संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वल्मीक (बाँबी) में बैठे रहे हो, अतः इस पृथ्वीपर तुम्हारा नाम 'वाल्मीकि' होगा। यों कहकर वे तपस्वी मुनि अपनी गन्तव्य दिशाकी ओर चल दिये। उनके चले जानेपर तपस्वीजनोंमें श्रेष्ठ वाल्मीकिने कुशस्थलीमें आकर महादेवजीकी आराधना की और उनसे कवित्वशक्ति पाकर एक मनोरम काव्यकी रचना की, जिसे 'रामायण' कहते हैं और जो कथा-साहित्यमें सबसे प्रथम माना गया है।
व्यासजी! तभीसे अवन्तीमें वाल्मीकेश्वर शिवकी ख्याति हुई, जो मनुष्योंको कवित्वशक्ति देनेवाले हैं।
शुक्रेश्वर आदिके पूजनकी महिमा, पंचेशानी यात्राका माहात्म्य तथा पद्मावती आदिके दर्शनका फल
सनत्कुमारजी कहते हैं—श्वेत पुष्प और चन्दनसे शुक्रेश्वरकी पूजा करके उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। व्यासजी! भीमेश्वरका दर्शन और भक्तिसे उनका पूजन करके मनुष्य युद्धमें, रात्रिमें, जलमें और अग्निमें कहीं भी भयको प्राप्त नहीं होता। जो मनुष्य तिलके तेलसे गर्गेश्वरको स्नान कराकर बिल्वपत्रसे उनका पूजन करता है, उसके धर्मकी वृद्धि होती है। जो चतुर्दशीको उपवास करके एक प्रस्थ तिलके जलसे गर्गेश्वरको नहलाकर तिलोंसे ही उनकी पूजा करता है, वह सदा सौख्यका भागी होता है। कामेश्वरका कुंकुम, चन्दन आदिसे भलीभाँति पूजन करके मनुष्य इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा निःसन्देह स्वर्गलोकको जाता है। कार्तिक शुक्लपक्षकी नवमी तिथिमें चूडामणि देवको नमस्कार करके मनुष्य कभी विपरीत योनिमें नहीं जाता और उसकी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहती है। कृष्णपक्षकी अष्टमीको उपवास करके जो मनुष्य चण्डेश्वरजीकी पूजा करता है, वह निर्माल्य-लंघनजनित पाप-तापसे कभी लिप्त नहीं होता। महादेवजीके इन सब पवित्र तीर्थोंकी यात्रा करके विशुद्ध चित्तवाला मनुष्य सदाशिवके मनोहर धामको प्राप्त होता है।
जो मानव इस महाकाल-क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंद्वारा रुद्रलोकको जाते हैं। कृष्णपक्षकी चतुर्दशी अथवा अमावास्याको एक दिन उपवास करके जो मनुष्य महेश्वरके ध्यानपूर्वक प्रतिलोम और अनुलोम-क्रमसे पंचेशानी यात्रा करते हुए पाँचों ईशान-विग्रहोंको नमस्कार करता है, वह बहुत जन्मोंके किये हुए समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है और वह इसी शरीरसे रुद्रलोकको जाता है।
पंचेशानी यात्रा इस प्रकार की जाती है—एकादशीको प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो रुद्रसरोवरमें स्नान करे। तत्पश्चात् श्राद्ध करके महाकालेश्वरको प्रणाम करे। फिर पिंगलेश्वरके समीप जाकर वहाँ स्नान और श्राद्ध करे। तदनन्तर पिंगलेश्वर गणेशजीके समीप जाकर गन्ध, पुष्प और धूप आदिसे उनका पूजन करे। वहाँसे लौटकर फिर महाकालेश्वरके समीप आकर स्नान करे। स्नानके पश्चात् जितेन्द्रिय पुरुष स्वयं प्रकट हुए सनातन देवदेवेश्वर महाकालका पूजन करे। वहीं ईशानके समीप रात्रिमें भोजन करके महेश्वरका ध्यान करते हुए भूमिपर शयन करे। इस प्रकार रात्रि बितानेके अनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल उठकर स्नानके पश्चात् पूर्ववत् सब कुछ करे। कायावरोहणतीर्थमें जाकर पिंगलेश्वरकी ही भाँति पूजा करे। इसी प्रकार त्रयोदशीको भी यात्रा करके पश्चिममें बिल्वेश्वरका पूजन करे। चतुर्दशीको उत्तर दिशामें उत्तरेश्वरका पूजन करे। फिर अमावास्यामें स्नान करके पवित्र हो महाकालेश्वरके समीप जाकर गन्ध, पुष्प, धूप और भाँति-भाँतिके नैवेद्योंद्वारा उनका पूजन करे। गीत, नृत्य