संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 964, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३५
बतायी और प्रार्थना की—'भगवन्! मुझे अन्धकासुरसे अभय दीजिये।'
इन्द्रका ऐसा वचन सुनकर शरणागतवत्सल शिवने अभय देते हुए कहा—'इन्द्र! तुम अन्धकासुरसे भय न करो।' इस प्रकार सान्त्वना देकर भगवान् शिवने महाभयानक रौद्र रूप धारण किया और वे एक चरणसे पृथ्वीपर उतरे। जहाँ उनका पैर पड़ा, उसी स्थानपर सर्वदेववन्दित एक कुण्ड प्रकट हो गया। भगवान् शिवने वहाँ पैर रखा था, इसलिये उस कुण्डका नाम 'शिवपद' प्रसिद्ध हो गया। सर्वप्रथम श्रीशंकरके चरणांगुष्ठकी कोटि (कोना) वहाँ पड़ी थी, इसलिये वह तीर्थ सर्वपापनाशक कोटितीर्थके नामसे भी विख्यात हुआ। वहीं भगवान् अगस्त्यने करोड़ों तीर्थोंका स्थापन किया था, इस कारणसे भी लोकमें उसका 'कोटितीर्थ' नाम पड़ गया। उस तीर्थका दर्शन करके सब देवताओंने अपने हितकी इच्छासे उसमें स्नान किया। महाकालमय स्वरूप धारण करके भगवान् शिवका वहाँ आगमन हुआ था, इसीलिये वे उस तीर्थमें महाकालके नामसे प्रसिद्ध हुए हैं।
दानव अन्धकासुरने जब इन्द्रके द्वारा अपने पुत्रके मारे जानेका समाचार सुना, तब महान् क्रोधमें भरकर उसने रणके बाजे बजवाये और सेनासहित उस स्थानपर आया, जहाँ सब देवता मौजूद थे। रथ, हाथी आदिसे युक्त विशाल सेनाके साथ महायुद्धके लिये उद्यत हुए दानवोंको आते देख देवतालोग भगवान् शिवकी शरणमें गये। तब वे त्रिनेत्रधारी भगवान् महाकाल 'देवताओ! निर्भय रहो।' ऐसा कहकर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े हो गये। दैत्योंपर भगवान् रुद्रका कोप होते ही सारा आकाश-मण्डल प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाओंसे व्याप्त हो गया। अन्धकासुरने क्रोधमें भरकर देवताओंके विनाशके लिये करोड़ों दुःसह बाणोंकी झड़ी लगा दी। पिनाकधारी महाकालने आगकी चिनगारियों और ज्वालाओंको छोड़ते हुए उस दानवके अस्त्र-शस्त्रोंके सैकड़ों टुकड़े कर दिये। साथ ही अन्धकासुरको भी अनेक बाणोंसे घायल किया। जैसे भ्रमर कमलके फूलपर छा जाते हैं, उसी प्रकार भगवान् शंकरके बाणोंने अन्धकको सब ओरसे आच्छादित कर दिया। अन्धकासुर युद्धमें स्थित होनेपर भी अत्यन्त शिथिल हो गया, उसके अस्त्र-शस्त्र भी शिथिल हो गये। भगवान् शिवके गण भी बड़े भारी योद्धा थे, साथ ही उन्हें भगवान् शंकरका सामीप्य भी प्राप्त था; इसलिये उन्होंने युद्धमें उत्साहपूर्वक लड़कर अन्धकासुरकी सेनाको मार डाला।
अपनी सेनाको देवताओंद्वारा छिन्न-भिन्न की हुई देख और अपनेको भी महेश्वरके बाणोंसे क्षत-विक्षत हुआ पाकर अन्धकासुर विकल शरीरसे भयभीत हो उठा। तब उसने तामसी माया फैलायी। उस मायासे उसका शरीर अदृश्य हो गया और वह उत्तर दिशाकी ओर चल दिया। अन्धकासुर जिस-जिस मार्गसे गया, उसी-उसीसे शंकरजीने भी उसका पीछा किया। एक स्थानपर पहुँचकर अन्धकासुर बोला। फिर भगवान् शिव भी उसी प्रकार बोले। तबसे वहाँ वागन्धक नामसे विख्यात तीर्थ प्रकट हो गया। अगहन सुदी नवमीको वहाँ स्नान करके पवित्र हो जो श्रद्धापूर्वक शक्करसहित अन्नदान करता है, उसका वह सब पुण्य अक्षय होता है तथा दाता शिवलोकमें जाता है।
इसी समय अपने तेजसे दिशाओंके अन्धकारको दूर करते हुए (अर्जुनद्वारा स्थापित) भगवान् नरादित्य मनुष्यका रूप धारण करके उठे। उनके द्वारा अन्धकार नष्ट होनेपर प्रकाशमें जब वह दैत्य स्पष्ट दिखायी देने लगा, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने नाना प्रकारकी स्तुतियोंद्वारा नररूपधारी सूर्यनारायणका स्तवन किया और उनका नाम 'नरदीप' रख दिया। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक नरदीप नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्यका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य षष्ठी या सप्तमी तिथिको रविवारके दिन उपवास करके दिनक्षय, संक्रान्ति, ग्रहण तथा विषुवयोगपर कुण्डमें स्नान करके पवित्र हो मनको संयममें रखता और जप करते हुए स्तुति,