भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 963
९३४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हुआ मनुष्य सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

सनत्कुमारजी कहते हैं—असुरोंके स्वामी तारकका वध करके महाबलवान् स्वामिकार्तिकेयजीने अपनी शक्तिको शिप्रा नदीके जलमें फेंक दिया। उस शक्तिने पातालतककी भूमिको विदीर्ण कर डाला। उसी मार्गसे भगवती गंगा ऊपर निकल आयीं, जो समस्त तपस्वी मुनियों और देवताओंके द्वारा वन्दनीय हैं। कोटितीर्थ तीनों लोकोंमें पवित्र कहा गया है, वहाँ ब्रह्माजीने कोटितीर्थेश्वर शिवकी स्थापना की है। कोटितीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् कोटिश्वर शिवका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुने! जो वहाँ श्राद्ध करता है, उसे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो पूर्णिमा तथा अमावास्याको शस्त्रधारी कार्तिकेयका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंतक पुत्रहीन, निर्धन तथा रोगी नहीं होता। जो मनुष्य उस तीर्थके उत्तम जलमें प्रवेश करता है, वह दिव्य लोकमें तबतक अक्षय सुखका उपभोग करता है, जबतक कि सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता बनी रहती है।


स्वर्णक्षुर आदिकी महिमा, अन्धकासुरका युद्ध, नरदीप एवं शंखोद्धार आदिका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—जो मनुष्य स्वर्णक्षुर नामक तीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करता है, उसे सौ कपिलादानसे भी अधिक फल प्राप्त होता है। जो जितेन्द्रिय पुरुष ब्रह्माजीकी वापी (बावली या कुण्ड)-में स्नान करता है, वह हंसयुक्त विमानद्वारा ब्रह्मलोकको जाता है। जो मनुष्य चैत्र या फाल्गुनमासमें विष्णुवापीमें स्नान करके जितेन्द्रिय हो उपवासपूर्वक रात्रिमें जागरण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। जो मनको संयममें रखकर भक्तिपूर्वक अभयेश्वर देवके पट्टबन्धका दर्शन करता है, वह रुद्रलोकको जाता है। मुने! जो मनुष्य एकचित्त होकर अगस्त्येश्वरके समीप जाता है और अगस्त्योदयके समय उनका दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

काशपुष्पप्रतीकाश वह्निमारुतसंभव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥

‘काश-पुष्पके समान गौरवर्ण, अग्नि और वायु (अग्नीषोम)-से प्रकट मित्रावरुण-पुत्र कुम्भयोने! आपको नमस्कार है।’

इस मन्त्रसे अगस्त्यजीको अर्घ्य देनेवाला मानव पुत्रवान् और धनवान् होता है। मृत्युके पश्चात् वह स्वर्गलोकमें जाता है और स्वर्गभोगके अनन्तर पुनः इस मर्त्यलोकमें आकर पवित्र धनवानोंके घरमें जन्म लेता है अथवा महान् योगीश्वर होता है।

व्यास ! उत्तम पुण्य प्रदान करनेवाली दिव्य पुरी उज्जयिनी प्रथम कल्पमें स्वर्णशृंगा कहलाती है, दूसरेमें इसका नाम कुशस्थली होता है। तीसरेमें इसे अवन्तिका कहते हैं। चतुर्थ कल्पमें इसका नाम अमरावती होता है। पंचम कल्पमें चूडामणि, छठेमें पद्मावती और सातवेंमें इसका नाम उज्जयिनी जानना चाहिये।

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इन नामोंका पाठ करता है, वह निःसन्देह सात जन्मोंके पापसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन कालकी बात है। उज्जयिनीपुरीमें अन्धक नामसे प्रसिद्ध दैत्य राज्य करता था। उसके महापराक्रमी पुत्रका नाम कनकदानव था। एक बार उस महाशक्तिशाली वीरने युद्धके लिये इन्द्रको ललकारा, तब इन्द्रने क्रोधपूर्वक उसके साथ युद्ध करके उसे मार गिराया। उस दानवको मारकर वे अन्धकासुरके भयसे भगवान् शंकरको ढूँढ़ते हुए कैलास पर्वतपर चले गये। वहाँ देवताओंके स्वामी इन्द्रने भगवान् चन्द्रशेखरका दर्शन करके अपनी अवस्था उन्हें