके अपराधको क्षमा करें। भगवन्! यमराज आपका अपराधी है। इससे आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कहिये।
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णने कहा—'पितामह! सुनिये। मेरे गुरु सान्दीपनि मुनिका पुत्र यहाँ लाया गया है। हम उसीके लिये यहाँ आये हैं। हमें अपने श्रेष्ठ गुरुको गुरु-दक्षिणा देनेके लिये वह बालक सौंप दीजिये। प्रभो! हम दोनोंने जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसका पालन करवाइये।
यह सुनकर ब्रह्माजीने युद्धमें हारे हुए यमराजको बुलाकर कहा—'ये विष्णुस्वरूप श्रीकृष्ण जो आज्ञा देते हैं उसका पालन करो। यह सुनकर धर्मराजने सान्दीपनि मुनिके पुत्रको श्रीकृष्णकी सेवामें अर्पित कर दिया। गुरुपुत्रको पाकर प्रसन्न हुए श्रीकृष्णने ब्रह्माजीसे कहा—'ब्रह्मन्! आजसे लेकर उज्जयिनीमें मेरे चरणोंसे चिह्नित जो अंकपाद नामक स्थान है, वहाँ मरे हुए मनुष्य यमराजका दर्शन नहीं करेंगे। महाकालके उत्तर भागमें पुरुषोत्तम, विश्वरूप, गोविन्द, शंखोद्धार तथा केशव—इन पाँचों विग्रहोंका जो कुशस्थलीमें दर्शन करेंगे, वे कभी नरकमें नहीं जायँगे। इसी प्रकार मेरे और बलरामजीके यहाँ आनेसे नरकोंमें पड़े हुए जीव घोर नरकसे मुक्त होकर सब-के-सब दिव्यलोकको प्राप्त होंगे।'
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर कहा—'श्रीकृष्ण! आपने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा हो। इस प्रकार बलभद्रसहित श्रीकृष्ण गुरुपुत्रको साथ लेकर श्रीब्रह्माजीसे पूछकर अपने रथपर सवार हुए और नरकमें पड़े हुए प्राणियोंके उद्धारके लिये उन्होंने पुनः शंखध्वनि की। उस शंखनादको सुनकर और श्रीकृष्णके स्मरणजनित पुण्यसे समस्त नारकी जीव दिव्य विमानोंपर चढ़कर स्वर्गलोकमें चले गये। यमराजने भी पुनः बलदेवजीसे अपना दण्ड लेकर नगरमें प्रवेश किया और ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर बलभद्रसहित श्रीकृष्ण शीघ्रगामी रथके द्वारा उज्जयिनीपुरीमें आये। वहाँ उन्होंने गुरुको उनका पुत्र समर्पित किया।
इस प्रकार वहाँ आये हुए सान्दीपनि मुनिके पुत्रको देखकर समस्त नगर-निवासियों तथा वहाँके राजाको बड़ा विस्मय हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण-बलरामको कोई श्रेष्ठ देवता मानकर उनका पूजन किया। वहाँ शंखी, विश्वरूप, माधव और चक्री—ये चार भगवान् विष्णुके क्षेत्र हैं और पाँचवाँ अंकपाद नामक क्षेत्र है। अब मैं इनकी यात्राका क्रम बतलाऊँगा। मन्दाकिनीमें स्नान करके बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। तत्पश्चात् शंखोद्धारतीर्थमें