भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 975
९४६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हुए। उस समय अमृतकी इच्छा रखनेवाले नागोंने भगवान् शिवकी पूजा करके इस प्रकार उनका स्तवन किया।

नाग बोले— जिनका कहीं अन्त नहीं है, ऐसे ब्रह्मस्वरूप शिवको नमस्कार है। सर्वदेवमय शिव! आपको बार-बार नमस्कार है। चन्द्रचूड! जटाका मुकुट धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। शंकरात्मन्! आपको नमस्कार है। सबके साक्षी शंकर! आपको नमस्कार है। समस्त बीजोंकी उत्पत्तिके कारणभूत महादेव! आपको नमस्कार है। अमृतका स्रोत बहानेवाले ईश्वर! आपको नमस्कार है। कमनीय कामस्वरूप आपको नमस्कार है। सर्वकामवरप्रद! आपको नमस्कार है। शान्तस्वरूप शिवको नमस्कार है। पशुओं (अज्ञानी जीवों)-का पालन करनेवाले भगवान् पशुपतिको नमस्कार है। मृड (सुखस्वरूप), दान्त (मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले) और शान्तरूप आपको नमस्कार है।

नागोंके द्वारा इस प्रकार स्तुतिसे प्रसन्न किये हुए भगवान् शंकर प्रत्यक्ष दर्शन देकर बोले— नागगण! किसी पूर्वपुण्यके प्रभावसे तुम सब लोग नागलोक छोड़कर इस उत्तम महाकाल वनमें आये हो और बालकों, वृद्धों तथा स्त्रियोंके साथ तुमने सरिताओंमें श्रेष्ठ शिप्राका दर्शन किया है। तुम सब श्रेष्ठ नागोंने शिप्रामें स्नान किया है। अतः उसके पुण्यप्रभावसे तुम्हारे घर-घरमें अमृत प्राप्त होगा। तुम शिप्राका जल ले जाकर अपने अमृत-कुण्डोंमें छिड़क दो। उससे वे इक्कीसौं कुण्ड अमृतसे भर जायँगे और स्थिर रहेंगे।

तब उन नागोंने 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् महेश्वरको प्रणाम किया और अपने हाथोंमें शिप्रा नदीका जल लेकर वे नागलोकमें लौट गये। तबसे नागलोकमें शिप्राका नाम अमृतोद्भवा (या अमृतसम्भवा) प्रसिद्ध हुआ। जो मनुष्य इसमें स्नान-दानादि पुण्यकर्म करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रहता तथा उन्हें कभी आपत्ति और दुर्गति नहीं देखनी पड़ती।


जय-विजयको सनकादिका शाप, भगवान्का वाराहावतार, वाराहके हृदयसे शिप्राकी उत्पत्ति तथा उसका माहात्म्य

सनत्कुमारजी कहते हैं— महाभाग! शिप्रा नदी सर्वत्र पुण्यदायिनी, अतिशय पवित्र तथा पापहारिणी है। परंतु अवन्तीपुरीमें उसका यह महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। पूर्वकालमें अनुपम तेजस्वी भगवान् विष्णुके मनोहर वैकुण्ठधाममें जय और विजय नामवाले दो द्वारपाल थे। दोनों ही बड़े पराक्रमी थे और सदा हाथमें डंडा लिये वैकुण्ठके द्वारपर खड़े रहते थे। मुनिश्रेष्ठ! एक समय ब्रह्माजीके मानसपुत्र सनकादि स्वेच्छासे सब लोकोंमें भ्रमण करते हुए भगवान् विष्णुके परम धाममें आये। उनके मनमें श्रीविष्णुके दर्शनकी बड़ी लालसा थी। द्वारपर आते ही द्वारपालोंने उन्हें सहसा रोक दिया। उनके धक्के खाकर वे चारों कुमार वहाँकी भूमिपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। द्वारपालोंके इस बर्तावसे उन्हें बड़ा दुःख हुआ। इतनेमें ही कमलके समान नेत्रवाले महाबाहु भगवान् विष्णु भी वहाँ आ गये। उन्होंने पृथ्वीपर दुःखित होकर पड़े हुए उन कुमारोंको ज्यों ही देखा, सहसा आगे बढ़कर उन्हें अपनी गोदमें उठा लिया। मधुसूदनने उन कुमारोंका मस्तक सूँघा और भुजाओंमें कसकर छातीसे चिपका लिया। तदनन्तर पूछा—'महात्माओ! आपको यह मूर्च्छा कैसे आ गयी। किसने आपलोगोंको इस भारी दुःखमें डाला है?'

कुमार बोले— महाराज! हम आपके दर्शनकी अभिलाषासे वैकुण्ठधामके भीतर आ रहे थे कि सहसा इन बलोन्मत्त द्वारपालोंने हमें रोक दिया, इसीसे हमें यह दशा प्राप्त हुई है। अतः आजसे इस स्थानपर इनकी सनातन स्थिति न हो, ये दोनों असुरयोनिको प्राप्त हो जायँ।