संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * | ९३७ ---|---
इसीलिये उस तीर्थको धूतपाप कहते हैं। जो जितेन्द्रिय शिवभक्त अष्टमी, पूर्णिमा, चतुर्दशी तथा शनिवारको एक रात उपवास करके धूतपाप नामक महेश्वरका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंमें किये हुए समस्त पापोंसे छूट जाता है और अन्तमें शिवलोकको प्राप्त होता है। जो मनुष्य पौषके महीनेमें वहाँ स्नान करके शिवजीका दर्शन करता है, वह शूलेश्वरके प्रभावसे ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है और मृत्युके पश्चात् परम पदको प्राप्त होता है।
इस प्रकार अन्धकासुरको विदीर्ण करके भगवान् शिवका त्रिशूल ज्यों-ही पातालगंगाको गया, त्यों-ही अन्धकासुरके रक्तसे उत्पन्न सहस्रों भयंकर दैत्य वहाँ युद्धके लिये खड़े हो गये। तब महादेवजीने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। उस भयंकर गर्जनासे मूर्च्छित होकर वे पापी दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। उस महावनमें जहाँ भगवान् शंकरने सिंहनाद किया था, वहाँ समस्त पापोंका नाश करनेवाले सिंहेश्वरदेव विराजमान हैं। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सिंहके समान बलवान् होता है। सिंहनाद करनेपर जहाँ भगवान्का श्री-विग्रह रौद्ररससे कण्टकित (रोमांचित) हो गया था, वहाँ वे कण्टकेश्वरदेवके नामसे विद्यमान हैं, जो भक्तोंको सदा सब कुछ देनेवाले हैं। जो मानव उस तीर्थमें स्नान करके कण्टकेश्वर शिवका दर्शन करता है, वह कहीं भयको नहीं प्राप्त होता। जहाँ शंकरजीने इन्द्रको अभयदान दिया था, वहाँ अभयेश्वर नामक उत्तम लिंग प्रकट हुआ। वहाँ स्नानसे पवित्र हो उपवास करके जो जितेन्द्रिय पुरुष देवदेवेश्वर शिवका पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञके फलको प्राप्त होता है। उस समय भगवान् शिवके मस्तकसे पृथ्वीपर जो पसीनेकी बूँद गिरी, उससे अंगारके समान लाल अंगवाले भूमिपुत्र मंगल उत्पन्न हुए। अंगारक, रक्ताक्ष तथा महादेव-पुत्र इन नामोंसे स्तुति करके ब्राह्मणोंने उन्हें ग्रहोंके मध्यमें प्रतिष्ठित किया। तत्पश्चात् उसी स्थानपर ब्रह्माजीने अंगारकेश्वर नामक उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। जो पवित्रात्मा मनुष्य मंगलवारको उस तीर्थमें स्नान तथा अंगारकेश्वरका दर्शन करता है, वह समस्त पातकोंसे छूट जाता है। मंगलवारको चतुर्थी तिथिमें रात्रिके समय अर्घ्य देना चाहिये। जबतक चार चतुर्थी पूरी न हो जाय, तबतक प्रयत्नपूर्वक यह अर्घ्यदानका नियम चलाते रहना चाहिये।
इस प्रकार त्रिशूलसे आहत होनेके बाद अन्धकासुरको बड़ा भय हुआ। वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न करने लगा। संसारमें जीवन-रक्षाका दूसरा कोई उपाय न देखकर उसने भगवान् शंकरका ही स्तवन प्रारम्भ किया। वह बोला— 'जो इस सम्पूर्ण चराचर जगत्के कर्ता और इसे अपने किये हुए कर्मोंके अनुसार सुख-दुःख देनेवाले हैं, जो संसारकी उत्पत्तिके हेतु तथा उसका अन्तकाल भी स्वयं ही हैं, सबको शरण देनेवाले उन्हीं भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके मोह, तमोगुण और रजोगुण दूर हो गये हैं, वे योगीजन, भक्तिसे मनको एकाग्र रखनेवाले निष्काम भक्त तथा अपरिच्छिन्न बुद्धिवाले ज्ञानी भी जिनका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन अनन्त दिव्यस्वरूप शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सुशोभित किरणोंवाले निर्मल अर्धचन्द्रका मुकुट बाँध सदा अपने मस्तकपर गंगाजीको धारण करते हैं और जिन्होंने अपने वामांग भागमें गिरिराजकिशोरी उमाको धारण कर रखा है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। सिद्ध और चारण जिनके चरणारविन्दोंकी सेवा करते रहते हैं और जिन्होंने आकाशसे ऊँची-ऊँची उत्ताल तरंगोंके साथ विषम वेगसे गिरती हुई त्रिभुवनपावनी गंगाको अपने मस्तकपर पुष्पमालाकी भाँति धारण कर लिया था, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिसके भारसे कैलासपर्वतका शिखर हिलने लगता था, उस कैलास शृंगके सदृश विशालकाय दशाननने भी जिनके युगलचरणारविन्दोंकी सेवा की है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। महेश्वर! जो मूढ़ पुरुष चराचर जगत्के गुरु