भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 973, कुल 1406 में से

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९४४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


रात्रिके सहस्र युग पूर्ण हो जानेपर पुनः ब्रह्माजीका दिन आरम्भ होता है। उनके पूरे एक दिनके समयको पूर्णतः एक कल्प कहते हैं। पूर्वोक्त इकहत्तर चतुर्युगसे कुछ अधिक समय बीतनेपर एक मन्वन्तर पूरा होता है। इन मनुओंकी संख्या चौदह बतायी गयी है। ये मनु अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। समस्त वेदों और पुराणोंमें ये प्रभावशाली तथा समस्त प्रजाओंके पालक बताये गये हैं। इन सबका कीर्तन धन्य है। एक सहस्र चतुर्युग पूर्ण हो जानेपर एक कल्पका समय समाप्त हो जाता है। उसमें सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंसे सम्पूर्ण प्राणी दग्ध हो जाते हैं। ब्रह्मर्षिगण द्वादश आदित्योंके साथ ब्रह्माजीको आगे करके सुरश्रेष्ठ भगवान् नारायणमें प्रवेश कर जाते हैं। वे अव्यक्त सनातनदेव श्रीहरि ही ब्रह्मा आदिके रूपमें प्रत्येक कल्पमें बार-बार समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् उन्हींका है। वे ही परमेश्वर परम सुन्दर महाकाल वनमें ब्रह्मा और महादेवजीके साथ निवास करते हैं। उत्तम महाकाल वनमें प्रलयकाल भी बाधा नहीं पहुँचाता। यह कुशस्थली-पुरी कल्प-कल्पमें अत्यन्त मनोहर होती जाती है। युग-युगमें पाप-तापसे रहित निर्भय और निर्विकार होती है।

व्यास! पूर्वकालसे ही इसी प्रकार प्रत्येक कल्पमें सृष्टिका आरम्भ होता है। वाराह, वामन, विष्णु और पितरोंके जो भिन्न-भिन्न कल्प बताये गये हैं, वे सभी इस कल्पान्तमें महाकाल वनमें ही प्रारम्भ हुए हैं। इस वनमें चौरासी कल्प व्यतीत हो गये। अतः उतने ही ज्योतिर्लिंग इस वनमें विराजमान हैं। पृथ्वी, समुद्र और पर्वत बार-बार उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं। भविष्यमें भी वे इसी प्रकार उत्पन्न और नष्ट होंगे। परंतु यह पुरी अचल मानी गयी है। इसीलिये सब समय और सब लोकोंमें इसकी महिमाका गान किया जाता है। यह प्रतिकल्पमें अचल रहती है। इसलिये इस पृथ्वीपर यह 'प्रतिकल्पा' नामसे विख्यात होगी।

वैशाखकी पूर्णिमाको प्रतिकल्पापुरीमें जाकर भगवान् महेश्वरका दर्शन करे और एक दिन उन्हें स्नान करावे। जो मानव किसी दूसरे प्रसंगसे भी शिप्रा नदीके जलमें स्नान करता है, उसके भीतर किंचिन्मात्र भी पाप शेष नहीं रहता और वह विष्णुलोकको जाता है। प्रत्येक कल्प और कल्पान्तमें यह पुरी अपने पूर्वरूपमें ही बनी रहती है। इसलिये सब लोगोंमें यह 'प्रतिकल्पा' के नामसे विख्यात है। जो मनुष्य इस पुरीके प्रति प्रेम रखते हैं, उनके लिये यह कल्पभेद नहीं होता।

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शिप्राका माहात्म्य, उसके 'ज्वरघ्नी' और 'अमृतोद्भवा' आदि नाम पड़नेका कारण

सनत्कुमारजी कहते हैं—महाभाग व्यास! इस पृथ्वीपर शिप्रा नदीके समान दूसरी कोई नदी नहीं है। जिसके तटका दर्शन करनेमात्रसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है, फिर दीर्घकालतक सेवन करनेसे तो कहना ही क्या है। वैकुण्ठमें इसका नाम 'शिप्रा' है, देवलोकमें यह 'ज्वरघ्नी' कहलाती है, यमद्वारमें 'पापघ्नी' के नामसे प्रसिद्ध है, पातालमें इसे 'अमृत-सम्भवा' कहते हैं और वाराहकल्पमें इसका नाम 'विष्णुदेहा' कहा गया है। अवन्तीपुरीमें भी 'शिप्रा' के नामसे ही इसकी ख्याति है। यह नदी साक्षात् कामधेनुसे प्रकट हुई है। वैकुण्ठलोकसे उत्पन्न होकर शिप्रा नदी तीनों लोकोंमें विख्यात हुई है। व्यास! शिप्राका नाम ज्वरघ्नी क्यों हुआ, यह बताता हूँ, सुनो। अनिरुद्धसे अपमानित होकर दैत्यराज बाणासुरने जब भगवान् श्रीकृष्णके साथ अपनी सहस्रों भुजाओंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध किया, तब वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने क्षुरप्र नामक शीघ्रगामी बाणके द्वारा शीघ्रतापूर्वक

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