संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भी कार्य जो फलद नहीं होते, उसमें निश्चय ही आपके प्रति उनकी भक्तिका न होना ही कारण है। शरणागतवत्सल! युद्धभूमिमें मनुष्य रथ, हाथी, भाला, शक्ति, नाराच, चक्र, बाण, तोमर तथा भयंकर खड्गोंद्वारा जो शीघ्र ही शत्रुओंको परास्त करके विजयी होकर लौटते हैं, वह सब आपकी ही दी हुई शक्तिका प्रभाव है। भयानक स्थानों, दुर्गम और ऊँची-नीची भूमियोंमें तथा रीछ, हाथी, सिंह, बहुत-से कण्टक तथा चोरोंके बीचमें पड़े हुए संकटग्रस्त एवं अतिशय शोकसे मोहित चित्तवाले मानव भी आपके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे मृत्युके भयसे छूट जाते हैं। तेजोराशे! सूर्य! इस संसारमें जो सब ओरसे दुःखी हैं, उन्हें आप ही शरण देनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत्में आपके समान दयालु दूसरा कोई नहीं है। एकमात्र आपमें ही की हुई भक्ति पूर्णतः सफल होती है। आपकी शरणमें आ जानेपर मनुष्योंको रोग, व्याधिका कष्ट कैसे हो सकता है? देव! आप देखा करते हैं कि कौन कुष्ठरोगसे पीड़ित है, किसे शत्रु और रोग आदि सता रहे हैं, कौन पंगु, अन्ध और जड़ है, किनके पैर गल गये हैं और कौन निर्धन तथा निष्क्रिय हो गया है। इस प्रकार निरीक्षण करके आप कृपापूर्वक प्राणियोंकी उन-उन दोषोंसे रक्षा करते हैं। आपकी जैसी परोपकारपूर्ण चेष्टा देखी जाती है, वैसी और किसमें है? धर्म सेवित होनेपर परलोकमें फल देनेके लिये उपस्थित होता है। देवता उपासना करनेपर कालान्तरमें वरदान देते हैं। परंतु प्रणतवत्सल! आप कल्याणकामी पुरुषोंद्वारा सेवित होनेपर तत्काल ही उन्हें अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। यदि मनुष्योंने एक बार भी किसी प्रकार आपको मस्तक झुकाया है अथवा भुवनेश्वर! अन्तकालमें भी जिसने आपका चिन्तन किया है, वे संसारमें पापी होनेपर भी निष्पाप हो गये हैं और उन्होंने शुद्धचित्त होकर पुण्यात्माओंकी गति प्राप्त कर ली है। सुरश्रेष्ठ! जब आप उदय लेने लगते हैं, उस समय देवनदी गंगाके खिले हुए स्वर्णकमलोंसे निकले हुए झुंड-के-झुंड भ्रमर उनकी स्वर्णमयी धूलिसे अनुरंजित होकर उड़ते हैं। भगवन्! आप अपने किरणसमूहरूपी चरणोंके द्वारा समुद्रके मध्यमें स्थित होकर समस्त जीवोंके जीवनकी रक्षाके उद्देश्यसे तात्त्विक उपायका चिन्तन करनेके लिये मानो तपस्या करते हैं। तीनों लोकोंमें आपके समान दूसरा कौन है? सदा वेदके मार्गमें तत्पर रहनेवाले उदारबुद्धि ऋषि-मुनियोंद्वारा भी आपके गुणोंकी स्तुति नहीं की जा सकती। आप ही विष्णु हैं, आप ही चन्द्रमा हैं, आप ही दैत्योंका मान मर्दन करनेवाले स्वामिकार्तिकेय हैं। आप ही धनाध्यक्ष कुबेर हैं, आप ही काल हैं। आप ही ब्रह्मा हैं और आप ही पर्वत, मिट्टी, जलके आश्रय तथा अग्नि हैं। आप ही ब्राह्मणोंके जपनेयोग्य ॐकार हैं। आप ही वहाँ समुद्र हैं। आप ही यम, रुद्र, इन्द्र और मेघ हैं। आप ही व्रत, यम तथा नियम हैं और आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। त्रिपुरमथन! गोपते! सुराधीश! भगवन्! आपका मुख कमलके समान सुन्दर है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं, तीनों लोकोंमें आपके समान गुणवान् कौन है? आदित्य! भास्कर! दिवाकर! सप्ताश्ववाहन! मार्तण्ड! सूर्य! हरिदश्व! पतंग! भानो! अश्रान्तवाहन! आकाशस्वरूप! अंशुमालिन्! लोकनाथ! यह दास आपकी शरणमें आया है। जगत्प्रदीप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ब्रह्मण्य! सत्य! शुभ! मंगल! लोकनाथ! आकाशकमल! ईश! मुनिसंस्तुत! विश्वमूर्ते! आर्तजनोंका शोक नाश करनेवाले! सेवकोंका पालन करनेवाले! भगवन्! आप अपनी शरणमें आये हुए मुझपर प्रसन्न होइये। देव! आज मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे हुए दोनों हाथोंसे नमस्कारपूर्वक बड़े भक्ति-भावसे आपका स्तवन किया है, इसलिये प्रभो! आप मेरे ऊपर सौम्य रूप हो जाइये और मेरी बुद्धिको धर्ममें लगाइये। जो सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, वेदत्रयीमय हैं अथवा त्रिभुवनस्वरूप हैं, त्रिगुणात्मक शरीर धारण करनेवाले हैं और समस्त विश्वकी उत्पत्ति, पालन तथा संहारके