संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जान पड़ता है इन दोनोंके रूपमें साक्षात् सूर्य और चन्द्रमा आ गये हैं। तदनन्तर वे अपने शिष्योंके साथ स्नान करनेके लिये महाकाल तीर्थमें गये। उन शिष्योंके साथ बलराम और श्रीकृष्ण भी थे। वहाँ उन दोनों भाइयोंने जब भगवान् महाकालको प्रणाम किया, तब वे साक्षात् प्रकट होकर उनसे बोले—'प्रभो! तुम सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हो। मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए तुम्हारे द्वारा साधु पुरुषों और अज्ञानी जीवोंको भी सदा सुख ही प्राप्त हुआ है तथा मनुष्योंको पीड़ा देनेवाले राजा कंस आदि बलाभिमानी दैत्योंको तुम दोनोंने मार गिराया है। अब तुम्हें मुनियों, सिद्धों और देवताओंका पालन करना चाहिये।'
'बहुत अच्छा, ऐसा ही करूँगा'—ऐसा कहकर विश्ववन्द्य भगवान् श्रीकृष्ण वहाँसे चले गये। अपना अध्ययन पूरा करके कृतकृत्य हुए श्रीकृष्ण और बलरामने सान्दीपनि मुनिसे हर्षमें भरकर कहा—'आचार्य! श्रीचरणोंकी सेवामें गुरुदक्षिणाके रूपमें हम क्या दें।' उनका यह प्रिय वचन सुनकर गुरुने प्रसन्न होकर कहा—'मेरे एक पुत्र पैदा हुआ था। उसे तीर्थयात्रामें प्रभासक्षेत्रके भीतर समुद्रके जलमें एक जल-जन्तुने मार डाला। मेरे उसी पुत्रको तुम ले आओ।'
'बहुत अच्छा' कहकर श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ चले गये। प्रभासक्षेत्रमें समुद्रने उनसे कहा—'भगवन्! मेरे जलमें पंचजन नामक एक महादैत्य रहता है। उसीने तिमिका रूप धारण करके उस बालकको खा लिया है।' तब ग्राहरूपी उस महाबली पंचजनको मारकर श्रीकृष्णने उसके उदरमें स्थित शंखको ग्रहण किया। उसके पेटमें जब बालक नहीं दिखायी दिया, तब वे वरुणलोकमें गये और वरुणदेवसे बोले—'भगवन्! मुझे एक महान् रथ दीजिये, जिसपर आरूढ़ होकर मैं प्रेतराज यमका दर्शन करूँ।' यह सुनकर वरुणजीने प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णको रथ प्रदान किया। उस रथको देखकर श्रीकृष्ण और बलराम बड़े प्रसन्न हुए और उसकी परिक्रमा करके बड़े भाईके साथ श्रीकृष्णचन्द्र उसपर आरूढ़ हुए। तदनन्तर वे यमलोकको लक्ष्य करके दक्षिण दिशाकी ओर गये। सहस्रों किरणोंसे आवृत्त यमपुरीको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने शंख हाथमें लिया और उसे खूब जोरसे बजाया। उसकी ध्वनिसे समस्त यमलोकवासी भयभीत हो गये। श्रीकृष्णके दर्शनसे नरक-यातना भोगनेवाले पापियोंको भी सुख प्राप्त हुआ और उन नरकोंमें जलती हुई आग स्वतः बुझ गयी। जगदीश्वर श्रीकृष्णके नरकोंके समीप पदार्पण करनेपर सबके पापोंका नाश हो गया। सभी पापी नरकसे छूट गये और अक्षय धामको प्राप्त हो गये। उस समय सब नरक सूने हो गये। यह देख यमराजके दूतोंने नरकोंकी ओर जानेसे उनको रोका।
दूत बोले—वीरवर! इस मार्गसे अपना रथ न लाइये; क्योंकि यहाँ परस्त्रीहरण, परधनहरण करनेवाले पापी अपने पापके फलसे यमराजकी आज्ञाके अनुसार अधोगतिको प्राप्त हुए हैं। जिन्हें करोड़ों वर्षोंमें नरकसे छूटना चाहिये, वे आपका दर्शन करके तत्काल ही स्वर्गलोकको जा पहुँचे हैं।
यमदूतोंकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णने दयासे आर्द्र होकर कहा—यमदूतो! मैं इन पापी जीवोंका उद्धार करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। मैं सबके लिये यमलोकका निवारक और स्वर्गलोकका दाता हूँ। तुम मेरी बातें यमराजसे जाकर कहो। श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर यमदूत बड़ी उतावलीके साथ यमराजके समीप गये और उनसे नारकी जीवोंके मुक्त हो जानेका सब समाचार कह सुनाया। दूतोंकी बात सुनकर यमराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने श्रीकृष्ण-बलरामके साथ घोर युद्ध किया; परंतु पग-पगपर उन्हें पराजित ही होना पड़ा। अन्ततोगत्वा यमने अमोघ अस्त्र कालदण्डका प्रहार किया। उस जलते हुए कालदण्डको आते देख बलरामजीने लीलापूर्वक पकड़ लिया और पुनः उसे यमराजपर ही चलानेका विचार किया। इतनेमें ही ब्रह्माजी उन दोनोंके बीचमें आ गये और उन्होंने श्रीकृष्णको युद्धसे रोका। तत्पश्चात् बलरामजीसे कहा—'चराचर