भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 962

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३३


हेतु हैं, उन ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप भगवान् सूर्यको नमस्कार है।

सूर्यदेव बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले अर्जुन! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे इस समय सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, उसकी पूर्तिके लिये यत्नपूर्वक वर दूँगा।

अर्जुनने कहा—प्रभो! मेरे लिये यही सबसे उत्तम वर है कि आप इस विग्रहमें सदा स्थित रहें। जो मनुष्य आपको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करें, उनको आप मनोवांछित वस्तु प्रदान करें।

सूर्यदेवने कहा—अर्जुन! जो भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करके इस स्तोत्रद्वारा मेरी स्तुति करेंगे, उनके पास कभी धन-सम्पत्तिकी कमी नहीं होगी।


भगवान् सूर्यकी अष्टोत्तरशतनामोंद्वारा स्तुति तथा अन्यान्य तीर्थोंकी महिमा

सनत्कुमारजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्णने भी शंख बजाकर सूर्यदेवकी भलीभाँति स्थापना करके एकाग्रचित्त हो इस प्रकार स्तवन किया—
(१) आदित्य, (२) भास्कर, (३) भानु, (४) रवि, (५) सूर्य, (६) दिवाकर, (७) प्रभाकर, (८) दिवानांथ, (९) तपन, (१०) तपनेवालोंमें श्रेष्ठ, (११) वरेण्य, (१२) वरद, (१३) विष्णु, (१४) अनघ, (१५) वासवानुज (इन्द्रके छोटे भाई), (१६) बल, (१७) वीर्य, (१८) सहस्रांशु, (१९) सहस्रकिरणद्युति, (२०) मयूखमाली, (२१) विश्व, (२२) मार्तण्ड, (२३) चण्डकिरण, (२४) सदागति, (२५) भास्वान्, (२६) सप्ताश्व, (२७) सुखोदय, (२८) देवदेव, (२९) अहिर्बुध्न्य, (३०) घामनिधि, (३१) अनुत्तम, (३२) तप, (३३) ब्रह्ममयालोक, (३४) लोकपाल, (३५) अपाम्पति, (३६) जगत्प्रबोधक, (३७) देव, (३८) जगद्दीप, (३९) जगत्प्रभु, (४०) अर्क, (४१) निःश्रेयसपर, (४२) कारण, (४३) श्रेयसापर, (४४) इन, (४५) प्रभावी, (४६) पुण्य, (४७) पतंग, (४८) पतंगेश्वर, (४९) मनोवांछितदाता, (५०) दृष्टफलप्रद, (५१) अदृष्टफलप्रद, (५२) ग्रह, (५३) ग्रहकर, (५४) हंस, (५५) हरिदश्व, (५६) हुताशन, (५७) मंगल्य, (५८) मंगल, (५९) मेध्य, (६०) ध्रुव, (६१) धर्मप्रबोधन, (६२) भव, (६३) सम्भावित, (६४) भाव, (६५) भूतभव्य, (६६) भवात्मक, (६७) दुर्गम, (६८) दुर्गतिहर, (६९) हरनेत्र, (७०) त्रयीमय, (७१) त्रैलोक्य-तिलक, (७२) तीर्थ, (७३) तरणि, (७४) सर्वतो-मुख, (७५) तेजोराशि, (७६) सुनिर्वाण, (७७) विश्वेश, (७८) शाश्वत, (७९) घाम, (८०) कल्प, (८१) कल्पानल, (८२) काल, (८३) कालचक्र, (८४) क्रतुप्रिय, (८५) भूषण, (८६) मरुत, (८७) सूर्य, (८८) मणिरत्न, (८९) सुलोचन, (९०) त्वष्टा, (९१) विष्टर, (९२) विश्व, (९३) सत्कर्मसाक्षी, (९४) असत्कर्म-साक्षी, (९५) सविता, (९६) सहस्राक्ष, (९७) प्रजापाल, (९८) अधोक्षज, (९९) ब्रह्मा, (१००) वासरारम्भ, (१०१) रक्तवर्ण, (१०२) महाद्युति, (१०३) शुक्ल, (१०४) मध्यन्दिन, (१०५) रुद्र, (१०६) श्याम, (१०७) विष्णु और (१०८) दिनान्त नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्यको प्रणाम करता हूँ।

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा कहे हुए इन एक सौ आठ दिव्य नामोंको जो मनुष्य पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसे कभी विपत्तियाँ नहीं प्राप्त होतीं तथा सर्वत्र शुभकी प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं; उसे धन, धान्य, सुख, पुत्र, तेज, प्रज्ञा, परम ज्ञान, विशुद्ध बुद्धि एवं परम पदकी प्राप्ति भी होती है।

इस प्रकार स्तुति सुनकर जगदीश्वर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। केशवादित्यके मुखारविन्दका