भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९४२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रेष्ठ पारिजात तथा रम्भा अप्सराको इन्द्रके क्रीड़ा-कानन नन्दनवनमें भेज दिया। देवताओंको अपना खोया हुआ स्थान पुनः प्राप्त हो गया। कामधेनु गौको यज्ञकी सिद्धिके लिये ऋषियोंके अधीन किया। महापद्म नामकी निधि कुबेरके भवनमें गयी; परंतु उस हालाहल विषका किसीने भी आदर नहीं किया। भगवान् शंकरने जगत्के हितकी इच्छासे स्वयं ही उस विषको पीकर कण्ठमें धारण कर लिया। तभीसे महादेवजीका नाम नीलकण्ठ हुआ। जहाँ रत्नोंका बँटवारा हुआ, उस रत्नकुण्डमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् नीलकण्ठका दर्शन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर सब रत्नोंका भोगी होता है तथा अन्तमें शिवलोकको जाता है। उस समय हर्षमें भरे हुए ब्रह्मा, विष्णु आदि सब देवता कहने लगे—‘इस उज्जयिनी-पुरीमें आकर हम सब लोग रत्नोंके भोगी हुए हैं तथा यहाँ सब समय भगवती पद्मा (लक्ष्मी) निश्चलरूपसे निवास करती हैं, अतः आजसे इस पुरीका नाम ‘पद्मावती’ होगा। जो महाभाग मानव इस पुरीमें स्नान, दान, पूजन तथा देवताओं, पितरोंका तर्पण करता है, उसके शरीरमें किंचिन्मात्र भी पाप नहीं रह जाता तथा उसे दरिद्रता और दुर्गंतिकी भी प्राप्ति नहीं होती।

सनत्कुमारजी कहते हैं—‘व्यासजी! एक समय महर्षि लोमशने अपना अनुभव इस प्रकार सुनाया था।’

लोमशजी बोले—एक बार मैं तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुशस्थलीपुरीमें गया था। वहाँ भगवान् महेश्वरके दर्शनमात्रसे मेरे सारे रोग, सारी चिन्ताएँ मिट गयीं और मैं निर्मल हो गया। वहीं दीर्घकालतक तपस्या करके मैं जरा और रोगसे रहित दीर्घायु हुआ। मैंने वहाँके सब तीर्थोंमें स्नान किया और पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो समस्त पापोंसे रहित हो गया। उस तीर्थमें पार्वतीजीके साथ भगवान् शंकर सदा निवास करते हैं। उनका श्रीअंग चन्द्रमाके मुकुटसे सुशोभित है। उनके अंगोंमें चिताका भस्म लगा रहता है। वे सब ओर चन्द्रकलाकी चटकीली चाँदनी छिटकाते हुए शोभा पाते हैं और इसीलिये वहाँपर कृष्णपक्ष, अमावास्या तिथि और अन्धकार कभी नहीं हुआ। वहाँकी नदियाँ, सरोवर, बावली तथा पल्वल आदि सभी जलाशय कुमुदिनीसे व्याप्त होते हैं और उनसे आच्छादित हुई पृथ्वी चाँदनीमें डूबी हुई-सी प्रतीत होती है। वहाँ सब समय कुमुद्वती (कुमुदिनी) खिली रहती है। इसलिये उस पद्मावतीपुरीका नाम कुमुद्वती हो गया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो कुमुद्वतीपुरीमें श्राद्ध करते हैं, उनके पितर कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिरते। वहाँका श्राद्ध अक्षय होता है।

व्यास! यह कुशस्थलीपुरी किस प्रकार अमरावती नामसे प्रसिद्ध हुई, वह प्रसंग सुनो। एक समय मुनिश्रेष्ठ मरीचिनन्दन कश्यपजीने अपनी पत्नीके साथ परम सुन्दर महाकाल वनमें बड़ी कठोर तपस्या की। तपस्या करते-करते जब एक सहस्र वर्ष पूरे हो गये, तब आकाशवाणी हुई—‘द्विजश्रेष्ठ! तुमने फलकी इच्छासे यह तीव्र तपस्या की है, इसलिये जबतक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे तबतक इस पृथ्वीपर तुम्हारी सन्तति बनी रहेगी। तुम्हारी पतिव्रता पत्नी अदितिने भी तुम्हारे साथ रहकर तप किया है, इसलिये यह यशस्विनी देवी सदा छायाकी भाँति तुम्हारे साथ रहेगी। श्रीविष्णु (वामन) और चन्द्रमा आदि सब देवता जो तुम्हारे पुत्र हैं, देवलोकमें अजर-अमररूपमें विख्यात होंगे। ऋषिश्रेष्ठ! तुम भी मेरे वचनसे पापरहित प्रजापति होओगे।’

तभीसे महर्षि कश्यप अदिति और अग्निके साथ कुशस्थलीपुरीमें सदा निवास करते हैं। इसीलिये देवता, असुर और मानवरूप उनकी समस्त प्रजा सदा वृद्धिको प्राप्त होती है। व्यास! देवताओंने महाकाल वनमें ही अमृत-पान किया था, इसलिये वे अमर हो गये। उत्तम महाकाल वनमें ही जो नन्दनवन है, वहीं सब मनोरथों एवं वरोंको देनेवाली कामधेनुका निवास बताया गया है। समस्त ब्रह्माण्डमें जो दिव्य वस्तुएँ हैं, वे सब उत्तम महाकाल वनमें स्थित हैं। यहाँ अमरोंकी स्थिति है, इस कारण

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