भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 974, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 974
  • आवन्त्यखण्ड-अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य * ९४५

उसकी सहस्र भुजाओंको काट डाला (केवल दो भुजाएँ शेष छोड़ दीं)। भुजाएँ कट जानेसे बाणासुरका उत्साह भंग हो गया। वह उस युद्धसे पीड़ित हो भगवान् शंकरकी शरणमें गया। अपने समीप आये हुए भयविह्वल बाणासुरको देखकर भगवान् शिवको बड़ी दया आयी। वे, युद्धमें जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अविचलभावसे खड़े थे, वहाँ गये और बाणोंकी वर्षा करते हुए उन्होंने श्रीकृष्णको आगे बढ़नेसे रोका। फिर तो दोनोंमें बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ गया। भगवान् शिवने माहेश्वर ज्वरको प्रकट किया। यह देख श्रीकृष्णने भी वैष्णव ज्वरकी सृष्टि की। फिर वे दोनों ज्वर एक-दूसरेसे भयंकर युद्ध करने लगे। अन्तमें माहेश्वर ज्वर भाग खड़ा हुआ। वह सब लोकोंमें घूमता फिरा, पर कहीं भी उसे शान्ति नहीं मिली। अन्तमें वह महाकाल वनमें आया और वैष्णव ज्वरसे पीड़ित हो शिप्रा नदीके जलमें कूद पड़ा। इससे उसको बड़ी शान्ति मिली। माहेश्वर ज्वरको शान्त हुआ देख वैष्णव ज्वरने भी वहाँ पहुँचकर शिप्राके जलमें स्नान किया। उस जलके प्रभावसे विष्णु और शिव दोनोंके ही ज्वर शान्त एवं विनष्ट हो गये। इसलिये शिप्रा नदी सब समयमें ज्वरका तत्क्षण नाश करनेवाली मानी गयी है। ज्वरसे पीड़ित एवं परम दुःखित हुए जो मानव एकाग्रचित्त हो शिप्रामें गोता लगाते और उसके तटपर निवास करते हैं, उन्हें ज्वरजनित पीड़ा कभी कष्ट नहीं देती है।

महामते व्यास ! एक समयकी बात है। भगवान् शिव हाथमें कपाल लेकर नागलोककी भोगवती-पुरीमें भिक्षाके लिये गये और घर-घर घूमकर उन्होंने 'भिक्षां देहि' (भिक्षा दो) की रट लगायी। किंतु उन भूखे भगवान् शिवको किसीने भी भिक्षा नहीं दी। तब वे पुरीसे बाहर निकले और उस स्थानपर गये, जहाँ नागलोकके संरक्षणमें अमृतके इक्कीस कुण्ड भरे हुए थे। वहाँ पहुँचकर सर्वान्तर्यामी भगवान् शंकरने अपने तृतीय नेत्रके मार्गसे अमृतके समस्त कुण्डोंको पी लिया और फिर वहाँसे उठकर चल दिये। यह सब देख-सुनकर समस्त नागलोक काँप उठा और सब एक-दूसरेसे पूछने लगे, 'यह किसका कर्म है? किसने क्या कर दिया है, जिससे इन कुण्डोंका अमृत यहाँसे चला गया?'

परस्पर ऐसा कहकर वासुकि आदि सभी नाग किसी महात्माका अपराध हो जानेकी आशंकासे नगर छोड़कर बाहर निकले और 'क्या करें, कहाँ जायँ? अब हमारा जीवन-निर्वाह कैसे होगा?' इत्यादि रूपसे चिन्ता प्रकट करते हुए स्त्री-बालकोंके साथ वे मन-ही-मन भगवान् श्रीहरिकी शरणमें गये। तब उनपर अनुग्रह करनेके लिये आकाशवाणी हुई—'नागगण! तुमलोगोंने घरपर आये हुए देवताका अपमान किया, अतिथिसत्कारका समय जानकर हाथमें कपाल लिये भिक्षुके वेषमें भिक्षा लेनेके लिये साक्षात् भगवान् शंकर तुम्हारे द्वारपर आये थे। परंतु भोगवतीपुरीमें किसीने भी उनको भिक्षा नहीं दी, तब वे बाहर चले गये हैं। इसी व्यतिक्रमके कारण तुम्हारे कुण्डोंका सम्पूर्ण अमृत नष्ट हो गया है। अब तुमलोग पातालसे निकलकर उत्तम महाकाल वनमें जाओ। वहाँ तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली श्रेष्ठ नदी शिप्रा बहती है, जो समस्त कामनाओं और फलोंको देनेवाली है। वहाँ जाकर तुम सब लोग विधिपूर्वक स्नान और देवाधिदेव भगवान् शिवका भजन करो। ऐसा करनेपर नागलोकमें तुम्हारी नष्ट हुई अमृतराशि पुनः प्राप्त हो जायगी।'

इस आकाशवाणीको सुनकर सब नाग स्त्री-बालक और वृद्धोंके साथ महाकाल वनमें गये। उन्होंने उस त्रिभुवनवन्दिता शिप्रा नदीका दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और वहाँ स्नान-दानादि करके उन्होंने महादेवजीकी आराधना की। कभी मलिन न होनेवाली कमलपुष्पोंकी माला, नाना प्रकारके फूल, अक्षत, वस्त्र, पुष्पहार, अनुलेपन, चन्दन, गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, दक्षिणा और कपूरकी आरती आदि पूजनसामग्री लेकर वे सब-के-सब महादेवजीकी सेवामें उपस्थित