संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 960, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३१
दे दीं और उन्हें अपने पुत्रके साथ मर्त्यलोकको भेज दिया। देवर्षि नारदजी भगवान् श्रीकृष्णको बुलानेके लिये द्वारकामें गये और वहाँ इन्द्रका रहस्ययुक्त वचन सुनाकर कहा—'श्रीकृष्ण! आप कुशस्थलीको चलिये और विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई पारिजात-निर्मित युगल प्रतिमाओंका पूजन कीजिये। इन्द्रने वे दोनों प्रतिमाएँ आप तथा अर्जुनके लिये भेंट की हैं।'
नारदजीका यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण उज्जयिनी पुरीको गये और वहाँ पाण्डुनन्दन अर्जुनको हृदयसे लगाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् उन्होंने अर्जुनसे कहा—'पार्थ! आज मुझे अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई है, तुम पूर्व दिशाकी ओर जाकर एक प्रतिमाकी स्थापना करो। दिनके पूर्वाह्नकालमें ही अति मनोरम शुभलग्नका उदय होगा। तब मैं भी प्रतिमा-स्थापनके लिये नदीके उत्तर तटको जाऊँगा। जब मेरा शंख बजे, उसी समय तुम सूर्यदेवकी स्थापना करो।'
यह आदेश पाकर अर्जुनने पूर्वदिशाकी ओर जा प्रतिमा-स्थापनाके योग्य शुभ स्थानका निरीक्षण किया। वे मन-ही-मन यह विचार करने लगे कि 'इस देवप्रतिमाका स्थापन कहाँ करूँ।' इतनेमें ही उस प्रतिमाने स्वयं ही कारणसहित उत्तम स्थान बता दिया और अपने तेजसे वह स्थान पार्थको दिखला भी दिया।
अर्जुन बोले—देव! यहाँ अनेक स्थान हैं, बताइये, कौन आपको अधिक पसंद है। गोपते! आप प्रजाजनोंके लिये सौम्य रूप और उत्तम दर्शनीय हो जाइये।
तब सूर्यदेवने अर्जुनसे कहा—पार्थ! तुम मेरे दर्शनसे भय न करो। ऐसा कहकर दाहिने हाथसे अभय प्रदान करते हुए उन्होंने आश्वासन दिया और सौम्य रूप धारण कर लिया। भगवान् प्रभाकरने उस समय अर्जुनको अपने तेजोमय स्वरूपका दर्शन कराया और कहा—'यही मेरा अविचल स्थान है।' इतनेमें ही लग्न आ गया और भगवान् श्रीकृष्णने अपने महान् शंखको बजाया। वह शंखनाद सुनकर नरावतार अर्जुनने देववन्दित सूर्यविग्रहको स्थापित कर दिया और इस प्रकार स्तवन किया।
अर्जुन बोले—किरणोंकी मालासे मण्डित, अत्यन्त प्रकाशमान एवं सात घोड़ोंके रथपर चलनेवाले उन भगवान् सूर्यकी जय हो, जिनका तेज समस्त भुवनोंमें व्याप्त है, जो पूर्व दिशाके अट्टहासकी-सी छवि धारण करते हैं तथा जिनके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे प्रचुर पाप-तापमय दोषोंसे ग्रस्त हुए मनुष्योंके अंग निष्पाप हो जाते हैं। उत्तम बुद्धिवाले प्रभो! ब्रह्मा आदि देवता और मुनि जिनकी स्तुति करते हैं, उन्हीं भगवान् पतंग (सूर्य)-की मैं अपनी बुद्धिद्वारा भलीभाँति विचार करके स्पष्ट अर्थ एवं मधुर अक्षरोंके योगसे युक्त विचित्र पद्योंद्वारा स्तुति करूँगा। नाथ! लाल कमलके समान निर्मल मण्डलवाले आप जबतक अपनी किरणोंसे अन्धकारका नाश करते हुए उदय नहीं होते, तबतक सम्पूर्ण जगत् निश्चल-सा ही (जड़वत्) प्रतीत होता है तथा तबतक नाना प्रकारकी क्रियाएँ भी सिद्ध नहीं होतीं। भगवन्! जबतक आप अपनी परम उत्तम प्रभासे वृक्षोंके सोये हुए पुष्प-गुच्छोंको विकसित (जाग्रत्) नहीं कर देते, तबतक उनके नेत्र बंद होनेके कारण वृक्षोंकी शाखाएँ शोभा नहीं पातीं और न उनपर भ्रमर ही मड़राते हैं। जिस समय आप आकाशमें उदित होते हैं, उस समय समस्त देवताओं और सिद्धोंके समुदाय, ब्रह्मा आदि देवेश्वर, दैत्य, मुनि, किन्नर, नाग, यक्ष तथा ज्ञानी देवगण अपने झुके हुए मस्तकोंद्वारा तथा चमकती हुई मुकुटमणियोंकी उत्तम प्रभाओंसे आपकी अर्चना करते हैं। सदा सबको वर देनेवाले भगवन्! आपके अस्त होनेपर सम्पूर्ण जगत् सो जाता है और आपके तपनेपर पुनः जाग्रत् हो उठता है, इस प्रकार एकमात्र आप ही समस्त विश्वका हित करनेके लिये अन्धकारका नाश करनेवाले हैं। नाथ! उत्साह, शक्ति, नीति और शौर्य आदिसे सम्पन्न तथा सेवा-प्रयोग एवं निर्माणक्रियामें तत्पर पुरुषोंके