संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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लेते। गंगातीर्थमें ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको स्नान करनेका विशेष फल बताया जाता है। जो मनुष्य गंगातीर्थमें स्नान करके पुष्करण्डकका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकमें सुखी होता है। उत्तरेश्वरतीर्थमें स्नान करके मानव शीघ्र ही अपने पितरोंका नरकसे उद्धार कर देता है और स्वयं भी स्वर्गलोकमें जाता है। भूतेश्वरमें स्नान करके मनुष्य भूतेश्वरजीका गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे पूजन करे। इससे मृत्युके पश्चात् वह स्वर्गलोकको जाता है। जो मनुष्य मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर एकाग्रचित्त हो अम्बालिका देवीका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो गन्ध और पुष्पद्वारा देवेश्वर शिवका अर्चन करता है, उसे शिवलोकमें निवास प्राप्त होता है। जो मनुष्य पवित्र हो भगवान् पुण्येश्वरका दर्शन करता है, वह गणपतिपदको प्राप्त होता है। जो लुम्पेश्वरतीर्थमें स्नान करके भगवान् महेश्वरकी भलीभाँति पूजा करता है, वह नरकमें नहीं जाता, स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जो स्थविरविनायक तीर्थमें स्नान करके गन्ध, पुष्प, धूप और भक्ष्य, भोज्य आदि सामग्रियोंसे गणेशजीकी पूजा करता है, वह मृत्युके पश्चात् शिवलोकमें जाता है। जो विद्वान् मानव नवनदीके समीप गन्ध, पुष्प, धूप आदिके द्वारा पार्वतीजीका पूजन करता है, वह अनुपम सौभाग्यका भागी होता है। प्रयागतीर्थमें स्नान करके जो प्रयागेश्वरका दर्शन करता है, वह सब लोकोंको लाँघकर भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है।
पूर्वकालमें भगवान् नर और नारायणने इस पृथ्वीपर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रूपमें अवतार लिया था। श्रीकृष्णके अवतारका उद्देश्य कुछ और था और अर्जुन किसी अन्य हेतुसे ही प्रकट हुए थे। श्रीकृष्णने कंस आदि समस्त दानवोंका युद्धमें संहार कर डाला। तदनन्तर कुन्तीपुत्र अर्जुन इन्द्रसे अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये स्वर्गलोकमें गये। वहाँ अस्त्रविद्या प्राप्त कर लेनेपर वीरवर अर्जुनने देवराज इन्द्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये कहा। तब देवराज इन्द्रने कहा—‘अर्जुन! हिरण्यपुरमें निवास करनेवाले जो निवातकवच नामक उग्र दानव हैं, उनका शीघ्र वध करो, यही मेरे लिये गुरुदक्षिणा होगी।’ तब अर्जुनने उन दुष्ट दानवोंके वधकी प्रतिज्ञा की और एक भयंकर रथपर आरूढ़ हो धनुष-बाण लेकर युद्धके लिये प्रस्थान किया। उन समस्त दानवोंका संहार करके पार्थने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम दिखाया और सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न किया। उस समय कृतकार्य हुए अर्जुनसे इन्द्रने कहा—‘वीर! तुम कोई उत्तम वर माँगो।’ तब अर्जुनने उन दो प्रतिमाओंको माँगा, जिनकी पूजा साक्षात् ब्रह्माजीने की थी।
यह सुनकर इन्द्र बोले—अर्जुन! इन दोनों प्रतिमाओंका महात्मा शंकरने लाल कमलके फूलोंद्वारा ब्रह्माके एक दिनतक पूजन किया है। इसी प्रकार पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने तीनों लोकोंका पालन करनेके लिये सुगन्धित नीलकमलके फूलोंसे सहस्रों वर्षोंतक इनकी पूजा की है। प्रजापति ब्रह्माजीने भी सृष्टि-रचनाकी कामना लेकर एकाग्रचित्त हो लाल कमलके फूलोंसे इन युगल प्रतिमाओंका पूजन किया है। कुन्तीनन्दन! तुम इन्हें मृत्युलोकमें कैसे ले जाओगे। इन प्रतिमाओंके बिना तो यह स्वर्गलोक तिनकेके तुल्य हो जायगा।
अर्जुनने कहा—प्रभो! मैं तो इसी वरदानका अभिलाषी हूँ, मुझे दूसरी कोई वस्तु नहीं चाहिये।
तब इन्द्रने कहा—वीर! तुम इन प्रतिमाओंको लेकर कुशस्थली (उज्जयिनी पुरी)-में स्थापित करो। शिप्राके उत्तर तटपर भगवान् केशव समस्त पापोंका नाश करनेवाले केशवार्की स्थापना करेंगे। सदा आषाढ़ और कार्तिकमासमें वहाँकी यात्रा होगी, मैं भी उस समय दर्शन करनेके लिये आऊँगा। मेरे साथ पवन, मेघ और बिजलियाँ भी होंगी। इन्हीं लक्षणोंसे मनुष्य कहेंगे कि ‘देवराज इन्द्र आ गये।’ मैं ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा पूजित भगवान् सूर्यको नमस्कार करके पुनः लौट आऊँगा।
ऐसा कहकर इन्द्रने अर्जुनको वे दोनों प्रतिमाएँ