भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 952

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * १२३


आदि एवं प्रणाम करके उनसे क्षमा-प्रार्थना करे। | फूलोंसे अमरावती देवीका पूजन करता है, वह इस प्रकार यात्रा करके अपने घर जाय और | स्वर्गमें देवताओंके साथ सदा आनन्द भोगता वहाँ शिवभक्तिपरायण पाँच ब्राह्मणोंको भोजन | है। जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक उज्जयिनी करावे। व्यासजी! जो मनुष्य ऐसा करता है, | देवीका दर्शन करता है, वह रुद्रलोकमें सम्पूर्ण वह स्वर्गलोकमें आनन्दका भागी होता है। | ऐश्वर्योंसे सम्पन्न हो प्रतिष्ठित होता है। जो जो नियमपूर्वक कुशस्थलीकी परिक्रमा करता | भगवान् शिवमें भक्ति रखते हुए विशाला देवीका है, उसके द्वारा सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी | दर्शन करता है, वह कायिक, वाचिक और परिक्रमा हो जाती है। जो मनुष्य पद्मावतीजीका | मानसिक त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। दर्शन और कमलके पुष्पोंद्वारा उनका पूजन करता | कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवास करके तथा धूप और नैवेद्य चढ़ाता है, वह मृत्युके | जितेन्द्रिय, पवित्र एवं जितात्मा होकर किसीके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाता है। जो सुवर्णके समान | साथ भी वार्तालाप न करे—मौन रहे। इस प्रकार पीले रंगवाले पुष्पोंसे महाभक्तिपूर्वक स्वर्णशृंगाटिका | रहकर जो अक्रूरेश्वर देवका दर्शन और पूजन देवीकी पूजा करता है, वह शिवलोकको जाता | करता है, वह रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो है। जो त्रिभुवन-विख्यात अवन्ती देवीका दर्शन | स्नान करके पवित्र हो, इन्द्रियोंको वशमें रखते करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानद्वारा | हुए ब्रह्माजीका दर्शन करता है, वह घोर पातकसे इन्द्रलोकको जाता है। जो भक्तिपूर्वक कमलके | मुक्त हो ब्रह्मलोकको जाता है।

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अंकपादतीर्थकी महिमा, श्रीकृष्णके द्वारा मरे हुए गुरुपुत्रके लाये जानेकी कथा

सनत्कुमारजी कहते हैं—जहाँ भगवान् | प्रकट हुए थे। उन दोनोंका रूप दिव्य था। दोनों महाकाल हैं, शिप्रा नदी है, अत्यन्त निर्मल गति | ही बड़े तेजस्वी पुरुष थे। यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने प्राप्त होती है और जिस उज्जयिनीमें विशालाक्षी | कंस और चाणूरको मारकर उग्रसेनको यदुकुलके देवीका दर्शन प्राप्त होता है, वहाँका निवास किसको | राजपर अभिषिक्त किया और पूछा—'राजन्! अब नहीं भाता है। जो मनुष्य महानदी शिप्रा में स्नान | मेरे लिये क्या आज्ञा है?' उनके ऐसा कहनेपर करके भगवान् महाकालको नमस्कार करता है, वह | राजा उग्रसेन बोले—'कृष्ण! मेरा सब कार्य सिद्ध मृत्युका शोक नहीं करता। महाकाल क्षेत्रमें मरा | है, तुम्हारे रहते मेरे लिये कोई भी वस्तु दुर्लभ हुआ कीट और पतंग भी भगवान् शिवका सेवक | नहीं है। अब तुम दोनों उज्जयिनी पुरीमें जाकर होता है। अवन्तीमें अंकपाद नामक तीर्थके भीतर | विद्या पढ़ो।' राजाका यह आदेश पाकर बलराम श्रीबलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करे। उन दोनोंके | और श्रीकृष्ण आचार्य सान्दीपनि मुनिके घर गये। दर्शनमात्रसे मनुष्य यमलोकको नहीं देखता। | वहाँ जाकर उन्होंने चारों वेदोंको कण्ठस्थ किया, व्यासजीने पूछा—महामुने! वे दोनों बलराम | सम्पूर्ण आचार-विचारका ज्ञान प्राप्त किया और और श्रीकृष्ण अंकपाद नामक तीर्थमें कैसे गये? | रहस्य तथा संहारसहित धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त सनत्कुमारजीने कहा—मुने! बलराम और | की। यह सारा ज्ञान उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही श्रीकृष्ण—ये दोनों भाई भगवान्‌के अवतार थे | प्राप्त कर लिया। सान्दीपनि मुनिने उन दोनोंका और इस पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यदुकुलमें | यह असम्भव एवं अलौकिक कर्म देखकर सोचा,