भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आपको नहीं जानते हैं, वे ऐश्वर्यका अहंकार नष्ट होनेपर मेरी ही भाँति पश्चात्ताप करते और दुस्सह यातना भोगते हैं।'

इस प्रकार स्तुति करते हुए अन्धकासुरसे सबका कल्याण करनेवाले शूलपाणि भगवान् शिव प्रसन्न होकर बोले—वत्स! मैं प्रसन्न हूँ, अब तुम शुद्ध-निर्मल हो गये हो। अतः तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ, निश्चिन्त होकर मेरी ओर देखो। दानवश्रेष्ठ! तुम्हारे मनमें जो कोई भी आकांक्षा हो, उसे माँगो; मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा।

अन्धकासुर बोला—देवेश्वर! मुझे गणपतिपद प्रदान कीजिये, क्योंकि वह सदा अक्षय है।

भगवान् शिव बोले—वत्स! तुम मेरे गणोंके अध्यक्ष होकर रहो। तुम्हें अणिमा आदि समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और सदैव तुम मेरे प्रिय बने रहोगे।

सनत्कुमारजी कहते हैं—इस प्रकार दुर्लभ वरदान पाकर वह अन्धक महादेवजीका मुख्य गण होकर वहीं अन्तर्धान हो गया। तदनन्तर भगवान् शिव कैलासपर्वतपर चले गये।


उज्जयिनीपुरीके कनकश्शृंगा आदि नाम पड़नेका कारण

व्यासजीने पूछा—भगवन्! इस महाकाल वनमें कितने तीर्थ और शिवलिंग हैं, यह बतानेकी कृपा करें।

सनत्कुमारजीने कहा—व्यास! महाकाल वनमें साठ कोटि सहस्र और साठ कोटि शत तीर्थ हैं तथा शिवलिंगोंकी तो कोई संख्या ही नहीं है। सकाम या निष्कामभाव रखनेवाला जो मनुष्य इस सुन्दर महाकाल वनमें जन्म लेता है, वह भगवान् शिवके धाममें प्रतिष्ठित होता है। ब्रह्मन्! सभी तीर्थ और सभी सिद्ध क्षेत्र सब ओरसे पवित्र एवं पुण्यजनक हैं। उन सबमें इस महाकालतीर्थ और क्षेत्रको मुख्य जानो।

व्यासजीने पूछा—मुने! उज्जयिनीपुरीका नाम पहले कनकश्शृंगा क्यों हुआ? फिर उसका कुशस्थली नाम कैसे हुआ? आगे चलकर अवन्ती नाम कैसे पड़ा? पद्मावती और उज्जयिनी नामोंका भी हेतु क्या है? यह सब बतावें।

सनत्कुमारजीने कहा—एक समय महादेवजी तथा ब्रह्माजी सुवर्णमय शिखरोंसे युक्त अद्भुत पुरीका दर्शन करनेके लिये भूतलपर आये। यहाँ आकर उन्होंने सम्पूर्ण विश्वके स्वामी भगवान् विष्णुरूपको नमस्कार किया। विष्णुरूपने भी विधि और आदरके साथ सेवकोंसहित उन दोनोंका स्वागत-सत्कार किया और पूछा—'महेश्वर! तथा ब्रह्माजी! आप दोनों अपने अनुगामियोंसहित देवलोकसे पृथ्वीपर कैसे पधारे हैं!' यह सुनकर ब्रह्मा और महादेवजी बोले—'प्रभो! जहाँ आप विराजमान हैं, वहीं हम दोनोंका भी स्नेह है। आपके बिना हमें स्वर्ग, पृथ्वी अथवा पातालमें भी सुख नहीं है। भगवन्! आपने यह सुवर्णमय शिखरवाली विचित्र पुरी कब बसायी है? जगदीश्वर! आप यहाँ हमें भी स्थान दें।'

यह सुनकर विश्वरूपमय विष्णुने प्रसन्नचित्त होकर कहा—मैं आप दोनोंको अभीष्ट स्थान देता हूँ। प्रजापते! इस पुरीके उत्तर भागमें आपका स्थान है और महेश्वर! आपके लिये दक्षिण भागमें स्थान दिया गया है। अतः आप वहीं पधारें। आप दोनोंने इस पुरीको सुवर्णमय शिखरवाली बताया है, इसलिये यह संसारमें 'कनकश्शृंगा' नामसे विख्यात होगी।

इस प्रकार इस पुरीका प्रथम नाम कनकश्शृंगा बताया जाता है। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी तीनों रहकर प्रसन्नताका अनुभव करते हैं और अपने भक्तोंको समस्त मनोवांछित फल देते हैं।