संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
**देवता बोले—**सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले भगवान् अनन्तको नमस्कार है। कूर्मरूपधारी श्रीहरिको बार-बार नमस्कार है। भयंकर नृसिंह और वाराह रूप धारण करनेवाले भगवान्को नमस्कार है। रघुनन्दन रामको एवं अनन्त शक्तिसम्पन्न ब्रह्मको नमस्कार है। परम शान्त वासुदेवको नमस्कार है। अज्ञानी जीवोंका भी पालन करनेवाले पशुपति, शुद्ध-बुद्धस्वरूप एवं म्लेच्छान्तकारी कल्किदेवको नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुतिमें लगे हुए देवताओंको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई—देवगण! तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो। ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित परम सुन्दर जो महाकाल वन है, वहाँ समस्त कामनाओं और फलोंको देनेवाली एक पवित्र पुरी है, जो बड़ी ही मनोरम और कुशस्थली नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ सिद्ध और गन्धर्व निवास करते हैं, वहीं महादेवजी सदा निवास करते हैं। कल्पान्तकालमें जब समस्त चराचर प्राणी नष्ट हो जाते हैं, सब तीर्थ, समस्त पुण्य मन्दिर, नदी, समुद्र, सरोवर, उपवन, ओषधि, वृक्ष, लता, यन्त्र, मन्त्र, शुभ, अशुभ, नक्षत्र और सूर्य, चन्द्र आदि जगत्का अभाव हो जाता है, उस समय सबके बीज, पुण्य, जीव, कर्म तथा आशय (कर्मोंके संस्कार) सबको लेकर भगवान् शिव उस पुरीमें स्थित होते हैं। अतः कुशस्थलीपुरी सबके लिये परम हितकारिणी है। वहाँ मनुष्योंद्वारा किया हुआ थोड़ा-सा भी दान अनन्तानन्तगुना हो जाता है। तुम सब लोग यत्नपूर्वक वहीं जाओ। उस तीर्थमें जाकर तुम सब लोग उत्तम विधिसे स्नान, दान आदि शुभकर्म करो। उस पुण्यके बलसे तुम्हें पुनः स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी।
वह आकाशवाणी सुनकर ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता मस्तक झुकाकर भगवान्को प्रणाम करके उसी स्थानपर गये। वहाँ उस पुरीको देखकर देवता बहुत प्रसन्न हुए। कुशस्थलीमें पैशाचमोचन नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। उसमें स्नान, जप, होम और दान करनेसे देवताओंको अक्षय पुण्य प्राप्त हुआ। उसके बलसे वे दानवोंको जीतकर पुनः स्वर्गलोकमें अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित हो गये। जहाँ प्रत्येक कल्पमें देवता, तीर्थ, ओषधि, बीज तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन होता है, वह पुरी सबका अवन (रक्षण) करनेके कारण 'अवन्ती' है। आजसे इस कुशस्थलीका नाम अवन्तीपुरी होगा। ऐसा कहकर सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। द्विजश्रेष्ठ! तभीसे भूतलपर वह पुरी अवन्तीके नामसे विख्यात हुई है।
व्यासजी! अब मैं यह बतलाऊँगा कि अवन्तीपुरीका नाम उज्जयिनी कैसे हुआ। एक समय सब दैत्योंके राजा महादैत्य त्रिपुरने ब्रह्माजीके सन्तोषके लिये बड़ी घोर तपस्या की। एक सहस्र वर्ष पूर्ण होनेपर ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न होकर उससे बोले—'असुरश्रेष्ठ! तुम मुझसे अपना मनोवांछित वर माँगो।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर त्रिपुर दैत्य बोला—'ब्रह्मन्! मैं देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग तथा राक्षस सबके द्वारा अवध्य हो जाऊँ।'
**ब्रह्माजी बोले—**वत्स! ऐसा ही होगा। तुम निर्भय होकर विचरो।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तबसे लेकर उस दैत्यने पहलेके वैरका स्मरण करके देवताओंका महान् विनाश आरम्भ किया। उससे परास्त हुए देवता आपसमें सलाह करके ब्रह्माजीके पास गये और उनसे अपनी विपत्तिका सब समाचार कह सुनाया। यह सुनकर ब्रह्माजी सहसा उठे और देवताओंके साथ महाकाल वनमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने समस्त देवताओंके साथ रुद्रसरोवरमें स्नान, दान, जप और होम किया। तत्पश्चात् महाकालजीकी पूजा करके श्रीब्रह्माजी बोले—'भक्तोंको अभय दान देनेवाले देवदेव महादेव! दैत्यराज त्रिपुर देवताओंका बड़ा भारी संहार कर रहा है। उसने कितने ही द्वीप, ग्राम और नगर उजाड़ दिये। ऋषियों और संन्यासियोंके आश्रम