भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 968, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 968

* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९३९


व्यास! अब इस पुरीके कुशस्थली नाम होनेका कारण बताया जाता है, उसे सुनो। एक समय सृष्टिकी रचना करके ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुका ध्यान किया। उनके ध्यान करनेपर विश्वरूपधारी भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे कहा—'ब्रह्मन्! आपने मेरा उत्तम रीतिसे ध्यान किया है, इसलिये मैं आपके पास आया हूँ। समस्त प्राणियोंकी रक्षाके लिये उद्यत हुए मुझको देखिये।' भगवान्‌का यह वचन सुनकर ब्रह्माजी सहसा उठकर खड़े हो गये और अनन्यचित्तसे सामने खड़े हुए श्रीहरिका पूजन करते हुए उन्हें नमस्कार किया। तत्पश्चात् ब्रह्माजीने इस प्रकार कहा—'देवदेव! जगन्नाथ! इस जगत्‌की सृष्टि तो मैंने कर दी है, परंतु आपके कृपापूर्ण सहयोगके बिना इसका स्थिर रहना असम्भव है। आप ही इस संसारके शास्ता एवं पालक हैं। अतः आप ही इसको अपने अनुशासनमें रखें। यक्ष, नाग, राक्षस, देवता, दानव, गन्धर्व—ये परस्पर एक-दूसरेको मारते हैं। इन सबकी रक्षा करनेमें केवल आप ही समर्थ हैं। आप सबमें प्रवेश करनेवाले और सर्वत्र व्यापक हैं, इसीलिये मुनीश्वरोंने आपको 'विष्णु' कहा है। आपने ही अपनेमें इस सम्पूर्ण विश्वको बसाया है, इसलिये आप 'वासुदेव' कहलाते हैं। समस्त संसार आपका अनुगामी है, आप विभु हैं, सम्पूर्ण जगत्‌के राजा हैं। अखिल विश्व आपके लिये सेनाके सदृश है, इसीलिये आप 'विश्वसेन' कहे गये हैं। इस चराचर जगत्‌को अपनी ओर आकृष्ट करनेके कारण आपको लोग 'श्रीकृष्ण' कहते हैं। देव! आपने तीनों लोकोंको जीत लिया है, अतः आप 'जिष्णु' हैं। आप ही इस सम्पूर्ण जगत्‌के आदि राजा हों, आपका सिंहासन अद्वितीय हो। आपके हाथमें दक्षिणावर्त शंख है, इस कारण आप पुरुषोत्तम हैं। आपके पास सदा सुदर्शन नामक चक्र विद्यमान रहता है, अतः आप ही चक्री हैं। आपकी ध्वजा गरुड़से सेवित है तथा सुवर्णकी-सी पाँखवाले गरुड़जी आपके वाहन हैं। किरीट, पदक, भुजबन्द, कर्णपुष्प, केयूर, हार, उत्तम सुवर्णसूत्र, विचित्र वस्त्र, उत्तरीय तथा लाल रंगकी मालाओंसे आप विभूषित होइये। लक्ष्मी कभी आपका साथ नहीं छोड़तीं। आपका ऐश्वर्य अनन्त है। मुकुन्द! इस जगत्‌में साधुपुरुषोंकी आपमें भक्ति हो। आप भक्तके ऊपर प्रसन्न होइये।

सनत्कुमारजी कहते हैं—ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो देवताओंके बीचमें इस प्रकार बोले—'विरंचि! मुझे कोई शुद्ध मण्डल दिखाइये, जो आपसे पृथक् न हो और जहाँ स्थिरतापूर्वक स्थित होकर मैं जगत्‌की रक्षा कर सकूँ।' तदनन्तर ब्रह्माजीने कुशकी एक मूठी ली और एक अत्यन्त उन्नत स्थल भूमिपर बिछाकर भगवान् विष्णुसे कहा—'देव! आपके लिये यही पवित्र मण्डल है, देवताओंसे पूजित होकर आप सदा यहीं विराजमान होइये। इन कुशोंपर बैठनेके कारण आप विष्टरश्रवा एवं कुशेश्वर होंगे।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर भगवान् लक्ष्मीपति वहाँ कुशके आसनपर आसीन हुए। तदनन्तर विश्वविधाता ब्रह्मा और भगवान् पुराण-पुरुषोत्तम दोनोंने उस पुरीका नाम कुशस्थली रख दिया। उस पुरीमें रहकर सम्पूर्ण विश्वके पालक, सर्वत्र व्यापक, विश्वेश्वर, विश्वस्रष्टा, विश्वात्मा एवं सर्वविश्वनियन्ता श्रीमान् विष्णुने समस्त संसारका पालन किया। इस प्रकार पहले जिसका नाम कनकभृंगा था, वही पुरी कुशस्थलीके नामसे प्रसिद्ध हुई।

प्राचीन कालकी बात है। दैत्योंसे पराजित होकर सम्पूर्ण देवताओंने मेरु पर्वतके शिखरपर जाकर वहाँके वन, कुंज और गुफा आदिकी शरण ली। वहाँ पहुँचकर उन्होंने परस्पर सलाह की और उस स्थानपर गये, जहाँ प्रजापति ब्रह्माजी विराजमान थे। देवताओंने अपने आगमनका सब कारण उनसे निवेदन किया। तब ब्रह्माजी देवताओंके साथ देवाधिदेव भगवान् महेश्वरके समीप गये। फिर महादेवजी भी उन सबके साथ वैकुण्ठधाममें भगवान् विष्णुके समीप गये और उन देवदेव जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे।

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