भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 970
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४१

फूँक दिये। अतः आप यत्नपूर्वक उसके वधका कोई उपाय सोचिये।'

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर महादेवजीने कुछ सोच-विचारकर कहा—देवताओ! उस दुरात्मा दैत्यको जीतनेका कोई उपाय करूँगा। तबतक तुमलोग तपस्या करो। अवन्तीपुरीमें जो होम, दान आदि पुण्य कर्म किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। सब देवताओंसे ऐसा कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये।

तदनन्तर उस दैत्यका विनाश करनेके लिये भगवान् शंकरने महापाशुपत नामक शस्त्र अपने हाथमें लिया। उस समय वे महान् आडम्बर धारण करके समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर प्रतीत होने लगे। देवता उनकी स्तुति और जय-जयकार करते हुए उनके पीछे-पीछे चले। महादेवजीने एक ही बाणसे उस महामायावी असुरको मार डाला और मायायुद्धसे उसके तीन टुकड़े कर डाले। तत्पश्चात् वे देवसेवित अवन्तीपुरीमें लौट आये। उस समय ऋषि, सिद्ध और चारण अत्यन्त प्रसन्न हो जय-जयकारके साथ भगवान् सदाशिवकी स्तुति करने लगे। देवताओंको पुनः अपना स्थान प्राप्त हुआ। वहाँ त्रिपुर नामक दानवको उत्कर्षपूर्वक जीता गया था। इसलिये सब ऋषि-महर्षियोंने उसका नाम 'उज्जयिनी' रख दिया। तभीसे अवन्तीपुरीका नाम उज्जयिनी-पुरी हुआ। जो मानव उस पुरीमें स्नान, दान आदि करते हैं, उनके शरीरमें कोई पाप नहीं ठहर पाता। उज्जयिनीपुरीमें विद्याकी इच्छा रखनेवाला महादेवजीकी, धनार्थी पुरुष धनाध्यक्ष कुबेरकी, पुत्रार्थी सुरेश्वर इन्द्रकी, सुखार्थी मानव दिनेश्वर सूर्यकी, उत्तम बुद्धि चाहनेवाला गणेशकी तथा प्रिय वस्तुकी इच्छा रखनेवाला भगवान् शेषकी स्तोत्रमयी वाणीद्वारा आराधना करते हुए निवास करे। जो सौभाग्यशाली मानव सदा उज्जयिनीपुरीमें निवास करता है, वह मनोवांछित कामनाओंका उपभोग करके मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके धाममें जाता है।

अब उज्जयिनीपुरीका पद्मावती नाम पड़नेका कारण बतलाऊँगा। एक समय दुष्टात्मा दानवोंके द्वारा धर्मको बड़ी भारी हानि पहुँची। तब समस्त देवताओंने दैत्योंसे मिलकर समुद्रका मन्थन किया। उस समय समुद्रसे महालक्ष्मी प्रकट हुईं। वे उज्जयिनीके महाकाल वनमें रहने लगीं। तदनन्तर कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, वारुणी मदिरा, धन्वन्तरि वैद्य, चन्द्रमा, कामधेनु, ऐरावत हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, अमृत-कलश, रम्भा अप्सरा, शार्ङ्ग धनुष, पांचजन्य शंख, महापद्म निधि और हालाहल विष—ये नाना प्रकारके चौदह रत्न प्राप्त हुए। इन सबको लेकर देवता और दैत्य माहेश्वर वनमें आये और वहाँ बैठकर अमृत पीनेके विषयमें विचार करने लगे। वे सभी 'पहले मैं, पहले मैं' ऐसा कहते हुए विवाद करने लगे। इसके कारण वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया। इसी समय वहाँ देवर्षि नारद आये। उन्होंने दोनों दलोंका वह कलह देखकर भगवान् विष्णुकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि सबके मनको मोहनेवाली नारीका रूप धारण करके वहाँ आये। उस सुन्दरीको देखकर वे महादैत्य कामदेवके वशीभूत हो गये। इसी समय श्रीहरिने अपने हाथका कौशल दिखाते हुए दैत्योंको मदिरा और देवताओंको अमृतका कलश दे दिया। राहु नामक दैत्य देवताओंका-सा रूप धारण करके उन्हींके बीचमें बैठकर वह उत्तम अमृत पीने लगा। यह जानकर भगवान् विष्णुने तुरंत ही चक्रसे उसका मस्तक काट डाला। परंतु अमृतका स्पर्श हो जानेके कारण उस असुरकी मृत्यु नहीं हुई। वही इस महाकाल क्षेत्रमें राहु और केतुके नामसे विख्यात हुआ। तत्पश्चात् महाकाल वनमें देवताओंने उन रत्नोंको परस्पर बाँट लिया, जिससे वे रत्नभोगी हुए। मोहिनी देवीने कौस्तुभ मणि, लक्ष्मी, शार्ङ्ग-धनुष तथा पांचजन्य शंख—ये चार वस्तुएँ भगवान् विष्णुको दीं। उच्चैःश्रवा घोड़ा सूर्यको दिया, गजश्रेष्ठ ऐरावत इन्द्रको समर्पित किया। देवताओंको अमृत और शिवजीको चन्द्रमा प्रदान किया। वृक्षोंमें