संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वाद्य और मंगलगीतके साथ भगवान् नरदीपका दर्शन करता है तथा पूजन और साष्टांग प्रणाम करके प्रातःकाल, मध्याह्न एवं अपराह्नमें सूर्यदेवकी परिक्रमा करता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और अन्तमें सूर्यलोकको जाता है। पूर्वकालमें नरावतार अर्जुनने इन्द्रसे सूर्य-प्रतिमाको प्राप्त करके उसे प्रसन्नतापूर्वक इस तीर्थमें स्थापित किया है, इस कारणसे ये भगवान् सूर्य नरदीप कहे गये हैं।
ज्येष्ठ व्यतीत होनेपर भगवान् सूर्यको रथपर विराजमान करके श्रेष्ठ द्विज अपनी भुजाएँ लगाकर उस रथको कुशस्थलीमें पहुँचाते हैं। उस समय उत्तर दिशाको आते हुए भगवान् सूर्यका जो दर्शन करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञका पूरा फल प्राप्त होता है। जो केशवादित्यके स्थानसे लौटे हुए रथका दर्शन करता है अथवा रस्सी पकड़कर स्वयं भी उस रथको खींचता है, वह अपने कुलका एवं पिता-पितामह आदि पितरोंका उद्धार कर देता है। जो दक्षिण दिशामें नरदीप देवका संयमपूर्वक दर्शन करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रीसूर्यदेवकी परिक्रमा करते हैं, उनके द्वारा सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी प्रदक्षिणा हो जाती है। प्रातःकाल उठकर मौन हो भक्तिभावसे भगवान् सूर्यके समीप जाय; पूर्वद्वारसे दर्शन और नमस्कार कर, दक्षिणद्वारसे प्रवेश करके रथचक्रकी पूजा करे। तदनन्तर उसी द्वारसे निकलकर प्रणामपूर्वक आगे जाय और पश्चिम द्वारका आश्रय ले रथमें स्थित हुए सूर्यदेवका अर्चन करे। जो मनुष्य इस प्रकार नरदीपजीकी रथ-यात्रा करता है, वह अपनी रुचिके अनुसार इन्द्रलोक, सूर्यलोक, शिवलोक तथा गोलोकका सुख पाता है। जो मनुष्य भगवान् सूर्यनारायणके अग्रभागमें स्थित वापीमें एक मासतक प्रतिदिन अवगाहन करके नरदीपजीका दर्शन करता है, उसके दुःस्वप्नका नाश हो जाता है।
अन्धकार नष्ट होनेपर जब सब ओर उत्तम प्रकाश छा गया, तब भगवान् महेश्वरने तीन शिखाओंवाले त्रिशूलसे अन्धकासुरको विदीर्ण कर डाला। इससे ब्रह्मा और इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता बहुत प्रसन्न हुए। उस समय भगवान् विष्णुने देवताओंके हितकी इच्छासे शंखनाद किया। जहाँ उन्होंने शंख बजाया, वहाँ शंखोद्धारण नामसे प्रसिद्ध तीर्थ हो गया। वहाँ भगवान् विष्णु सदा निवास करते हैं। वहीं अनादि चतुर्मुख लिंग भी है। उस लिंगके समीप ही विष्णुदेवके दक्षिण भागमें त्रिशूलसे लक्षित होनेवाले भगवान् शिव विराजमान हैं। जो जितेन्द्रिय पुरुष चतुर्दशी और अष्टमीको इन सबका दर्शन करते हैं, वे समस्त पापराशिके क्षीण हो जानेसे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो वहाँ स्नान और एकादशीका व्रत करके शंखधारी भगवान् जनार्दनका दर्शन करता है, वह अच्युतपद (वैकुण्ठधाम)-को प्राप्त होता है।
## ॐकारेश्वर आदिका महत्त्व तथा अन्धकासुरको शिवगणोंमें श्रेष्ठ स्थानकी प्राप्ति
सनत्कुमारजी कहते हैं—भगवान् रुद्रके त्रिशूलसे अन्धकासुरके विदीर्ण होनेपर वहाँ एक विशेष प्रकारकी ध्वनि प्रकट हुई। उसी स्थानपर ॐकारेश्वर महादेवका अविर्भाव हुआ। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र हो समाधि तथा नियमसे जो ॐकारस्वरूप महादेवका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अन्धकासुरको घायल करके वह त्रिशूल पातालगंगाके जलमें चला गया। पातालनिवासी भगवान् हाटकेश्वर उसी शूलके मार्गसे ऊपर निकले। इसीलिये उन्हें शूलेश्वर कहा गया है। उनके उत्तर भागमें धूतपाप नामक तीर्थ है। वहीं वह पापात्मा एवं पराक्रमी दैत्यराज त्रिशूलसे गिराया गया था।