भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 972
* आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य *९४३

इस पुरीका नाम अमरावती हुआ। जो इस पुरीमें स्नान, दान आदि करके भगवान् महेश्वरका दर्शन करता है, उसके लिये पुत्र या धन आदि कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। वह समस्त भोगोंको पाता है और मृत्युके पश्चात् भगवान् शिवके धाममें जाता है।

महाभाग व्यास! यह अमरावतीपुरी जिस प्रकार विशाला नामसे विख्यात हुई, वह प्रसंग भी सुनो। एक समय भगवती उमाने शिवजीसे कहा—'समस्त जगत्को धारण करनेवाले देवदेव जगदीश्वर ! आप मेरे निवासके लिये समस्त कामनाओंको देनेवाली पुरीका निर्माण कीजिये।' पार्वतीजीका यह वचन सुनकर भगवान् शिवने सबके मनको प्रिय लगनेवाली सुन्दर पुरीका निर्माण किया, जो बहुत ही विशाल, विस्तृत, पुण्यमयी तथा पुण्यात्माओंका आश्रय थी। विशाल होनेके कारण ही उस सदा रहनेवाली पुरीका नाम 'विशाला' हुआ। जहाँ कहीं किसी भी अवस्थामें रहकर भी जो नित्य विशाला नामका उच्चारण करता है, वह मनुष्य भगवान् शिवके धाममें प्रतिष्ठित होता है। व्यास ! इस समस्त पृथ्वीपर या सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें विशालाके समान भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली दूसरी कोई पुरी नहीं है। जो मनुष्य श्राद्धकालमें पितरोंके उद्देश्यसे यहाँ दान करते हैं, उनका वह सब दान अक्षय होता है। जिन्होंने कभी दूसरे कार्यके प्रसंगसे भी विशालापुरीमें आकर स्नान, दान आदि पुण्यकार्य किया है, वे जहाँ कहीं भी मृत्युको प्राप्त होनेपर भगवान् शिवके ही धाममें जाते हैं। व्यासजी ! इस प्रकार इस कुशस्थली-पुरीका नाम विशाला हुआ है।


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काष्ठा, कला आदि कालमान, युग और कल्पभेद तथा प्रतिकल्पपुरीका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं—व्यास ! पंद्रह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है, तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है, तीस कलाओंका एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तोंका एक दिन-रात होता है, ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। चन्द्रमा और सूर्यकी गति भी बतायी जाती है। सूर्यकी गतिविशेषसे मनुष्योंका दिन तथा रात्रि होती है। पंद्रह दिन-रातका एक पक्ष होता है। दो पक्षोंका मास और दो मासकी ऋतु कही जाती है। तीन ऋतुओंका एक अयन होता है। दो अयन मिलाकर एक वर्ष होता है। दक्षिणायन और उत्तरायण यही दो अयन हैं। इस मानके अनुसार जो दो पक्षोंका मास होता है, वही पितरोंका दिन-रात है। शुक्ल पक्ष उनका दिन और कृष्ण पक्ष उनकी रात्रि है। इसीसे पितरोंका श्राद्ध कृष्ण पक्षमें किया जाता है। मनुष्योंके कालमानके अनुसार जो एक वर्ष होता है, वही देवताओंका दिन-रात है। उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन रात्रि। देवताओंके चार हजार वर्षका एक सत्ययुग होता है। उतने ही सौ वर्षोंकी उसकी सन्ध्या और सन्ध्यांश है। देवताओंके तीन हजार वर्षका त्रेता और तीन-तीन सौ वर्षके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश होते हैं। दो हजार वर्षोंका द्वापर बताया गया है और दो-दो सौ वर्षोंके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश हैं। एक सहस्र दिव्य वर्षोंका कलियुग होता है और सौ-सौ वर्षके उसके सन्ध्या-सन्ध्यांश कहे गये हैं। इस प्रकार चारों युगोंकी वर्ष-संख्या दिव्यमानसे बारह हजार बतायी गयी है। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको एक चतुर्युग कहते हैं। इकहत्तर चतुर्युगका एक मन्वन्तर बताया गया है। एक सहस्र युगका ब्रह्माजीका एक दिन बताया गया है। उसीको कल्प कहते हैं। उतने ही युगोंकी ब्रह्माजीकी रात्रि भी बतायी जाती है। ब्रह्माकी उस रात्रिमें पर्वत, वन और काननोंसहित समस्त पृथ्वी जलमें डूब जाती है।